बूंद जो बन गई मोती (भाग-2)

बेटा मेरे लिये खास था तो बिटिया बहुत खास..अब मैं अपने दोनों  बच्चों के साथ सहज हो गई थी| सारा घर मेरे धीरज और साहस से अचंभित था..

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मेरे दोनों बच्चे नियत समय पर स्कूल आने-जाने लगे |  मेरी दिनचर्या अब उनके टाईम टेबल के अनुसार ढल गई |
मैं हमेशा आत्म निर्भर रही हूँ |  किसी भी प्रकार की जानकारी प्राप्त करने के लिये सदैव मेरा स्वयं का अपने स्तर का प्रयास होता है |  किसी पर निर्भर रहना कतई पसंद नही मुझे |  अंतरजाल(इंटरनेट) के माध्यम से मैंने ऑटिज़्म से ग्रस्त बच्चों के बारे में कुछ और जानकारी भी हासिल की,किताबें भी पढ़ी ताकि उनके मनोविज्ञान…उनकी साईकोलोजी को समझ सकूँ और ये रिसर्च मेरे लिये कारगर सिद्ध हुई |
मैं अंशिका के साथ अब अच्छा ताल-मेल बैठा लेती थी |  उसकी हर बात..उसके संकेत अब मुझे समझ आने लगे थे कि कब उसे क्या चाहिये |  शशांक के साथ सब कुछ सामान्य था क्यूँकि वो एक सामान्य बच्चा था |  शुरूआती दौर में हर माँ को अपने बच्चे का लालन-पालन करने में दिक्कतें आती हैं जब वो पहली बार माँ बनती है |  मुझे भी आई जब शशांक पैदा हुआ था |  परन्तु दूसरे बच्चे के जन्म के बाद अंशिका के साथ मेरे पहले वाले अनुभव कुछ ज़्यादा काम नही आये |  क्यूँकि वो एक स्पेशल बच्ची है |  अब मैं अपने दोनों  बच्चों के साथ सहज हो गई थी |  मेरे पतिदेव ,मेरी जेठानियाँ और सासु माँ मेरे धीरज और साहस देखकर हैरान थे |  पता तो था उन्हें कि मैं परिस्थितियों से हार मानने वालों में से नही हूँ लेकिन इस सत्य के साथ इतनी शीघ्र सहज हो जाऊँगी ये सोचा नही था उन्होंने |
जैसा कि अंशिका अपना कोई भी कार्य करने में सक्षम नही थी तो हर कार्य में मुझे उसकी सहायता करनी होती थी जिसमें नित्य कर्म से निवृत होने से लेकर नहलाना-खिलाना सब शामिल था |  एक छोटे बच्चे के साथ ये सब करने में दिक्कत नही आती परन्तु बच्चे जब बड़े हो जाये तो ये प्रतिदन का चैलेंज हो जाता है आपके लिये |  वैसे वो घर से ही निवृत हो कर ही जाती थी और दोपहर दो बजे तक घर आ कर ही शँका होने पर घर पर ही दुबारा निवृत होती थी |  परन्तु कभी-कभी रूटीन से हटकर ये स्कूल में भी हो जाता था |  उस वक्त मैं उसके कुछ कपड़़े स्कूल बैग में डालकर दिया करती थी ताकि बच्चा गंदा कर दे तो वहाँ स्कूल में काम करने वाली दीदी की ड़्यूटी होती थी उनके कपड़े बदलने और साफ-सफाई करने के लिये |  एक दो बार देखा कि उस दीदी ने अंशिका के कपड़ो में लगी गंदगी को पैकेट में डालकर स्कूल बैग में रखकर वापस भेज दिया |  बैग खोला तो मेरा दिमाग घूम गया ये देखकर |
