बूंद जो बन गई मोती (कहानी/भाग-1)

पर ये क्या? सामान्यत: बच्चे  जन्म लेने पर जैसे रोते हैं..मेरी बच्ची रोई ही नही | मैं अपनी बच्ची को अपनी बाँहों में देखकर सारा दर्द,परेशानी..सब कुछ भूल गई ..

15
506

ज़िंदगी और मौत के बीच का संघर्ष एक बच्चे को जन्म देती हुई औरत से बेहतर और कौन समझ सकता है?जिस यात्रा में आपको  ये मालुम हो जाता है आर या पार |  ब्रह्माण्ड याद आ जाता है | सरल नही है एक देह से दूसरे जीवन को जन्म देना | जब नये पौधे का जन्म होता है तो सीना फटता है धरती का | ठीक वैसा ही महसूस होता है,,,,,नव जीवन के आग़मन पर |
इससे पहले भी ये अनुभव कर चुकी थी अपने पुत्र शशांक के जन्म के समय |
तभी प्रार्थना की थी ईश्वर से कि “हे प्रभु!!बस अब एक बेटी दे देना..तो मेरा परिवार संपूर्ण हो जायेगा आपकी कृपा से |”
संयुक्त परिवार का सपना देखा था जो मुझे मिला विवाहोपरांत | मेरे पतिदेव चार भाई ,एक बहन हैं | सास-ससुर ,जेठ-जेठानी,सबके बच्चे..यानि कि भरा-पूरा परिवार है हमारा |
बड़े जेठजी के दो लड़के हैं | छोटे भाई साहब(जेठ) के दो लड़कियाँ | मैं यही सोचती थी कि कहीं तो कुछ कमी है…इसलिये बेटे के जन्म पर  ईश्वर को धन्यवाद देते हुए एक बेटी की कामना की थी |
ईश्वर सबकी सुनते हैं मेरी भी सुनी |
कुछ घण्टों के संघर्ष के पश्चात एक सुंदर,नाज़ुक,प्यारी-सी परी को जन्म दिया मैंने |
बेटी होने से पहले कुछ कॉम्प्लीकेशन्स थे..ड्यू डेट दो दिन ऊपर सरक गई थी | रात को पेट पर कुछ दबाव अवश्य महसूस कर रही थी | परन्तु लेबर पेन नही थे | कुछ बेचैनी-सी थी अंदर पर मैं घबराई नहीं | बचपन से ही डरना नहीं सीखा था मैंने | जो थोड़ा बहुत संकोच होता है वो मेरे दादाजी के उचित मार्ग दर्शन से जाता रहा | कुल मिलाकर ज़िन्दगी से आँख मिलाकर चलने का हौसला बचपन से ही संस्कार स्वरूप मिला मुझे |
मेरा वॉटर बैग फट जाने के कारण मम्मी जी (सास)ने मुझे अस्पताल ले जाना ही उचित समझा |
दर्द नहीं थे तो एनिमिया दिया गया मुझे | फिर लेबर पेन शुरू हुए |
एक नर्स की लापरवाही से मेरा बेबी गिर सकता था | पर अनुभवी डॉक्टर की समझ-बूझ ने सब कुछ सँभाल लिया और बिटिया का जन्म हुआ |
पर ये क्या? सामान्यत: बच्चे  जन्म लेने पर जैसे रोते हैं..मेरी बच्ची रोई ही नही | मैं अपनी बच्ची को अपनी बाँहों में देखकर सारा दर्द,परेशानी..सब कुछ भूल गई | उसकी नरम,कोमल देह,,,,रूई के फाहे जैसी,आँखें टिमटिमाते सितारों-सी,गुलाब की पँखुड़ियों से होँठ देखकर बस मैं निहाल हुई जा रही थी | मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद किया कि उन्होंने मेरी विनती सुन ली | एक चाँद-सी बिटिया का उपहार दिया मुझे |
बेटे के जन्म से पहले गर्भ धारण के दौरान और पूरे प्रेगनेन्सी पीरियड में मुझे कोई खास दिक्कत नही हुई | बस बेटे के जन्म के समय मेरा ब्लड प्रेशर काफी हाई था | डिलीवरी दोनों बच्चों के जन्म के दौरान नॉर्मल हुई |
