अमर संगी (एक कहानी)

देव को जाते हुए देखकर पारो को न जाने क्यूँ आज अजीब सी बेचैनी हो रही थी| पर वो समझ नही पा रही थी कि उसे ऐसा महसूस क्यूँ हो रहा है..

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मातृदिवस की बहुत  शुभकामनाएँ तुमको पारो!
देव पारो की तस्वीर  की ओर देख रहा था।
पारो..हाँ पारो..उसकी सबसे प्यारी दोस्त| दोनों साथ खेले, पले-बढ़े..पढ़ाई भी साथ की कॉलेज में| दोनों में बहुत गहरा लगाव था|
पेट में  दर्द  पारो को होता तो तड़पता देव था|
पारो की सारी शरारतों का मुंशी, उसे काका साहेब की डाँट से बचाने वाला देव ही तो था|
पारो बहुत ही अल्हड़, चंचल, मासूम और बहुत ही नादान| देव को उसकी हर बात, हर अदा भाती थी| उसका मुस्कुराना, उसका रूठना, उसका देव पर गुस्सा करना..देव..देव सब सह लेता था हँसते-हँसते .प्रेम जो करता था उससे|
ये कहना मुश्किल होगा कि उसे कब प्रेम हुआ पारो से..शायद होश संभालने से पहले  से ही| काकी साहेब और देव की माँ को  डिलीवरी पेन एक दिन ही उठा| एक ही अस्पताल में पैदा हुए दोनों ..दस मिनट  के अंतराल पर| जहाँ नवजात बच्चों को एक साथ रखा जाता है वहाँ भी दोनों अगल-बगल ही थे|
समझिये जैसे जन्म-जन्मांतर  का साथ हो दोनों का|
पारो को भी देव के बगैर एक पल का चैन न था| हर वक्त देव..देव.और देव| सुबह के नाश्ते से लेकर स्कूल और शाम की चाय ..और उनकी लम्बी-लम्बी  गपशप | दोनों को गीत भी एक ही पसंद था..”चिर दिनी तुमी जे आमार जुगे-जुगे आमि तुमारी..संगी.संगी.आमरा अमर संगी| «
कुल मिलाकर देव के बिना उसके जीवन का सूरज नही उगता था| परन्तु पारो इस बात से बेखबर थी कि ये उसका देव के लिये बेइंतेहा प्यार है..जिसे वो समझ नही पाई थी| जिसे देव समझ गया था| पर कह नही पाया उसे|
काका साहेब ने बहुत ही ऊँचे खानदान में रिश्ता तय कर दिया था पारो का| गाँव के ज़मींदार थे उनका इकलौता बेटा था संदर्भ| बहुत ही रूपवान,  गुणवान,  समझदार|  पारो को भी बहुत पसंद आया वो|
पारो में बचपन अब भी बाकि था| विवाह के कपड़े , गहनों को लेकर वो बहुत उत्साहित थी जैसे छोटे बच्चे होते हैं| उसके लिये विवाह का अर्थ शायद यही था..बहुत सारे नये कीमती कपड़े, गहने,  जूते,  मेकअप, मेंहदी ..बस..बिल्कुल बच्ची|
जैसे-जैसे विवाह के दिन नज़दीक आ रहे थे देव बुझा-बुझा सा रहता था| हालांकि पारो उसे गाहे-बगाहे तंग करती रहती थी..देव चलो शॉपिंग, देव चलो लंच पे चलते हैं.जब देखो देव..देव.देव|
पर उसे ये एहसास ही नही था कि वो प्रेम करने लगी है उससे|
देव के पिता जी कपड़ों के होलसेल  व्यापारी थे| शहर जाकर  डिलीवरी देते थे रिटेल रेडिमेड दुकानों पर| एक दिन देव के पिताजी को बुखार आ गया| देव ने कहा कि वो चला जायेगा डिलीवरी देने| हमेशा की तरह देव पारो से मिलने पहुँचा| पारो पैरों में पाज़ेब पहन रही थी| देव उसके खुले बालों में चाँद सा सुंदर मुखड़ा निहारने लगा| जो लहरा-लहरा कर उसकी आँखों, होंठों और गालों के स्पर्श कर रहे थे| पारो पाज़ेब पहनने में व्यस्त थी| देव को आते हुए देखा नही उसने| तभी पाज़ेब पहनते हुए उसका लॉक करने का आँकुड़ा टूट कर निकल गया|
उई माँ, ये क्या हुआ? पारो चौंक गई| देव सब देख रहा था| पारो को परेशान देखकर उसे हँसी आ रही थी| पारो पैर पटकते हुए सोफे पर जा बैठी| देव के हँसने की आवाज़ सुन कर पारो ने गर्दन घुमा कर देखा|
हाँ.हाँ..तुमतो हँसोगे ही..तुम जलते जो हो|
मैं और जलन? भला मैं क्यूँ जलूँगा..बोलो?