मैंने देखा अंशिका के चेहरे पर नाखूनों के निशान भी थे |  सामान्य बच्चे स्कूल में ऐसा उनके साथ कुछ होने पर घर आकर बताते हैं पर ऑटीज़्म से ग्रस्त बच्चों के साथ ये बात नही |  अंशिका ने कुछ इशारा नही दिया मुझे |  मैंने ही देखा उसके चेहरे पर नोंचने के निशान बने हुए थे |  देर रात मुझे नींद नही आई और मैं सोचती रही कि अंशिका को खुद को नोंचने की आदत होती तो कभी घर पर भी तो ऐसा करती जो उसने कभी नही किया |  मैं समझ गई कि ये विद्यालय क़ी काम वाली बाई की कारस्तानी है  |  दूसरे दिन मैं स्वयं अंशिका को लेकर स्कूल पहुँची और सर को सारी बातों से अवगत कराया |  शिकायत आने पर अंशिका के साथ ऐसा दुबारा नही हुआ |  मुझे पता था कि उसकी ये स्थिति लाईलाज है |  परन्तु जो भी है उसके जीवन को एक सही रूटीन और दिशा देना तो आवश्यक था |  कुछ पहचान के लोगों के विरोधाभास जानकर भी मैं अपने फैसले पर अटल रही |  स्कूल भेजना जारी रखा |
समयानुसार सोच और तरीके भी बदलते हैं |  मैं अब अंशु यानि अंशिका को बेबी डायपर पहना कर स्कूल भेजने लगी और स्कूल बैग में भी एक-दो अलग से रख देती थी |  जिससे उसके कपड़े खराब होने की परिस्थिति फिर कभी न आई |  स्कूल की दीदी भी खुश थी जब मैं अंशिका के जन्मदिन पर स्कूल गई थी उसके हाथ से सभी बच्चों ,शिक्षकगण और स्टॉफ को चॉकलेट और मिठाई बँटवाने |  दीदी ने अंशिका के साथ अपने द्वारा किये गये व्यवहार पर माफी माँगी मुझसे |  मेरी आँखों में प्रेम भाव थे उसके लिये |  समझ सकती थी कि उन्हें भी ये कार्य अपने जीवन-यापन हेतु ही करना पड़ता है पर उन्होंने अंशिका के बारे में सकारात्मक सोच रखी ये बड़ी बात है |  उस दिन के बाद से मेरा आत्म विश्वास अंशु को लेकर और भी ज़्यादा सकारात्मक हो गया |
दोनों बच्चे बड़े होने लगे |  शशांक भी अब अपनी बहन के बारे में सब कुछ जानने समझने लगा था |  वो भी अंशिका का एक बहुत अच्छा बड़ा भाई और कम्पेनियन साबित हो रहा था |  इतनी छोटी उम्र में उसकी ये समझ देखकर मैं हैरान और खुश भी थी |
उम्र के साथ-साथ शारिरीक परिवर्तन सामान्य सी बात है जो दोनों बच्चों में ही आ रहे थे |  अंशिका का दिमाग भले ही छोटी उम्र में ठहर गया  था पर शरीर के हर सिस्टम और अंगों का विकास बिल्कुल सामान्य था |  ज़ाहिर है हर लड़की की तरह उसे भी ग्यारह वर्ष की उम्र से मासिक धर्म आना शुरू हो गया |  जैसा कि वो स्वयं कुछ बता नही पाती थी |  उसके कपड़ों पर धब्बे देख कर मैं समझ गई थी |   समझ गई थी कि अब बिटिया सयानी हो गई |
एक लड़की की माँ होना वैसे भी बहुत ज़िम्मेदारी का काम है और अंशिका का मुझे और ज़्यादा ख्याल रखने की ज़रूरत थी अब |  क्यूँकि मैं ये सब हिदायतें उसे नही समझा सकती थी कि अब वो युवावस्था में कदम रख रही है तो अपने स्वयं में होते शारीरिक विकास और उसकी सँभाल के प्रति उसे सजग रहना चाहिये ताकि कोई उसका फायदा न उठा सके |  इस बार मैं थोड़ी चिंतित ज़रूर थी |  मेरी परिवार के एक सदस्य ने मुझे ये सलाह दी कि अंशिका का यूटरस(बच्च्दानी) निकलवा दी जाये आपरेशन करके तो हर महीने के मासिक धर्म और उससे होने वाली परेशानियों से निजात मिलेगी उसे।
