अनसुनी अनुराधा: वो फिर नहीं आते..

एक माँ का दिल ले कर पढ़ियेगा इस कहानी को जो है एक माँ की जिन्दगी की कहानी ..जहाँ जिन्दगी खुद बन गई एक पहेली अनजानी..

1
250
आज अनुराधा बहुत खुश थी। विवेक की बहुत बड़ी कंपनी मे बहुत अच्छी जॉब लग गई थी। आज विवेक का पहला दिन था। -विवेक जल्दी करो पहले दिन लेट नहीं होना। अच्छा लाइट ब्लू शर्ट ही पहनना, बहुत अच्छी लगती है तुम पर। और हाँ, लंच मे फोन जरूर करना, दो-तीन दिन बाद तो मै खुद ही कर लिया करूंगी!
हर बात पर पता नहीं क्यूँ हँसी आये जा रही थी विवेक को। माँ का ये भोलापन उसे बहुत प्यारा लग रहा था। माँ को इस तरह खुश देख कर वो भी बहुत खुश था. –ठीक है, अच्छा,  ओके, बिलकुल – ये सब भी कहता रहा वो माँ को!
विवेक और माँ एक ही दुनिया के दो नाम थे। विवेक को 24 साल का होने मे बस 3 ही महीने बाकी थे। लेकिन संयोगिता के लिए आज भी वो जैसे 24 दिन का ही था। विवेक 5 साल का ही था जब आनंद इस दुनिया को अलविदा कह गए थे। खाली हाथ खड़ी रह गई थी वो उस वक्त। समझ नहीं आ रहा था कि विवेक को चुप कराऊँ या पहले खुद को। ईश्वर ने की अनुकंपा और आनंद की जगह उसे जॉब मिल गई। जिन्दगी खाली की खाली रही लेकिन अब उतनी मुश्किल नहीं रही।
बस, ऐसे ही कुछ उतार-चढ़ाव के बीच खुद को संभालती हुई आगे बढ़ती रही वो जिन्दगी के साथ। ऐसा लगा, सब ठीक हो जायेगा। पहली बार ऑफिस पहुँच कर संयोगिता की जिन्दगी में कुछ रौनक सी आ गई। हम अपनी कहानी की नायिका को संयोगिता कह कर पुकारेंगे क्योंकि ये नाम है जो प्यार से दिया था अनुराधा को आनंद ने. आज संयोगिता ने काफी अरसे बाद खुद को सबसे बात करते देखा। वैसे भी वह बहुत ही व्यवहार-कुशल और शालीन थी साथ ही अपने काम की प्रति समर्पित भी कम नहीं है। इसी वजह से सब उसका बहुत सम्मान भी करने लगे थे।
आज 18 साल लगभग हो चले थे इस ऑफिस मे संयोगिता को। एक बहुत पुरानी याद सी उभर आई थी उसके जहन में जो जुड़ी थी किसी व्यक्ति से। उस दौरान जब संयोगिता को आये कुछ ही महीने हुए होंगे, उसका परिचय अपने एक नये सहकर्मी से हुआ। ये परिचय ऑफिस में हुआ लेकिन लगा जैसे जिन्दगी में घर कर गया। कुछ समझ नहीं पाई वो। अरुण नाम था उसका और वो भी बहुत जल्द पसंद करने लगा संयोगिता को। दोस्ती में बहादुरी देखिये कि अपने दिल की बात भी उसने संयोगिता की सामने रख दी थी।
उस समय संयोगिता अपनी ही उलझनों मे जैसे उलझी सी रहती थी। उसके सामने थी पूरी ज़िन्दगी, साथ ही विवेक की जिमेदारी, और भी था बहुत कुछ। अभी तो चोट खा कर ठीक से आंसू भी नहीं पोंछ पाई थी। यूँ ही कुछ सवालो का सामना करती हुई कभी-कभी वो अपने बीते समय को याद कर लिया करती थी।
अरुण ऐसे ही एक मौके पर संयोगिता की मेज़ पर आ बैठा था, शायद ये उसका आखिरी प्रणय निवेदन था। उसने बिना लाग-लपेट के कहना शुरू कर दिया – ‘देखो संयोगिता, मेरा तबादला दूसरी ब्रांच में यानी दूसरे शहर मे हो गया है। प्लीज़, अभी भी सोच लो और अपना फैसला बदल दो, चलो मेरे साथ,  हम तीनों बहुत खुश रहेंगे!