पारो कुछ पल चुप रही फिर सकपकाकर कहा इसलिये कि बस तुम जलते हो.जलते हो..जलते हो..और हमें कुछ नही पता|
पारो इधर-उधर नजरें घुमाने लगी|
देव उसकी आँखों में देख रहा था जैसे कुछ पूछ रहा हो| पारो घबरा गई पर समझ नही पाई कुछ|
देव ने उसे असहज होते देख बात सँभाली..अच्छा बाबा अच्छा| नाराज़ मत हो| मैं शहर जा रहा हूँ आज वापसी में तुम्हारे लिये इससे भी कहीं ज़्यादा सुंदर पाज़ेब ले आऊँगा.ठीक है?
पारो ने धीरे से सर हिलाया| देव ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा और मु़ड़ गया दरवाज़े की ओर शहर जाने के लिये| पारो ने आवाज़ दी.एक मिनट देव!
देव ठिठक कर रूक गया| पारो ने  पीछे से आकर देव को आलिंगनबद्ध किया और कहा ..जल्दी आना देव..तुम्हारा इंतज़ार करूँगी|
देव की आँखों की कोरों में पानी भर आया| मगर खुद को भावुक होने से रोकते हुए कहा..नही वही रह जाऊँगा..मेरी चुड़ैल| देव प्यार से उसे कभी-कभी चिढ़ाता था”चुड़ैल” कह कर|
पारो ने चिढ़ कर कहा..हाँ .हाँ ठीक है वहीं रह जाना.मैं हूँ ही कौन तुम्हारी?
देव ने पीछे मुड़कर कहा बताऊँ?
पारो उसकी नजरों की शोखी देखकर झेंप गई|
देव मुस्कुराने लगा| उसने हँसकर कहा.चिंता मत करो जल्दी आ जाऊँगा| अब चलूँ|
पारो ने धीरे से सर हिलाया|
देव को जाते हुए देखकर पारो को न जाने क्यूँ आज अजीब सी बेचैनी हो रही थी| पर वो समझ नही पा रही थी कि उसे ऐसा महसूस क्यूँ हो रहा है|
देव चला गया| देव शहर पहुँच ग़या| दिनभर अपना काम निपटा कर वापसी में पारो के लिये बहुत सुंदर पाज़ेब खरीदी| उसने तो कल्पना भी कर डाली कि उसकी पारो उसे पहन कर कितनी खुश लग रही है| वो ख्यालों में अपनी पारो के साथ कोई प्रेम गीत गा रहा था| अचानक ..बहुत ज़ोर से लोगों के चीखने चिल्लाने की आवाज़ें आने लगी|
भागो..भागो..भूकम्प..भागो सब| देव जैसे होश में आया गहरी नींद से| उसने देखा लोग बेतहाशा इधर-उधर भाग रहे हैं| सब कुछ हिल-डुल रहा है तेज़ कम्पन के साथ|
उसने देखा कि वो जिस इमारत के नीचे खड़ा है वो ज़ोर-ज़ोर से हिल रही है| वो सकते में आ गया..उसका शरीर सुन्न पड़ गया| वो भागना चाहता था वहाँ से | परन्तु न जाने उसके कदम  उस पल उस जगह जैस जम गये| तभी किसी ने झकझोरा उसे..अरे भाई भागो! ..जान देने का ईरादा है क्या? देव हड़बड़ा कर वहाँ से हटने लगा| पारो की एक पाज़ेब नीचे गिर गई थी भागते हुए| देव वापस गया वो पाज़ेब उठाने| जैसे ही पाज़ेब उठाकर भागने को हुआ ईमारत वही खड़ी-खड़ी ढेर हो गई और देव? ..देव भी उस मलबे के नीचे दब गया| चारों ओर हाहाकार मच गया..बचाओ.बचाओ| करीब पचपन सेकेंड के इस वाकये ने सब कुछ बदल दिया था| एक हँसता-खेलता शहर वीरान हो गया था|
