अध्यात्म कथा- 13: सत्संग का प्रभाव जादूई होता है

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थोड़ी देर की अच्छी संगत भी क्या परिणाम उत्पन्न करती है, यह अमर शहीद आर्य मुसाफिर पंडित लेख राम जी के जीवन से ज्ञात होता है। आर्य समाज के महान विद्वान नेता ग्राम ग्राम घूमकर प्रचार कर रहे थे।

एक दिन जब वे एक ग्राम में पहुंचे तो उस प्रदेश का डाकू मुगला भी उनके व्याख्यान सुनने को आ गया। उसके कई साथी भी दूसरे लोगों के साथ बीच में बैठ गए।
ग्राम के लोगों ने जब मुगला को देखा और पहचाना तो उनके पैरों तले की धरती खिसक गई। एक-एक करके वे उठने लगे। पंडित लेख राम जी व्याख्यान दे रहे थे ।लोग उठ कर जा रहे थे ।
ये देख कर पंडित जी को आश्चर्य हुआ कि यह क्या हो रहा है। और फिर देखते ही देखते धीरे धीरे सभी लोग चले गए ,केवल  मुगला और उसके साथी रह गए।
उधर पंडित लेख राम जी ने भी अपना भाषण देना समाप्त नहीं किया, वे निरंतर बोलते रहे। वे कर्म के संबंध में बोल रहे थे और बता रहे थे कि:
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम।
” जो भी शुभ या अशुभ कर्म तुमने किए हैं ,उनका फल भोगना पड़ेगा अवश्य। कर्म के फल से बचने का कोई मार्ग नहीं। दूसरे लोग ना देखें, पुलिस ना देखें, सरकार ना देखें ,परंतु याद रखो की एक आंख है जो तुम्हें हर समय देख रही है। तुम्हारे ह्रदय में जो कुछ होता है वह उसे भी जानती हैं। उससे बचने का कोई मार्ग नहीं है प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्म का फल वह देती है।”
व्याख्यान समाप्त हुआ तो मुगला ने पंडित लेख राम जी के पास जाकर कहा —“आप कौन हैं ?”
पंडित जी ने कहा — मैं  लेखराम  हूं। डाकू ने कहा —“मैं एकांत में आपसे कुछ बातें पूछना चाहता हूं ।क्या आप से मिल सकता हूं?”
राम जी ने कहा अवश्य मिल सकते हो मैं आर्य समाज में ठहरा हूं वहीं आ जाना। रात्रि के समय मुगला और उसके साथी आर्य समाज के मकान में जा पहुंचे ग्राम वालों ने समझा कि आपकी आ गई है यह लोग बेचारे पंडित जी को लूटने आए हैं, परंतु मुगला ने हाथ जोड़कर पंडित जी से कहा —आप तो कह रहे थे कि प्रत्येक कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है तो क्या यह ठीक है ?”
पंडित जी ने कहा—” शत-प्रतिशत ठीक है।”
मुगला बोला — ” क्या प्रत्येक कर्म का फल भोगना पड़ेगा? क्या बचने का कोई उपाय नहीं?”
पंडित जी ने कहा — कोई नहीं।
मुगला ने कहा — “तो फिर क्या बनेगा ?मैं तो कई वर्षों से डाके मारता हूं।”
पंडित जी ने कहा — “आज से छोड़ दो।कल आर्य समाज में आओ, मैं तुम्हें यगोपवित दूंगा। इसके पश्चात धर्म के मार्ग पर चलो। मुगला और उसके साथी दूसरे दिन आर्य समाज में पहुंच गए। सब का जीवन बदल गया। यह होता है— सत्संग का प्रभाव।
एक घड़ी आधी घड़ी ,आधी में पुनि आध।
तुलसी संगत साधु की ‘कटे कोटि अपराध।।
(सुनीता मेहता)

4 COMMENTS

  1. Satsang Ka mahatva itna hai Ki Ye Ishwar se milane mein sabse jaida sahayak hai. Dhanyavaad hai aapko Ki aisi Katha Ka jikr Kiya aapne Ki mann pulkit ho utha.

    Very nice story mam

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