संयोगिता झटके से ऊठी  और एक किरण जो सामने खिड़की से आ रही थी उस पर पर्दा खींच दिया। उसने कुछ अजीब तरह से कहा अरुण से – ‘ये रोशनी मुझे तेज़ धूप की तरह चुभ रही है।  मेरा ध्यान बार-बार काम से भटका रही है।’
अरुण खामोशी से संयोगिता को देख रहा था। शायद आज जी भर कर देख लेना चाहता था उसे। जैसे अपनी आँखों मे भर लेना चाहता हो औऱ उसी खोये खोये से अन्दाज में उसने कहा- ‘ज़िन्दगी के सफर मे गुजर जाते हैं जो मकाँ वो फिर नहीं आते’ बस एक आवाज लगा देना संयोगिता मै सच मे चला आऊँगा। फिर अरुण तो चला गया पर संयोगिता की कलम एक पल को नहीं रुकी। यूं ही सफर भी ज़िन्दगी का भला कहाँ रुकता है।
आज संयोगिता को घर जाने की थोड़ी जल्दी थी, विवेक से बाते जो करनी थी। दिन मे फोन भी नहीं किया , कोई बात नहीं आज पहला दिन जो था। घर जाते ही संयोगिता ने विवेक की पसंद का खाना बनाया। बैगन का का भुर्ता और उड़द की दाल बहुत पसंद थी विवेक को। उसके पापा भी बहुत शौक से खाते थे, सोच-सोच कर संयोगिता के चेहरे पर मुस्कान खिल रही थी -यही तो खज़ाना था संयोगिता के पास।
आज दोनो ने खूब बातें की।  विवेक बताता जा रहा था और हर बात को संयोगिता घुमा-फिर कर दुबारा पूछती रही। विवेक बातों मे लग जाता तो माँ अपने हाथों से उसे खाना खिलाती। और विवेक बहुत प्यार से उसकी ओर देख कर कहता – बस, माँ कुछ भी हो आप जैसा खाना कोई नहीं बना सकता।
अब विवेक की एक ही ज़िद सुनाई देती थी- माँ अब आप जॉब से रिज़ाइन कर दो, बस बहुत हो गया। अब आप आराम करो। बस करो माँ।
धीरे-धीरे घर की हालत भी सुधर रही थी। कुछ दिनों तक संयोगिता टालती रही लेकिन कब तक। आखिर उसने बेटे की बात मान ही ली, और अब माँ को ज्यादा काम न करना पड़े – इसलिये विवेक ने फुल टाइम मेड भी रख ली थी। लेकिन खाना तो उसे माँ के हाथ का ही खाना था। आज विवेक का जन्मदिन भी तो था, माँ ने आज विवेक की पसंद की सारी चीज़ें बना डालीं। माँ के हाथ के बने मोतीचूर,  दाल की कचौड़ी,  मखनी पनीर,  बूंदी का रायता – ओहो, विवेक की तो जैसे जान बसती थी इस खाने में। और वो था भी तो उसकी प्यारी माँ के हाथ के स्वाद से भरा हुआ जिसमें था बहुत सारा प्यार मिला हुआ..