देव के घर वालों को खबर मिली तो सब सकते में आ गये| देव की माँ का रो-रो कर बुरा हाल था| काका साहेब खुद अपनी गाड़ी लेकर गये शहर देव को ढूँढने | पर देव कहीं नही मिला|
वे खाली हाथ लौट आये| काकी साहेब ने उस वक्त देव के परिवार को सँभाला| पर पारो..पारो का क्या हाल हुआ? वो..वो बिल्कुल बु्त बन गई देव के गुमशुदा होने की खबर सुनकर| बस दिन-रात देव का नाम ले-ले कर रोती रहती थी| तब तक उसे ये एहसास हो चुका था कि वो वास्तव में देव से ही प्रेम करती है .संदर्भ से नही|
काका साहेब पारो की बिगड़ती हालत देखकर परेशान थे| ऐसे में उसका विवाह कर देना उनको उचित नही लगा और संदर्भ के पिताजी को सारी परिस्थितियों से अवगत करा कर हाथ जोड़ कर माफी माँग ली| संदर्भ के पिताजी और खुद संदर्भ बहुत सुलझे विचारों के थे| उन्होंने परिस्थिति की गंभीरता को समझा और पारो के स्वस्थ होने तक प्रतीक्षा का वचन दिया| कहा कि जब पारो बिल्कुल ठीक हो जायेगी मानसिक और शारीरिक रूप से| तभी ये विवाह होगा| वे लोग इंतज़ार कर लेंगें उनकी भलमनसाहत देखकर  काका साहेब का हृदय भर आया| हाथ जोड़कर उनका धन्यवाद किया|
दिन महीने बने और इस प्रकार एक वर्ष बीत गया| पारो की स्थिति में कोई सुधार नही आया| कोई दवा और दुआ काम नही आई| रातों को  भरी नींद से उठकर देव.देव कह कर चीखने लगती थी| काकी साहेब अपनी बेटी का ये हा़ल देखकर तड़प उठती थी|
एक अँधेरी,  बरसाती रात में बिजली कड़कने से पारो की नींद खुल गई| उसे कोई परछाई दिखी| उसे लगा देव आ गया है| वो उस परछाई का पीछा करते हुए घर से बाहर निकल गई|  नदी अपने उफान पर थी| पारो को कोई होश नही था| वो अपनी सुध-बुध खो चुकी थी| कब जलधारा में समा गई उसे खुद पता न चला|
काका साहेब और काकी साहेब इस खबर से बिल्कुल टूट गये| पारो के जीवन की ईहलीला का अंत इस प्रकार हो जायेगा| कभी स्वप्न में भी नही सोचा था उन्होंने| खैर सत्य को स्वीकारना ही पड़ता है|
कुछ महीने बाद देव के पिताजी शहर जाने की तैयारी कर रहे थे| बेटे के जाने के बाद उनके बुढ़ापे का सहारा भी छीन गया था| कमाना अब जीवन की सबसे बड़ी  ज़रूरत भी बन गया था जीवन-यापन के लिये|
तभी हरिया जो देव के घर के पास वाले घर में रहता था दौड़ता हुआ आया| चाचा..चाचा..ओ चाचा..देव के पिताजी कांतिलाल जी ने देखा कि हरिया बुरी तरह से हाँफ रहा था| उसका गला सूख रहा था| पूरा पसीने से तर-बतर|
कांतिलाल जी (देव के पिता) ने उसे बैठाया और पानी पिलाया| फिर पूछा अब बता क्या बात है क्यूँ इस तरह बेसुध दौड़ा चला आ रहा है..क्या हुआ..अब बोल?
