आज जब तुम शहर में नहीं हो (कविता)

किसी के चले जाने के बाद सुनसान हो जाता है एक पूरा शहर..उसके बाद नजर ढूँढती है किसी को देखे जिधर..मगर हर उम्मीद हर बार सी बेअसर..किसी के चले जाने के बाद..

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उसने लिखा उसके लिये अपनी डायरी में आज..पता नहीं ये डायरी थी उसकी या खत उसका उसके लिये जो आज इस शहर में नहीं है..आगे लिखा उसने..

”आज जब तुम शहर में नहीं हो 

मैने चौराहे पर 

खड़े हो कर

खुले आम सिगरेट पी

सिगरेट तुम्हें बहुत नापसन्द थी न ?..

आज जब तुम शहर में नहीं हो

मैं सड़क पर

भीगती हुई 

लड़कियों को 

देखने में नहीं झिझका

तुम कहती थी न कि मैं बहुत अच्छा हूँ ?..

आज जब तुम शहर में नहीं हो

मैने अपनी दाढ़ी

कटा ली है

ये दाढ़ी तुम्हें

बहुत पसन्द थी न ?..”

(सुनील सरहद) 

 

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