विवेक की जैसे ही बाइक रुकी , माँ जैसे उड़ती हुई गेट पर पहुँच गई। लेकिन आज विवेक अकेला नहीं था। अरे ये क्या, नमस्ते किया किसी ने उसको –  नमस्ते आंटी।
नमस्ते बेटा- उसने कहा। दोनों तरफ से स्वर हल्के ही थे।  माँ इन से मिलो ये है सौम्या। हमारे ऑफिस में एच आर डिपार्टमेन्ट की हेड है। आज सोचा आपसे मिलवा दूँ ।
हाँ हाँ अंदर आओ बेटा. कहते हुए माँ सौम्या को प्यार से अंदर ले आई। माँ सौम्या को तुमारे हाथ का खाना इतना अच्छा लगता है कि सच कई बार तो लगता है उसे घर ही ले आऊँ –रोज खा सकेगी तुम्हारे हाथ का खाना।
मेरे पल्ले तो कुछ भी नहीं पड़ता, मुझे तो बस ये पता था कि आज विवेक का जन्मदिन है और शाम को उसके लिये मुझे बढ़िया से बढ़िया खाना बनाना है। ऐसे में घर में नए मेहमान का आना, वाह, ऐसा लगा जैसे भगवान अब हम पर ही ध्यान दे रहे थे।
“सौम्या” – जी,जी आंटी – बेटा कभी अपने मम्मी पापा को भी लाओ हमारे यहाँ। जी जरूर आंटी। संयोगिता को यही ठीक लग रहा था। विवेक अब 24 साल का पूरा हो चूका था। बिलकुल सही समय था। बस 6 ही महीने मे सब कुछ आराम से निबट गया, जो रिश्तेदार सालों से नहीं मिले थे वो भी विवेक की शादी मे आये थे।
बहुत ही अच्छा परिवार था सौम्या का, पिता का अपना बिज़िनेस था। बड़ी बहन की शादी भी बहुत अच्छे घर मे हुई थी। छोटा भाई सीए की तैयारी कर रहा था। सौम्या को कोई तकलीफ न हो इस बात का बहुत ध्यान रख के की गई थी शादी।
अब दोनों सुबह साथ जाते और साथ ही वापस आते। अब संयोगिता विवेक का ही नहीं सौम्या का भी बहुत ध्यान रखती। तीन महीने हो गए थे मगर लग रहा था बस अभी कल ही की बात है विवेक की शादी हुए।
उस दिन शाम का समय था। माँ जल्दी-जल्दी बच्चों के आने से पहले खाने का काम कर लेना चाहती थी रोज़ की तरह। और रोज़ की तरह ही सौम्या-विवेक भी समय पर आ गए। रोज़ की तरह ही घर आते ही ऑफिस औऱ दुनिया की बातें करना, फिर आठ बजे माँ के बनाये खाने का आनंद लेना। फिर थोड़ी गपशप। लेकिन आज डाइनिंग टेबल पर वातावरण कुछ अलग था।
विवेक… आज बॉस से तुम्हारी बहुत देर मीटिंग चली. बताओ न अब, क्या बात थी। तुमने कहा था घर जा कर बताओगे- सौम्या जानना चाहती थी।  -अरे कुछ खास नहीं।  -अरे कुछ तो बताओ न विवेक। अरे वो ऊपर से आर्डर था, मुझे अमरीका भेज रहे हैं कैलिफोर्निया।  – क्या..? -सौम्या का मुह दायरे से थोड़ा ज्यादा ही खुल गया।
फिर? …फिर क्या कहा तुमने? – मैंने साफ मना कर दिया। – क्या ? मना कर दिया ? पर क्यूँ? एक साथ सौम्या कई सवाल पूछे जा रही थी। -अरे यहाँ माँ है, तुम हो। और मै चला जाऊँ?.. नहीं नहीं.. मतलब ही नहीं..
दूसरी ओर माँ के चेहरे पर न कोई विचार था न कोई प्रश्न था, वो शांत थी हमेशा की तरह। लेकिन सौम्या नहीं लग रही थी शांत..आज सौम्या को कमरे में जा कर सोने की कुछ ज्यादा ही जल्दी दिख रही थी..वर्ना रोज़ तो माँ के साथ किचन मे हाथ बटवा देती थी। खैर, कोई बात नहीं, बच्चे ही तो हैं, दिन भर ऑफिस मे भी कितना काम होता है..थक गई होगी वो।
संयोगिता को कभी किसी से शिकायत नहीं होती थी। रात के साढ़े बारह बज रहे थे, सारे घर की लाइटें बंद थीं। विवेक भी बेसुध सो रहा था, लेकिन आज सौम्या के दिमाग की बत्ती जल रही थी। दो-तीन दिन और निकल गए। सौम्या के दिमाग मे चल क्या रहा था आखिर?