मैंने अपनी एक गाईनो महिला मित्र से पूछा तो उन्होंने साफ मना कर दिया और कहा कि ऐसा करने से एक तो उसके शरीर की गर्मी सामान्य प्रक्रिया से निकलनी बंद हो जायेगी और दूसरे हज़ार कॉम्प्लीकेशन और बीमारियाँ पकड़ लेंगी उसे|  तब मैंने इसका ख्याल छोड़ दिया..हाँ कुछ परेशान ज़रूर थी पर परेशानी को खुद पर ज़्यादा हावी नही होने दिया |  शायद ये मेरी खूबी है कि मैं बातों को ज़्यादा सोचकर परेशान नही होती |  बस समझ लेती हूँ और अपना कॉन्सेप्ट साफ रखती हूँ कि मुझे अब ये करना है |  बस अब महीने के उन तीन-चार दिन मैं उसे स्कूल नही भेजती थी |
कभी-कभी बीच-बीच में अंशिका का फीड बैक लेने और उसकी स्कूल फीस भरने स्कूल जाना ह़ोता था |  वहाँ दूसरे बच्चों के अभिभावक भी आते थे |  मैंने देखा अंशु तीन दूसरे बच्चों के साथ बैठी थी |  हालांकि अंशिका ज़्यादातर अकेले ही बैठती थी |  ऐसे बच्चे ज़्यादातर अकेले रहना ही पसंद करते हैं |  परन्तु उसे दूसरे बच्चों के साथ घुलता-मिलता देख मुझे अच्छा लगा |  अचानक देखा एक श्रीमान आये और उन तीनों बच्चों को अपने साथ लेकर चले गये |  मैं उन्हें जाते हुए देख  रही थी कुछ समझ नही पाई |  सर ये भाँप गये और मुझे बताया कि ये तीनों बच्चे उन्हीं सज्जन के हैं |  मैं भौंचक्की रह गई ये सुनकर कि तीनों बच्चे उनके और तीनों ही स्पेशल..?हे प्रभु!! क्या है ये तेरी लीला..सोच रही थी |
मैंने सर को अंशु की फीस दी जो उन दिनों 150 रूपये महीने की हुआ करती थी |  सर मुस्कुरा रहे थे…मैं समझ नही पाई उनके मुस्कुराने की वजह |  तब उन्होंने बताया कि उन्हें ये देखकर बहुत प्रसन्नता होती है कि मैंने अपनी बच्ची को बिल्कुल सामान्य तरीके की परवरिश दी है |  उसे बोझ नही समझा |  मुझे ये सुनकर अटपटा लगा |  सर समझ गये थे …उन्होंने आगे कहा कि “मैं ये इसलिये कह रहा हूँ कि ये महोदय मिस्टर शरद सरीन एक सरकारी कार्यालय में उच्च पद पर आसीन हैं |  परन्तु अपने बच्चों की फीस सरकार द्वारा चलाई गई मुहिम के तहत मेंटल डिस्ऑर्डर वाले  बच्चों के बैंक से भरवाते हैं |  जबकि वे सक्षम है पूरी तरह से स्वयं उनका खर्च उठाने के लिये |  हालांकि ये योजना ऐसे सभी बच्चों के लिये है परन्तु जो माँ-बाप अपने ऐसे बच्चों का खर्च नही उठा सकते |  उन्हें इस योजना का लाभ मिले तो ज़्यादा उचित है |  पर ये सब अपनी-अपनी सोच और मानसिकता पर निर्भर करता है |  “सर बिल्कुल सही कह रहे थे |
कितनी गलत मानसिकता है कि यदि आपका बच्चा ऐसी परिस्थिति में है तो वो उसका भी दोष नही पर क्या आपके स्वयं की सोच और मानसिकता विकलांग नही?शर्म आनी चाहिये ऐसे लोगों को….मेरा मन क्रोध और करूणा से भर गया| रास्ते भर यही सोचती रही कि जब माता-पिता ही अपनी संतान के लिये नही सोचेगें तो भला और कौन सोचेगा?
