अमर है स्मृतियों में प्रेम

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सारा प्यार तुम्हारा मैने बांध लिया है आंचल में……….
रेडियो पर सुनते हुए मीरा गुनगुनाए भी जा रही थी , गोपाल के प्रति उसका प्रेम भावों में उभर आया था. मानो उसका  गोपाल से यह अनुरोध हो जैसे “संपूर्ण समर्पित भाव से मेरे प्रेम को स्वीकार करे”!
अचानक मोबाइल फोन की घण्टी घनघना उठी.
.”अरे!…. मीरा ने गोपाल का नाम देखते ही खुश हो कर फोन उठाया- ” हैलो……
” हां तो तुम जो अभी कह रही थी ,वो सब सुना मैने और मैं अनुग्रहित हूं कि तुमने समर्पित भाव से मुझे चाहा है और वादा है तुमसे कि मैं भी तुम्हें अंतिम सांस तक ऐसे ही चाहूंगा.”
मीरा मन ही मन कहने लगी. “कितना विचित्र होता है ना यह प्रेम भी… मानो ईश्वर का अस्तित्व अपने प्रेमी में समाहित दिखता है. उसकी खुशी में ही खुशी और उसके गम में ही दुख का अनुभव…. ऐसा होता है यह प्रेम…अपने प्रेमी के लिए कुछ भी….जी हाँ कुछ भी कर गुजरने की चाह….गलत तो नहीं कह रही मैं?”
मीरा बीते दिनों की यादों में खो गई. याद आया वो दिन जब उसकी बातचीत फेसबुक पर गोपाल से शुरू हुई थी तो…. “किस प्रकार उसने अपने व्यवहार से दिल जीत लिया था मेरा. हर बात में मेरा ख्याल रखना और अच्छी-अच्छी हिदायतें दे कर मुझे प्रोत्साहित करना. इतना सब करते हुए उसके माथे पर कभी बल नहीं पड़ा. जब भी याद करती हूं वह समय मेरा प्रेम गोपाल के लिए और बढ़ जाता है कितनी कठिनाई से मैंने वह 3 महीने निकाले थे जब मेरी टांग पर प्लास्टर चढ़ा था और डॉक्टर की कठोर हिदायत थी कि बिस्तर से नहीं उठना.”
“क्या करूं मैं …. .???”
वक्त जैसे काटने को दौड़ रहा था.
“ऐसे वक्त में अधिक समय फेसबुक पर ही बिताती थी.वहीं गोपाल से बातचीत शुरू हुई. वह अपनी पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया गया हुआ था. एक तय वक्त पर वह और मैं दोनों ऑनलाइन हो जाते और घंटो बातें करते हैं, बहुत व्यावहारिक है वह. शायद परिवार से दूर रहने की वजह से उसे व्यवहार कुशल बनना पड़ा. आज सोशल मीडिया और तकनीकी उपलब्धियों की वजह से दूर रहकर भी प्रेम की अनुभूति हो जाती हैं.”
उधर से आवाज आई – “अरे कहां खो गई हो ,फिर यादों में चली गई!”
मैंने चौकते हुए – “हाँ. … नहीं बस यूं ही”
“धरती पर लौट आओ मेरी परी……हा हा हा हा हा”
वक्त बीत चुका था पर यादें अब भी ताजा थीं.
“हां गोपाल , वही याद कर रही थी. जब बिस्तर ने पकड़ रखा था. तुम न होते तो 3 महीने कितने लंबे गुज़रते सोच रही हूँ.”
“उन दिनों तुम्हारे साथ अंताक्षरी खेलते हुए वक्त बिताना और तुमको हारा हुआ देखना बहुत भाता था. बाद में मैंने जाना तुम तो हारते ही नहीं थे, हार मैं सब गई. अब बैठी हूँ तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा में.
मुझे तुम्हारे स्वदेश लौटने से पहले बहुत सारे काम करने हैं . इस बार अकेले जाने नहीं दूंगी मुझे भी लेकर चलना होगा.”
“यस मॉय लार्ड” आपका हुक्म सर आंखों पर.”
”जहां भी महफिल जमेगी हम साथ साथ होंगे समझ गए ना, कि समझाऊ ?”
“मेरी क्लास का वक्त हो गया है अभी चलूंगा लौटकर प्रोग्राम बनाते हैं.”
“अपना ख्याल रखना,” मेरे लिए!..ओ के बाए बाए …”
“ब बाए . …गोपाल”
वक्त अपनी चाल से चल रहा है, प्रत्येक व्यक्ति अपने काम परिवार और जीवनचर्या में व्यस्त हैं. फिर भी जिससे विचार मिले ,और जो सहानुभूति से आपकी बात सुने उसके प्रति एक विशेष आकर्षण हो ही जाता है. फिर मन करता है और अधिक सामने वाले के बारे में जाना जाए ,कुछ अपनी कहे कुछ उनकी सुने यही तो प्रेम की पहली सीढ़ी है. मिलना संभव नहीं तो चलो बात ही कर ले जब दो लोगों के विचार मिलते हैं तभी तो प्रेम अंकुरित होता है.
जहां विचार नहीं मिलते वहां प्रेम भी नहीं होता बड़ी बात है ना .. विचार समान होना. मुझे तो लगता है वेद मंत्रों में जो समान व्रत अनुगामी होने वाली बात लिखी है वह गलत नहीं है क्योंकि जब दो व्यक्ति एक से विचार वाले होंगे तो उन्हें प्रेम होना प्रभु की कृपा समान है. बस इसी प्रकार का आकर्षण मीरा और गोपाल में भी हैं है.  परन्तु ये आकर्षण भी नहीं सिर्फ और सिर्फ प्रेम है जहाँ दो शरीर नही आत्माओं का मिलन हुआ है.

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