आखिर क्या था शिविना  का सच? (पार्ट-2)

''तुम अभी नादान हो और मुझे उम्र का तजुर्बा  है. तुम्हारी माँ  जैसी  हूँ. इसे रोको  वरना  पछताओगी  एक दिन... बस इतना  ही कहूंगी," -वो एक साँस में बोलती चली गईं..

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शुभांशु  आफिसर  के साथ बेडरूम  की ओर चल पड़ा . कंगना चुपचाप  हॉल  में बैठी रही. उसकी  आँखों के आगे वो दृश्य एक के बाद एक घूमने लगे जब शिविना उनके घर पहली बार आई थी. शुभ के एक पुराने मित्र आशुतोष ने अपनी बुआ की बेटी बता कर उससे हमारा परिचय कराया था और शुभ के भोलेपन का फायदा उठाते हुए उससे अनुरोध किया था कि उसकी बहन शिविना  को हफ्ते दस-दिन अपने घर में पनाह दे दे तब तक वह उसके लिए  एक अच्छे घर का बंदोबस्त  कर लेगा. हालांकि वह उसे अपने घर पर भी रोक सकता था परन्तु उसका घर बहुत छोटा था और सिंगल रूम होने की वजह  से उसे वहां रखना मुश्किल  था.  शुभ ने बिना सोचे समझे हाँ कर दी. कंगना को शुभ का ये निर्णय उचित नही लगा था पर उसने उसके फैसले का मान रखते हुए स्वीकृति दे दी.
शिविना गोरी-चिट्टी, लंबी  खूबसूरत लड़की थी और साथ ही काफी आधुनिक  व स्मार्ट भी. कपड़े भी काफी आधुनिक पहनती थी. शुभ के साथ जब वो ज़्यादा  देर तक गपशप करती तो कंगना को अच्छा नही लगता था.  शिविना  शायद ये समझ गई  थी और उसने कंगना के दिल में अपनी जगह बनानी शुरू कर दी. कंगना एक पढ़ी-लिखी,  विचारों  से आधुनिक  पर संस्कारों  से बंधी सुंदर सर्वगुण समपन्न महिला थी जिसमें किसी भी प्रकार  का नुक्स निकालना संभव नही. पहले दो-तीन दिन वह शिविना  से बहुत औपचारिक  व खिंची-खिंची सी रही.
शिविना  की बोल्डनेस, उसका बेबाक हो कर मर्दों  की भाँति ज़ोर-ज़ोर से हंसना कंगना को पसंद नही आया. शिविना और शुभ दोनों में एक बात कॉमन  थी.  दोनों ही धूम्रपान करते थे. इसलिए  भी कंगना शिविना  से थोड़ा चिड़ी हुई थी कि इतना बिंदास हो कर सिगरेट के छल्ले कैसे उड़ा सकती है एक भारतीय  मध्यमवर्गीय  लड़की. शिविना को पता लग गया था कि कंगना को कुकिंग  का शौक है और वो बहुत अच्छा  खाना  बनाती है. बस शिविना  ने उसकी बात-बात पर प्रशंसा करनी शुरू कर दी. कभी-कभी वो कंगना को ज़बरदस्ती सोफे पर बैठा कर दोनों के लिए  चाय बना लिया करती थी. उसे स्कूटी  में बैठकर शॉपिंग, मंदिर ले जाने लगी.
धीरे-धीरे कंगना और शिविना  अच्छी सहेलियाँ  बन गई. इसी बीच शिविना के लिए घर का इंतज़ाम  हो गया और वो अपने नए घर में शिफ्ट हो गई. शिविना ने शुभांशु और कंगना को अपने घर भोजन पर आमंत्रित  किया और बहुत लज़ीज़  भोजन  पका कर खिलाया. अब शिविना जब दिल करता शुभ के घर नि:संकोच आने जाने लगी थी.