हरिया ने हकला कर कहा चाचा..वे.वो देव भईया.हाँ.हाँ बोल ना आगे|
चाचा देव भईया ज़िन्दा है..अभी उसे माल रोड के पास से देखता हुआ आया हूँ| क्या? ..कांतिलाल जी जैसे सुन्न  पड़ गये| तेरा माथा खराब हो गया है? क्या बड़बड़ा रहा है? देव को गुज़रे डेढ़ वर्ष हो चुका है|
अरे चाचा मैं सच कह रहा हूँ..आप खुद चल कर देख लो| कांतिलाल जी ने खुद को सँभाला| देव की मा़ँ और कांतिलाल जी ज्यूं ही घर से बाहर निकले देव घर के बाहर खड़ा था| पिता-पुत्र दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे| दोनों की आँखें अश्रुजल से पूरित थी| कांतिलाल जी ने बेटे को गले से लगा लिया और  बच्चों की तरह फूट-फूट रो पड़े| बहुत हिम्मत से जो तूफान अंदर रोक रक्खा था आज बेटे को देखकर सारी बाड़ तोड़कर  बह गया| देव ने सारी घटना बताई कि किस तरह कई दिनों बाद उसे मलबे से बाहर निकाला गया| बस साँस ही चल रही थी बाकि सब कुछ खत्म था| महीनों अस्पताल में उपचार के पश्चात उसे होश आया| थोड़ा स्वस्थ होने पर उसे अस्पताल से गाड़ी से घर भेजा गया| पहले फोन के साधन इतने सुगम नही थे जितने आजकल हैं|
कांतिलाल जी और देव की माँ की आँखें भर आई थी ये सब सुनकर| परन्तु वे लोग खुश थे कि उनका बेटा सही-सलामत घर लौट आया था|
सब बहुत खुश थे| उधर काका साहेब और काकी साहेब भी बड़े प्रसन्न हुए देव के लौट आने से| देव उनसे मिलने गया| वो ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगा रहा था पारो ओ पारो देख.देख मैं ले आया तेरे लिये पाज़ेब| कहते-कहते ड्राईंग रूम में दाखिल हुआ तो सन्न रह गया| सामने पारो की तस्वीर पर फूलमाला चढ़ी थी|
काका साहेब ने पीछे से आकर उसके कंधे पर हाथ रखा| कहा तुम्हारी मृत्यु की खबर सुनकर बॉवरी हो गई थी पारो और एक दिन इसी उन्माद में वो चल बसी देव|  देव की आँखों में आँसू थे| उसके कानों में पारो के कहे शब्द गूँज रहे थे”देव जल्दी आ जाना..मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगी|”
ईश्वर ने उसे मौत के मुँह से शायद इसीलिये बचाया था क्यूँकि अपने माता-पिता के बुढ़ापे का इकलौता सहारा था वो| उनकी सेवा करना और उनका कर्ज़ चुकाना उसका फर्ज़ भी था और धर्म भी| चाहकर भी अपने जीवन का अंत नही कर सकता था देव|
उसने अपने सारे कर्तव्य निभाते ह्ए जीवन के इस कटु सत्य को स्वीकार कर लिया कि पारो अब इस संसार में नही है|  देव ने आजीवन अविवाहित रहने का निश्चय कर लिया था| माता-पिता बेटे के दुख को समझते थे इसलिये कोई प्रश्न नही किया देव से| पारो देव की आत्मा में बसी है और अगले जनम उनका मिलन अवश्य होगा| ये उसने बहुत ही पक्के लहज़े में कह दिया था ईश्वर से कि अगले जनम में उसे पारो को ही उसकी जीवन संगिनी के रूप में देना होगा| अक्सर उन पाज़ेब को घंटों देखा करता था.उनसे बातें करता था…”पारो ओ मेरी पारो..क्या देख रही हो टुकुर-टुकुर|”
गुनगुनाते हुए.”ऐ जीबन पूरिये दिये..पाबो आर नतून जी
बन शे दिने हौबे एकाकार.दुई जना आर दुटी मन..संगी..संगी…आमरा अमर संगी.”
अगले जनम में मेरे प्यारे-प्यारे बच्चों की अम्मा तुम्हीं बनोगी पारो| अभी से सुन लो..समझ लो. ठीक है ना| चलो अब मुस्कुरा कर कहो ..हाँ ..हाँ..हाँ..पारो जैसे तस्वीर में से मुस्कुरा रही थी….कह रही हो जैसे..तुम्हारा इंतज़ार है..आमरा अमर संगी !!
 (अंजू डोकानिया)

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