मुझे ये सोचकर और भी क्रोध आता है कि लोग-बाग मानसिक रूप से विकलाँग बच्चों को हेय और दया दृष्टि से क्यूँ देखते हैं?क्या वे इंसान नही….क्या उन्हें जीवन के हर सुख का आनन्द उठाने का अधिकार नही? क्यूँ उनके साथ सामान्य व्यवहार नही किया जा सकता बिना उनको ये जताये कि वे आत्म-केंद्रित बच्चे हैं| हाँ ज़रूर वे अपनी दुनिया में खोये रहना ज़्यादा पसंद करते हैं.. बिना कोशिश किये कि दुनिया में क्या-क्या हो रहा है?परन्तु हम स्वयं चाहें और प्रयास करें तो वो हमारी इस रंग-बिरंगी सुंदर दुनिया का हिस्सा ज़रूर बन सकते हैं पर कदम और हाथ हमें ही बढ़ाना होगा ना|
मैंने इसके लिये प्रयास किया … .अब मैं शशाँक के साथ-साथ अंशिका को भी टी वी पर संगीत,सीरीयल दिखाकर मनोरंजन की दुनिया से जोड़ने लगी| ताकि वो भी अपनी ज़िन्दगी बेहतरीन तरीके से जी सके| मैंने देखा कि वो भी शशाँक की तरह गाने की धुन पर अपने ही एक अलग,न्यारे अँदाज़ में थिरकने लगी| मेरी प्यारी अंशिका भी दूसरे ऑटिज़म से पीड़ित बच्चों की तरह एक चीज़ बार-बार दोहराती थी और खुशी की बात ये थी कि वो जिस चीज़ को बार-बार दोहराती थी वे सकारात्मक और स्वीकारात्मक थी| एक पैर आगे दूसरा पैर थोड़ा पीछे करके वो अपनी विशेष मुद्रा में नृत्य करती थी जो आज भी जारी है| संगीत लगा दो तो वो शब्दों का अर्थ समझ पाने में असमर्थ होने पर संगीत की धुन पर अपने अनोखे अँदाज़ में झूमने लगती है जो उसकी ढेर सारी खुशी को ज़ाहिर करता है|
उन दिनों एक मूवी आई थी…”बरफी”..जिसकी नायिका भी ऑटिज़्म का शिकार थी| उस फिल्म का एक गीत है जो अशिका को बहुत पसंद है…”इत्ती सी हँसी,इत्ती सी खुशी इत्ता सा टुकड़ा चाँद का..ख्वाबों के तिनकों से चल बना लें आशियां| “अंशिका ये गीत सुनकर बहुत खुश होकर नृत्य करने लगती है और मैं उसे देखकर खुश हो जाती हूँ कि मेरी बच्ची प्रसन्न है| मेरी बच्ची,मेरी गुड़िया को किसी की नज़र न लगे| ये सोचकर उसकी बलईय्यां लेती और उसका माथा चूम लेती हूँ|
आपको पता है अंशिका को भी सामान्य बच्चों की तरह आलू के पराँठे,पनीर की सब्ज़ी बहुत पसंद है| हफ्ते में दो-तीन बार जो उसे बहुत पसंद है वो बना कर खिलाती| परन्तु बाकि दिन भोजन हल्का खिलाती हूँ…क्यूँकि अँशु की फिज़ीकल मूवमेंट कम था तो खाना पचने में दिक्कत हो सकती थी|
धीरे-धीरे ये समझ आने लगा कि जब वो बहुत खुश होती है तो संगीत सुनना पसंद करती है और उस पर थिरकना उसे पसंद है| जो बात पसंद नही आती या मनपसंद खाना न होने पर थोड़ा तेज़ आवाज़ में चीख कर उसका विरोध करती है| जिसे अब मेरे साथ-साथ घर के सारे सदस्य समझने लगे थे| ज़िन्दगी अच्छी बीत रहीथी| परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बैठा लेना ही समझदारी है…..है ना!!