एक दफा मंदिर से वापसी में कंगना की मकान मालकिन रूबी  जी रास्ते में मिल गई. कंगनी  ने हँसकर उनका अभिवादन किया और शिविना से भी उनका परिचय कराया . रूबी  जी ने बहुत  ही फॉर्मल  अंदाज़  में शिविना  को हलो  कहा था. उसे पूरा ऊपर से नीचे तक घूरा. शिविना  ने यह नोटिस  कर  लिया  था और उसने कंगना  से कहा…
 “भाभी, मैं स्कूटी  बाहर  करती हूँ  पार्किंग  से तब तक आप वहाँ  आ जाइये. “
कंगना  ने मुस्कुरा  कर सर  हिलाया  और रूबी  जी से बात करने  में तल्लीन  हो गई.
“कंगना, ये लड़की तुम्हारी  रिश्तेदार  है क्या? “
“नही दीदी,  रूबी इनके मित्र  की बहन  है.  यहाँ कोई बिज़नेस  करने  आई है. इन्डिपेंडेंट लड़की है.  घर नही मिला था तो 15 दिन हमारे यहाँ रही. अच्छी  लड़की  है शिविना . “
” हाँ होगी कंगना,  पर तुम बहुत भोली हो.  क्या तुम ये नही देख पा रही कि अब भी वो हफ्ते में पाँच दिन तुम्हारे फ्लैट  में आई हुई रहती है. ये सब ठीक  नही.  इस प्रकार एक कुँआरी लड़की का तुम्हारे घर इस तरह  आना-जाना तुम्हारे वैवाहिक  जीवन में मुश्किलें  पैदा  कर सकता  है.  तुम अभी नादान हो और मुझे उम्र का तजुर्बा  है. तुम्हारी माँ  जैसी  हूँ. इसे रोको  वरना  पछताओगी  एक दिन… बस इतना  ही कहूंगी. “
“जी दीदी…. ” कंगना  बस इतना  ही कह  पाई.
रास्ते भर रूबी  जी की कड़वी  मगर सत्य  बातें  उसके कानों  में गूँजती रही. कंगना  ने  अपना मन बना लिया था कि शुभ से कह कर इस लड़की का घर में आना-जाना  बंद करवाएगी. रात को भोजन करते वक्त  कंगना ने शुभ को रूबी  जी की बातें बताई तो शुभ भी सोचने पर मजबूर हो गया. उसने कंगना  से कहा.. ” अब शिविना  घर पर आए तो उससे ज़्यादा  बात  मत करना. मैं भी नही करूंगा.  कुछ दिन में वह  स्वयं  ही समझ जाएगी तो आना-जाना खुद ही छोड़  देगी. ” शुभ ने गहरी साँस  लेते हुए कहा.
कुछ दिन कंगना  ने वही व्यवहार  न चाहते हुए शिविना  के साथ  किया. एक दिन  शिविना  कंगना  को फोन करके बहुत  रोते हुए कहने लगी कि
 “भाभी मुझसे क्या कोई भूल हो गई  जो आप और भइया मुझसे इन दिनों बेगानों की तरह  पेश आ रहे हैं. आप मुझे अपना समझे ना समझे पर मेंने आप दोनों  को दिल से अपना माना  है. “
यह सब कहकर वो फिर से आँसू बहाने लगी.  कंगना  को समझ नही  आया कि वो क्या करे. उसका रोना सुनकर  कंगना पिघल गई और कहा कि
“ऐसी कोई बात नही शिविना.  तुम्हारा  ही घर है जब दिल करे आया करो. “
“सच, भाभी? “
“हाँ, शिविना “
अब शिविना  फिर से रोज-रोज़  उनके घर आने लगी थी और कंगना व्यवहारिकता और संकोचवश इसे रोक नही सकी.  एक दिन शिविना ने सुबह-सुबह  फोन करके कंगना  से कहा कि “भाभी मुझे किसी अर्जेंट  काम  से अचानक  मुंबई जाना  पड़ा.  सब कुछ इतना शीघ्र  हुआ कि आपलोगों  को खबर नही कर पाई. मैं कुछ दिनों में वापस  आ जाऊँगी.  अपना  ख्याल  रखियेगा “
“हलो हलो, शिविना,.. हलो. “
बस फोन कट  गया और इंगेज  टोन  आने लगी.   कंगना  कुछ समझ नहीं  पाई पर शुभ को बता दिया. शुभ नाश्ता करते-करते टी वी पर समाचार देख रहा था. अचानक शहर के नामी-गिरामी हीरों  के व्यापारी शिरडा हैदर की हत्या  का समाचार  देख कर दंग  रह  गया. कल रात उसकी किसी ने हत्या कर दी. ये शिरडा हैदर  शहर  के डॉन  से कम नही था जो गाड़ियों  की चोरी, मारपीट, गुंडागर्दी, बड़ी डकैतियों,अपहरण और स्मगलिंग  जैसे कार्यों  में संलग्न था. शहर के लोग  जानते थे पर उसका इतना खौफ था कि कोई भी उसके खिलाफ  ग़़वाही देने को तैयार  नही होता था. वास्तविकता  में शिरडा  एक सड़कछाप गुंडा  था जो गौंडा की ग़लियाँ  नापते-नापते विदेशों से जोकालेधंधे को ऑपरेटर करते  थे उनके साथ जुड़  गया.