परन्तु बिटिया के जन्म से पूर्व प्रेगनेन्सी के समय मैं काम करते वक्त बहुत थकान महसूस करती थी | संयुक्त परिवार मेें लोग होते हैं आपका ख्याल रखने के लिये परन्तु घर का कार्य भी किसी महाभारत के युद्ध लड़ने से कम नही होता | ये बात तो हर गृहिणी भली-भाँति समझ सकती है | लेकिन मैंने इन तकलीफों पर विशेष कभी ध्यान नही दिया | क्यूँकि ..जैसा कि मैंने बताया  मेरी परवरिश ऐसे वातावरण में हुई है कि मैं स्वयं को सँभालना जानती थी और हिम्मत बहुत रखती थी | जल्दी किसी से कहती नही थी | शायद यही कारण है कि मेरी सासु माँ उस वक्त इन्दौर मेरी जेठानी के पास डिलीवरी करवाने चली गई क्यूँकि उनकी तबीयत थोड़ी खराब रहती थी उस वक्त |
खैर, बेटी को लेकर पति के साथ घर आ गई | घर में उत्सव सा माहौल था | सब बहुत खुश  थे | दिन बीतते गये | मैं भी अपनी ज़िम्मेदारियों और बच्चों की देखभाल में जुटी रहती थी |
एक दिन मैं रसोई घर में काम कर रही थी | तभी मैंने देखा कि मेरी डेढ़ वर्ष की अंशिका कूड़ेदान से कूड़ा निकाल कर मुँह में रख रही थी | एक गृहिणी की बहुत सी ज़िम्मेदारियाँ होती हैं और परिवार में रहते हुए ऐसा बहुत कुछ देखना-समझना और सहना पड़ता है और मौन भी रहना पड़ता है | लेकिन वो फ्रस्ट्रेशन कही तो जाकर निकलती ही है | ऐसा मुझे नही करना चाहिये था पर मैंने उस दिन उसे पहली बार थप्पड़ लगाया | जो नही करना चाहिये था | मैंने गौर बाद में किया….. मुझे समझने में वक्त लगा कि एक सामान्य बच्चा चाहे कितनी भी शरारत करे पर कूड़ा नही खायेगा  |
कुछ दिनों बाद मैंने अपने जेठ जी (दूसरे नम्बर) को जो कि पेशे से डॉक्टर हैं अपने करीबी मित्र से बात करते सुना कि मेरी बच्ची सामान्य बच्चों जैसी नही है | “ऑटिज़्म” का शिकार है | हालांकि किसी की बातें सुनने की मंशा कभी नही रही मेरी | पर बचपन से ही मैं जो बातें मुझसे कही जाती या मेरे आस-पास जो भी हो रहा होता है उसके प्रति मैं काफी सजग और सचेत रहती हूँ | जो होना भी चाहिये | जब उन दोनों की बातें मेरे कानों में पड़ी तो एक क्षण के लिये स्तब्ध रह गई थी | पर ब्रोट अप ऐसा था मेरा कि स्वयं के साथ-साथ दूसरों को सँभालने की क्षमता भी मैं रखती हूँ | स्वयं को सँभाला और सोचा कि मेरे जेठ जी मेरा बच्ची के ट्रीटमेंट के विषय में कोई ठोस कदम जरूर उठायेगें | दिन बीतते गये मेरी बिटिया अट्टठारह महीने की हो चुकी थी और इन तीन महीनों में उसमें “ऑटिज्म” के लक्षण दृष्टिगोचर होने लगे थे | सामान्यत: बच्चे तीन-चार महीने के बाद छह महीने के होते-होते “आई कॉन्टेक्ट” करने लगते हैं | जो अंशिका इन दिनों नही कर रही थी  | चूँकि उसने इन सत्तरह महीनों मेंं  हल्का-फुल्का भी बोलना शुरू नहीं किया था परन्तु वो किसी बात का कोई इशारा भी नही देती थी….जैसे बच्चे टॉयलेट आने या भूख लगने पर देते हैं |
मैं उसका नाम पुकारती तो वो जवाब में मेरी तरफ न देखती न कुछ प्रतिक्रिया देती थी | मेरे लिये ये सब बिल्कुल अजीब था क्यूँकि जानकारी नही थी और जिनके सपोर्ट की उम्मीद थी….उनका कोई अता-पता ही नही था | पढ़ी-लिखी और आत्म निर्भर हूँ इसलिये मैंने अपनी समझ के अनुसार “गूगल” से कुछ जानकारी प्राप्त की और मेरा अंदेशा बिल्कुल सही था | अंशिका ने इन अट्ठारह महीनों में ठीक से खड़ा होना भी नही सीखा था | इस उम्र के बच्चे कुछ कुछ टूटा-फूटा तो बोल लेते हैं जैसा कि बेटे के वक्त अनुभव किया था मैंने | अंशिका नही बोल पाती थी |
एक माँ हूँ मुझे उसकी चिंता तो थी पर मैं घबराई नही |
