अन्तिम सफर पर गतिमान जीवन

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चल पड़ी जिन्दगी अपनी
अंतिम सफर की ओर
अन्तिम घड़ी अब आन पड़ी
जिंदगी का दर्प तोड़
लाश ये बेसुध पड़ी 
मोह माया त्याग पंछी उड़ चला
जो बरसते थे नयन
अपनी ही व्यथा पे
आज कैसे जीवन के
अंतिम समय शून्य पड़ा 
जीवन के अंतिम क्षण ने फैला दिया
चहुँदिश उजाला मिटा दिया
सब अहम , मोह, माया
और द्वेष तिरोहित हो गये
रह गया सिर्फ मैं
आत्मा में सिमटा अकेला
चहु दिशा में फैल रहा
सारी उम्र तम का कुहासा 
लो चल पड़ी जिन्दगी अपनी
अंतिम सफर की ओर..

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