इन्हीं लोगों  की छत्रछाया  में रह कर वह एक गुंडे मवाली से शहर का “सर शिरडा हैदर” बन गया था जिसका नाम ही काफी था किसी भी काम को अंजाम देने में. फिर नशीले  पदार्थों की स्मगलिंग  हो या हीरों की या आतंकियों  को पनाह देने की बात हो. यह व्यापारी उनका एजेंट  था और बड़ी कमीशन खा कर डकार तक नही लेता था. विशेष धर्म की मैजोरिटी  पाकर चुनाव जीत लिया  और राजनीति में भी अपनी गंदी जड़ें फैलाने लगा.  काफी अय्याश किस्म का इंसान था जो सट्टेबाज़ी, जुआ और लड़कियों  का शौक रखता था. लॉस्ट  सेंडविच  का टुकड़ा मुँह में रखते हुए शुभ ने टी वी बंद किया और कहा कि “अच्छा  हुआ एक और पापी  का अंत हो गया. “
कंगना उसे देखकर मुस्कुराने लगी और बाय  किया.
दूसरे दिन शुभांशु के मित्र  आशुतोष सुबह-सुबह आए और शुभ को, एक छोटा-सा लकड़ी का संदूक जिस पर ताला  लगा था देते हुए कहाँ कि वे कुछ दिन के लिए अपने गाँव जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि “इसमें थोड़े कैश हैं जिसे खाली घर पर रखना सेफ नही.  इसलिए मैं चाहता  हूँ  कि आप मेरे लौटने तक इसे अपने पास  किसी सुरक्षित  जगह रख दें.”
शुभ और कंगना को कुछ समझ नही आया कि क्या उत्तर दे तभी उसने कहा कि
“आप पर मुझे  पूर्ण विश्वास  है बस इसी भरोसे का मान रखते हुए रख लीजिए.  घर से लौटते ही मैं यह बॉक्स  ले जाऊँगा . “
शुभ ने वो संदूक लेकर कंगना के हाथों में रख दिया और कहा कि इसे हिफाज़त  से आलमारी के लॉकर  में रख  दे.  कंगना उसे संभाल नही पा रही थी वो काफी भारी था.  शुभ के मित्र ने कहा कि
“भाभीजी हाँ यह काफी भारी है क्योंकि इसमें मेरे जीवन भर की पूँजी है इसे किसी सुरक्षित स्थान पर रखिए.  मेरे ख्याल से आपके शयनकक्ष में बेड के नीचे रख दीजिए बिल्कुल  पीछे की ओर. “
कंगना और शुभ ने सर हिला दिया.
संदूक … संदूक… ओहहह यही सोचते-सोचते कंगना ख्यालों के समंदर से बाहर निकल आई और फुर्ती से उठ कर रूम में पहुँची जहाँ शुभ ने एक तरफ की प्लाई हटाकर बेड खोल दिया था. कंगना अब तक समझ चुकी थी कि उस बॉक्स में अवश्य  कुछ ऐसा ही है जो, उनको खतरे में डाल सकता है.