मेरी माँ ने मुझे सलाह दी अपने डॉक्टर जेठ से मशवरा लेने की | मैंने स्वयं ही उनसे बात करके बच्ची को डॉक्टर को दिखाया |
ऑटिज़्म” से ग्रस्त बच्चे  की असेसमेंट कराई जाती है, जिसे “ऑटिज़्म टूल असेसमेंट” कहते हैं | बच्चे की हिस्ट्री ली जाती है अभिभावक से,बच्चे को ऑब्ज़रभेशन में रखा जाता है ये जानने के लिये कि बच्चा कैसी-कैसी बातों पर कैसी प्रतिक्रिया देता है या नही देता है | साईकोलोजिकल परीक्षण भी हुए बहुत सारे | ..ISFA,M CHAT,ADI TEST..और फिर इन सबके बाद ये साबित हो गया कि अंशिका वो “स्पेशल बच्ची” है जिसे अब हर क्षण मेरी देखभाल और परवाह की ज़रूरत थी | वैसे एक माँ हर उम्र में बच्चों को छोटा ही समझती है और हमेशा रास्ता दिखाती है ताकि उसके बच्चे को कोई तकलीफ न हो | परन्तु अंशिका के भाग्य में ये दुलार ज़रूरी भी था उसके जीवन को सुचारू और सुव्यवस्थित रूप से चलाने के लिये | कुछ ज़रूरी बातेंं ऐसे बच्चों के लिये डॉक्टर ने मुझे और पति को समझाई कि ये पूरी तरह से ठीक नही होता परन्तु यदि अभिभावक मेहनत करें, समझदारी और धीरज से काम लें तो ऐसे बच्चों को एक बेहतर जीवन दिया जा सकता है | हम घर वापस आये | क्लीनिक में पूरा दिन लग गया आज | अंशिका थक गई थी तो मैं उसे सुलाने लगी |
सुलाते-सुलाते उस मुरली वाले की ओर देख रही थी और मन में सवाल बस यही था कि “आखिर तूने मुझे जीवन का सबसे कड़ा इम्तिहान देने की पूरी तैयारी कर ही ली | क्यूँकि मैं मज़बूत हूँ,, ,?मजबूत तो हूँ पर हृदय तो एक ममता भरी माँ का दिया है तूने….ज़रा तो सोचना था प्रभु….” खुद पर ही हँसी और फिर आँखों में आये आँसुओं को स्वयं ही पोंछा | अंशिका कब की गोद में सो चुकी थी | तकिये का सिराहना दे कर उसे बिस्तर पर सुलाया और उठ खड़ी हुई जीवन का वास्तविक युद्ध लड़ने के लिये | जिसमें मुझे हर हाल में लड़कर विजय पानी है | पता नही कब तक ये संघर्ष है परन्तु अब मेरा उसकी अवधि पर कोई ध्यान नही था | ध्यान केंद्रित सिर्फ और सिर्फ अंशिका की परवरिश पर था  | जिसके लिये मुझे बस खुद के कँधों  पर ही विश्वास था और किसी पर नही |
तभी मेरा बेटा शशांक दौड़ता हुआ आया | मैंने उसे अपनी बाँहों में भरकर प्यार से उसका माथा चूमा | बेटे ने आँखें गीली देखकर बड़ी मासूमियत से अपनी नन्ही-नन्ही हथेलियों से उसे पोंछा | बोला…”मम्मा आप क्यूँ रो रहे हो?मत रोओ ना,,,प्लीज़ मम्मा” | फिर उसने मुझे प्यार से गालों पर चूमा जैस कृष्णा के रूप में कह रहा हो कि “सब ठीक होगा चिंता मत करो | मैं हर पल तुम्हारे साथ हूँ | “
पति के साथ ने मुझे हिम्मत दी कि चलो कोई नही हम मिलकर सब कुछ सँभाल लेगें | तब बस ये समझ पाई थी कि इस प्रकार के बच्चों को सँभालना एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है | पर वो आगे जा कर कितनी क्रिटिकल होगी इसका अँदाज़ा नही था |