आज मुझे मेरे मित्र की भतीजी की शादी में जाना था| सोच रही थी इन्कार कर दूँगी| अंशिका को छोड़कर नही जाना चाहती थी| सासु माँ ने कहा .. “हम सब हैं ना…क्यूँ चिंता करती हो…देव का मन है(मेरे पति)…हो आओ ना …..तुम्हारा भी माहौल और मूड बदल जायेगा| जाओ बेटा| “मेरी अपनी माँ का भी यही ख्याल था कि मुझे विवाह में ज़रूर जाना चाहिये|
मैं मना नही कर पाई| खुश थी… विवाह में गई पति के साथ|
उस दिन मैंने काफी दिनों बाद श्रृंगार किया…देव की फेवरेट साड़ी पहनी| मुझे इतने दिनों बाद ऐसे देखकर वो मुझे देखते रह गये| मैं मुस्कुरा कर शरमा गई जैसे कल ही शादी हुई हो हमारी|
गृहस्थी और बच्चों की देखभाल में एक औरत खुद को इतना झोंक देती है कि खुद के सौन्दर्य पर उसकी समझ और ध्यान कम हो जाता है .. हाँ पर मातृत्व और एक विवाहिता का सौन्दर्य उसके मुखड़े और शरीर के भराव में दृष्टिगोचर होता है|
खैर हम विवाह स्थल पहुँचे| सबसे काफी समय बाद मिल रही थी| बहुत अच्छा लग रहा था| मायके के बाद ये पहला अवसर था दयानन्द(दया)से और उसके परिवार से मिलने का| मेरे मायके के परिवार से दया के परिवार के बहुत घनिष्ठ और घरेलु सम्बंध थे| मेरी माँ भी प्रसन्न थी मेरे और देव के आने से| सभी से मिली|
मैंने देखा मेरे मित्र दया की भाभी जी जिनके दो लड़कियाँ थी|  बड़ी लड़की का विवाह था| उनकी छोटी पुत्री भी स्पेशल बच्ची है ये देखा मैंने| इसलिये विवाह का ज़्यादातर कार्य उनके पति और दया ही सँभाल रहे थे| क्यूँकि वे अपनी पुत्री को अकेला नही छोड़ सकती थीं| जो मैं भली-भाँति समझ सकती थी| मैं उस वक्त ये सोच रही थी कि मैं कितनी भाग्यशाली हूँ कि मेरे साथ मेरा परिवार है जो मेरी हर कोशिश में मेरे साथ है|
तभी देखा दया की भाभीजी के पिताजी बड़ा झुंझला कर अपनी बेटी से कह रहे थे कि “मन करता है इस आफत का गला दबा दूँ”….हे प्रभु!! ये क्या सुन लिया मैंने?मेरी आँखों में आँसू आ गये…कोई … ..कोई इतनी गिरी हुई और निर्दय सोच कैसे रख सकता है?मेरी अंशिका के लिये कोई ऐसा सोचेगा तो ये जानकर भी मैं सह नही पाऊँगी|
रात बहुत हो गई थी| मैं और देव घर लौट आये|  अंशिका मुझसे चिपक कर सोई हुई थी| मेरी आँखों में नींद नही थी| विवाह वाला वाकया रह-रह कर मुझे याद आ रहा था| फिर कब आँख लग गई पता न चला|
कुछ वर्षों बाद मुझे किन्ही घरेलू कारणों से स्टेशन बदलना पड़ा और मैं दोनों बच्चों सहित पटना से अपने मायके मसूरी आ गई|
वहाँ आकर फिर बच्चों का स्कूल में दाखिला करवाने गई| बेटे का एडमिशन तो हो गया| परन्तु अंशिका के लिये उसके अनुसार स्पेशल स्कूल यानि “इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटली हेंडिकैप्ड चिल्ड्रेन” की खोज की| वहाँ गई तो वहाँ पर कार्यरत स्कूल कर्मचारी ने अंशिका की उम्र का बहाना बनाया और एडमिशन देने से मना कर दिया ये कहकर कि मेरी बच्ची उम्र में स्कूल के हिसाब से काफी बड़ी है| उस वक्त अंशिका की उम्र बाईस वर्ष की थी| उस कर्मचारी की मूढ़ बातें सुनकर मैं हैरान थी कि ऐसे बच्चों के लिये शारीरिक उम्र का बँधन कबसे मान्यता रखने लगा ज़बकि इनका दिमागी विकास दो-तीन वर्ष के बच्चों के दिमाग जैसा होता है|