शुभ ने कंगना की ओर देखा तो कंगना ने आँखों ही आँखों में शुभ को संकेत दिया उस बॉक्स के बारे में. शुभ जैसे उसके मौन की भाषा समझ गया था और उसने दूसरे तरफ का प्लाई नही खोला. आगे वाले हिस्से से ही हाथ डालकर सामान बाहर करता रहा.  और ये जताता  रहा कि दूसरा  प्लाई  फिक्स  है इसलिए  ऐसे ही सामान  निकालना  पड़  रहा  है. वह बॉक्स सबसे पीछे था. कंगना सभी देवी-देवताओं का स्मरण मन ही मन कर रही थी कि
“हे प्रभु ! इनलोगों को अंधा कर दो. इनकी दृष्टि उस सामान पर नही पड़नी चाहिए. आप जानते हो कि इसमें हमारा कोई भी दोष नही. हमने तो विश्वास  किया और धोखा खाया. प्लीज़  हमारी रक्षा कीजिये प्रभु. “
सचमुच चमत्कार  हुआ कुछ सामान  देखकर वे निश्चिंत हो गए और बेड बंद कर देने के लिए  शुभ से कहा. कंगना और शुभ के जान में जान आई.
वे लोग दोनों को धन्यवाद  कहकर चले गए और कहा कि आ़वश्यकता हुई तो उनको बीच-बीच में पूछताछ  के लिए  बुलाया जा सकता है.
कंगना  फिर से शुभ से लिपट  कर ज़ोर -ज़ोर से रोने  लगी.  शुभ ने उसे संभालते हुए सोफे पर बैठाया. दिन भर लग  गया पूरा घर सम्हाते-सम्हाते. रात को कंगना की तबीयत खराब देखकर शुभ बाहर से खाना ले आया और उदास  कंगना  को एक छोटी बच्ची  की तरह समझा कर खाना खिलाया कंगना  इतना  डर गई थी कि वो शुभ को एक क्षण के लिए  भी अपने से दूर होने नही दे रही थी. रात गहराती गई .
कंगना शुभ के कंधे पर सर रखे हुए सो गई. उस दिन बहुत मूसलाधार  बारिश हो रही थी और साथ में बिजली  की कड़कन  दसों  दिशाओं  को गुंजायमान  कर रही थी. घर के पास ही बहती चिरू  में पानी का बहाव तेज़  हो चला था. सूखी रहने वाली ये नदी अाज अपने यौवन  के ज़ोर  पर थी. उसकी लहरें खतरे के निशान से ऊपर  उठ रही थी जैसे अभी  प्रल़य आ जाएगी. बहुत डरावना  दृश्य  था. शुभांशु ने कंगना  को संभाल  कर तकिए पर उसक सिर  रखा और कंबल  ओढ़े दिया. कंगना को बुखार आ गया था. रात के दो बज  रहे थे.  शुभांशु हौले से बेडरूम  की ओर गया. दरवाज़ा  बहुत  धीरे से खोला कि कहीं कंगना  जाग न जाए.  बहुत मुश्किल से उसे सुलाया था. शुभ ने धीरे-धीरे बेड  खोला और वह संदूक  बाहर निकाला. उसका दिल बहुत  ज़ोर से धड़क  रहा था.
शुभ ने प्लास  की मदद  से उस  पर लगे ताले को तोड़ा जो चार-पाँच बार के प्रहार से टूट  कर अलग  हो गया. शुभ की हृदय गति बहुत  तेज हो गई. फिर भी उसने  हिम्मत  जुटाकर संदूक खोला और खोलते ही एक क्षण के लिए  जैसे उसकी साँसें  रूक  गई.  वह पीछे की तरफ सरक  गया.
“हे ईश्वर  ये क्या है.?”
तभी आवाज़  से नींद टूट  जाने के कारण कंगना  घबरा  कर शुभ को खोजती हुई कमरे में पहुँची. उसने वह दृश्य  देखा और उसकी आँखें  यह सब देखकर फटीनकी फटीवरह गई. उसके आँखों के आगे अँधेरा  छा गया.
“शुभ.. शुभ.. ” कहते हुए कंगना वहीं गिर कर बेहोश हो गई.
“कनु…..”
शुभ ने दौड़कर कंगना को बाँहों  में उठाया और हॉल में सोफे पर लेटा दिया.

(क्रमशः)

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