वो जब भी इस बारे मे विवेक से बात करती, विवेक टाल जाता था। लेकिन जब उसने जिद पकड़ ली तो उसे कहना पड़ा -सौम्या, पागल हो गई हो तुम? बेफिजूल की बातों का कोई मतलब नहीं है।
सौम्या का बदलता व्यवहार अब विवेक को अखर रहा था। माँ भी कहीं कुछ महसूस कर रही थी। आज शानिवार था और सौम्या भी तैयार थी। विवेक तुम समझते क्यूँ नहीं, ऐसा मौका ज़िन्दगी में बार-बार नहीं आता,  हमारे सामने पूरी लाइफ है, फ्यूचर है। यहाँ सब हैं, माँ को कोई परेशानी नहीं होगी । मेरा पूरा घर है माँ अकेली कहाँ है?
विवेक सब चुपचाप सुन रहा था। माँ भी खामोशी की चादर ओढ़े बैठी थी। इस बार का रविवार जैसे बहुत भारी था। सब साथ थे लेकिन दिन कट ही नहीं रहा था। अगले दिन फिर वही जॉब, वही काम, वही भाग-दौड़..
और फिर आज ऑफिस में सौम्या की बड़ी बहन तान्या का फोन आ गया। ज़्यादा इधर-उधर की न करके वो सीधे मुद्दे पर आ गई –  देखो विवेक, अभी तुमारी ज़िन्दगी की शुरुवात है और अभी टाइम ऐसा है कि तुम रिस्क ले सकते हो और सारी उम्र माँ ने कितना किया है तुम आज भी चाहोगे वो कुछ भी खर्च करने से पहले दस बार सोचे। यही मौका है, तुम अपनी पत्नी, और माँ को वो हर ख़ुशी दे सकते हो जिनकी वो हकदार है। किस्मत बार बार चल कर नहीं आती है। मौके को पहचानो, उसको गँवाओ नहीं!
फोन तो कब का कट चुका था लेकिन विवेक सोच में डूबा हुआ था। दीदी कह तो सही रही थी। शायद यही ठीक होगा..
 और फिर आ गया वो दिन। विवेक के साथ सौम्या का भी बैग तैयार रखा था। और माँ का खयाल रखने को सौम्या का परिवार भी तैयार था। ज्यादा दूर नहीं है, अमेरिका बस कुछ घंटों का ही सफर था। और अमरीका मे सेटल होते ही माँ को भी अपने साथ ले जाएंगे बच्चे। बस, परेशानी क्या है!
परंतु माँ आज बिलकुल मूक थी। न वो बोल रही थी न उसकी आँखें – जैसे कोई सन्नाटे की लकीर सी खिंच गई थी उसके चेहरे पर। शायद, संयोगिता कुछ समझ नहीं पा रही थी। बस, थोड़ी देर बाद बार-बार रसोई मे जाती और मुह धो कर आ जाती। माँ नहीं चाहती थी कि बच्चे उसकी आँखों में आँसू देखें।
विवेक और सौम्या बहुत व्यस्त थे। जल्दी जल्दी अपना सामान रख रहे थे। -माँ अपना ख्याल रखना, पहुँचते ही फोन करूंगा। तुम चिन्ता मत करना। कुछ दिनों की ही बात है..
कुछ देर बाद संयोगिता एक बार फिर जिन्दगी में अकेली हो गई थी आज। भरी आँखों से दूर तक जाती हुई कैब को देखती रही। कैब के जाने पर भी उसकी आँखें सड़त पर ही कुछ ढूँढती रही।
जब आनंद गए थे तो विवेक को छोड़ गए थे। आज विवेक भी गया और वो रह गई।  संयोगिता खाली पड़े घर को देख रही थी। चारों और विवेक ही तो था। वो परदे जिनमें वो छुप जाया करता था। उस सोफे पर कैसे उछल-उछल कर बैठता था वो। माँ, आज क्या बनाया है जल्दी लाओ बहुत भूख लगी है। हर जगह उसे विवेक दिखाई दे रहा था।
आँख बंद कर संयोगिता सोने की कोशिश कर रही थी, बीच-बीच में खिड़की से काला आकाश देखती और सोचती -उड़ गया होगा विवेक का जहाज़..