पटना में जिस इंस्टीट्यूट में अंशिका जाती थी वहाँ के सर कहते थे ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों को स्कूल में दाखिले के लिये शारीरिक उम्र कोई मुद्दा ही नही है.. क्यूँकि इनकी दिमागी स्थिति ढाई-तीन वर्ष के बच्चों जैसी होती है या उससे भी कम उम्र की|
मेरा प्रयास काम नही आया| वे लोग समझने को तैयार नही हुए या यूँ कहिये समझना ही नही चाहते थे| कुल मिला कर बात ये थी कि अंशिका पहले जिस स्कूल में थी तो वहाँ के शिक्षक ,कर्मचारी,दीदी सबके साथ अंशिका घुल-मिल गई थी| एक पारिवारिक माहौल था| परन्तु यहाँ के कर्मचारियों और शिक्षकों को अंशिका के साथ तालमेल और सामंजस्य बैठाने में काफी मेहनत और ज़द्दोज़हद करनी पड़ती| खैर मैंने फिर अंशिका को घर पर ही रखा और पुराना रूटीन फॉलो करती रही|
दो वर्ष पश्चात मैं अपने परिवार के साथ गत वर्ष ही इन्दौर आ गई हूँ| जैसा कि आप जानते हैं पिछले वर्ष से ही कोरोना महामारी का प्रकोप पूरे संसार को प्रभावित कर रहा है| परिस्थिति की विषमता को समझते हुए उसका एडमिशन करवाना उचित नही लगा मुझे| वैसे भी जल्द ही सभी स्कूल-कॉलेज भी बंद हो गये थे|
मैं सविता खत्री एक पँजाबी परिवार से हूँ | जैसा कि आप सभी जानते ही होंगे कि पँजाबी अपनी दिलेरी,ज़िंदादिली और हौसले के लिये जाने जाते हैं तो ये सभी गुण मुझमें स्वत: जन्मजात या यूँ कहिये अनुवांशिक ही हैं|
मैंने हिम्मत न तब हारी थी जब अंशिका के मेंटल डिस्ऑर्डर के बारे में पता लगा था और आज भी उसे लेकर पूरी तरह से सकारात्मक सोच रखती हूँ|
“ऑटिज़्म” बस एक दिमाग की ऐसी स्थिति है,जिसमें दिमाग़ एक उम्र में ठहर जाता है और बच्चा उम्र बढ़ती जाने पर भी ठहरे हुए दिमाग़़ की उम्र के अनुसार व्यवहार करता है| “
एक बात और बताना चाहूँगी की बच्चे का ऐसा होना उसका दोष नही| ये अनुवांशिक कारणों से होता है या फिर वातावरण के अनुवांशिक तत्व पर प्रहार करने से होता है…जैसे गर्भधारण के दौरान खाने-पीने में आयरन,विटामिन की कमी वैक्सीन,पॉल्यूशन,लेड,किसी प्रकार के इंफेक्शन जैसी स्थिति का प्रहार जब जेनेटिक फैक्टर पर होता है तो बच्चा ऑटिज़्म से पीड़ित हो जाता है|
इसलिये़ एक से तीन वर्ष के बीच थोड़ा ध्यान रखना ज़रूरी है…यदि बच्चे में ऑटिज़म के लक्षण की शंका हो तो| मैंने परिवार के लोगों पर आस रखी बस यहीं चूक हुई शायद| वर्ना शायद अंशिका की स्थिति और बेहतर हो सकती थी|
ऐसे बच्चें को भरपूर प्यार देना चाहिये या यूँ कहिये ये “भगवान के बच्चे हैं| “बिल्कुल भोले,निरीह और मासूम…कोई छल-कपट नही| बस इन्हें आफत न समझे और डरें भी नही| जितना हो सके परवाह और प्रेम दें और उनकी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने के मार्ग प्रशस्त करें|
ये कभी पूरा ठीक नही होता ये सत्य है परन्तु सबसे ज़्यादा माता-पिता का साथ,मेहनत,डॉक्टर और थेरेपिस्ट का पूर्ण सहयोग एक ऑटिज़्म से जूझते बच्चे को बेहतर जीवन दे सकता है|
प्रेम और धीरज ही इस मार्ग की सफलता के मुख्य तत्व हैं और प्रेम से सिर्फ और सिर्फ प्रेम ही फैलता है..है ना !!!!!
(अंजू डोकानिया)

 

 

 

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