अगले दिन. दिन भर संयोगिता फोन के पास ही बैठी रही। कही मिस न हो जाये विवेक का कॉल। शाम को विवेक का फोन आया। -माँ, हम ठीक से पहुच गए हैं। अपना ख्याल रखना। बहुत सुंदर देश है। बहुत अच्छे लोग हैं यहाँ के, अपने जैसे ही लग रहे हैं सब। -विवेक बोलता जा रहा था.. और संयोगिता सिर्फ उसकी आवाज सुन कर मुस्कुरा रही थी। फिर कुछ देर में फोन कट गया।
अब तो बस फोन से ही बात होती थी। पहले दो-तीन दिन मे, फिर एक हफ्ते बाद होने लगी। उसके बाद पंद्रह दिनों में आने लगा फोन। माँ कहती सौम्या से बात तो करा  -इस पर विवेक खुद ही बोल देता – माँ, वो बहुत थक जाती है न, ऑफिस मे बहुत काम होता है, फिर घर भी देखना होता है न, दो जनो की सैलरी भी हम लोगों को कम पड़ जाती है माँ यहाँ। माँ, सौम्या क्या गजब का खाना बनाती है माँ। चिन्ता मत करना अच्छे से हैं हम लोग। अच्छा रखता हूं फोन, अपना ध्यान रखना.. कोई बात हो फोन कर देना..
रसोई मे कुछ बहुत तेज़ कुछ टूटने की आवाज आई, देखा तो एक बहुत पुराना कांच का गिलास था।  शायद कोई चूहा होगा। काँच इठट्ठा करने में एक बारीक नोक संयोगिता की उंगलियों में चुभ गई। लेकिन उसको अब दर्द ज्यादा नहीं होता था। वैसे भी अब फुल टाइम मेड अब हटा दी थी। क्या हुआ जो टूट गया, एक पुराना गिलास ही तो था, अब जरुरत भी क्या थी। अंजली का लाया हुआ नया सेट खूब चमक रहा था, संयोगिता हर चीज़ संभाल कर रखे हुए थी।
 इतने बड़े घर मे अकेली हो गई थी तो पीछे वाले पोर्शन मे कुछ स्टूडेंट्स रख लिए थे। बस उन्हीं बच्चों में कभी-कभी विवेक का चेहरा ढूंढ लेती थी वो। आज विवेक को गए हुए दो साल हो चुके थे।  एक छोटा विवेक भी आ गया था उधर जो अब चार महीने का हो गया था। वीडियो कॉल पर देखा था था उसे संयोगिता ने। कुछ पुरानी एल्बम, पुरानी यादें -यही दुनिया थी अब संयोगिता की जिन्हें हथेलियों के बीच लेकर अपनी आराम कुर्सी पर देखा करती थी अकसर।
आज उसे एक पुराना गाना याद आ गया. बिछड़े सभी बारी बारी। एक समय था जब बच्चों को खाना बना के खिलाना संयोगिता को कितना अच्छा लगता था। और अब विवेक को सौम्या के हाथ का खाना बहुत भाता है। बहुत तारीफ करता है वो उसके खाने की। ये सारी बातें भी वो अपनी आराम कुर्सी पर सोचती है। काश, इस गाने पर भी ध्यान दे लिया होता कभी। बस ये यादें ही तो थीं आज जो उसकी अपनी हमसफर हैं अब। ये गीत फिल्म आपकी कसम का था जो उसके कानों में गुनगुना रहा था – ज़िन्दगी के सफर मे गुज़र जाते हैं जो मकाम.. वो फिर नहीं आते..

(पूनम शर्मा)

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here