आपको बताना चाहूँगी कि कोई  सौ में से एक बच्चा ऑटिज्म का शिकार होता है और ज़्यादातर लोग इसे बोझ समझ कर किसी सड़क के किनारे,मंदिर की सीढ़ियों पर,ट्रेनों में छोड़ आते हैं जैसे वो कोई सामान हो | जानती हूँ कि कहना आसान और वास्तविक जीवन में  हर दिन इस समस्या से जूझना दोनों अलग-अलग बातें हैं | परन्तु हम इंसान है | पशु-पक्षी भी अपने बच्चों के लालन-पालन की व्यवस्था करते हैं | फिर हम तो सृष्टि की सबसे उच्च और उत्तम संरचना है | हम सक्षम हैं हर कार्य करने के लिये | तो अपनी ज़िम्म्दारियों से पलायन करना बिल्कुल ग़लत है और मानवीय संवेदना का मूल्य तो हमें समझना ही चाहिये यदि सही अर्थों में मनुष्य है तो | यदि मैं जन्म से ऐसी होती और मेरे माता-पिता ने मुझे बोझ समझ कर कहीं छोड़ दिया होता तो मेरे साथ क्या-क्या गुज़र सकता था ये सोच कर भी मैं काँप उठी थी |
आह!!….मेरी फूल-सी बच्ची..उसका क्या दोष है..मैं उसे ये सज़ा नही दे सकती थी ऊपर से मातृत्व की कोमल भावना अपने शरीर के अँश को कैसे ऐसी परिस्थिति में अकेला छोड़ सकती है?हृदय के समंदर में विचार रूपी लहरों का उठना-गिरना निरंतर जारी था कि तभी अंशिका की चीखने की आवाज़ आई | मैंं बिना वक्त लगाये दौड़ पड़ी | पास गई तो वो बस चीखे जा रही थी समझ नही आ रहा था मुझे कि मैं क्या करूँ?कैसे समझूँ कि उसे क्या तकलीफ  हो रही है  | ऐसे बच्चे अपनी ज़रूरत ,अपनी तकलीफें बस चीख कर,रोकर ही दर्शा पाते हैं…मेरे लिये भी ये सब बिल्कुल नया था पर गूगल की खोज से प्राप्त जानकारी और डॉक्टर की बातें याद आई और  मैं उसे छू-छू कर उसे देखने लगी …अचानक मेरा हाथ उसके पेट पर गया और वो एकदम से चिल्लाने लगी | मुझे लगा तब कि उसे पेट दर्द हो रहा है | मैंने डॉक्टर से बात की फोन पर  | तो उन्होंने मुझसे पूछा कि “नाश्ता कितने बजे कराया उसे | “मैंने कहा “दो घंटे पहले पर सिर्फ दूध पिया उसने कुछ खाया ही नही | कहने पर भी नही मानी | “
तब डॉक्टर ने कहा कि मुझे बहुत ध्यान रखना होगा अंशिका का | जब वो न खाने की ज़िद् करे तो उसे किसी और बात में व्यस्त करके बहला-फुसला कर खिलाना होगा | जैसे हम बहुत छोटे बच्चों को खिलाते हैं और मुझे ध्यान से उसके खाने के समय पर उसे बिना देर किये खिलाना होगा | क्यूँकि ऐसे “स्पेशल बच्चों” का  एक उम्र के बाद दिमाग का  विकास रूक जाता है | एक से तीन वर्ष के बीच ही ये बीमारी (मेरे लिये तो नही बीमारी)विकसित होती है…तो ज़ाहिर है दिमाग  भी उसी उम्र के जितना विकसित हो पाता है | मेरे लिये ये बहुत बड़ा चैलेंज भी था और इम्तिहान भी | एक माँ अपने बच्चों की परवरिश में कभी फेल नही होना चाहती तो फिर मैं कैसे फेल होती | मैंने बिना देर लगाये उसे खीर खिलाई | खीर उसे बहुत पसंद है..वो खाते-खाते बिल्कुल शांत हो गई |
इस घटना से मैंने ये भी सीखा कि अंशिका का दिमाग भले ही सत्तरह महीने के बच्चे की उम्र में ठहर गया है पर उसकी अंदरूनी महसूस करने की क्षमता औरों से अधिक बढ़ गई है | सुबह नौ बजे नाश्ता करने के बाद घड़ी के काँटे से ठीक बारह बजे उसे लंच करने का समय हो गया बिना घड़ी मिलाये उसे समझ आ जाता था |
मतलब मुझे सब कुछ उसके अंदर की घड़ी के हिसाब से करना था |
तीन वर्ष की होते-होते उसके अंदर ऑटिज़्म के कुछ और लक्षण विकसित हो गये | वो स्वयं की ऊँगलियो और परछाईयोंं से खेलने लगी | खुद में ही अपनी दुनिया में मस्त रहने लगी | मैंने डॉक्टर से सलाह ली | उन्होंने कहा कि उसका(अंशिका)ध्यान बँटाना होगा दूसरी तरफ नहीं तो ऐसे बच्चों का “सोशल कनेक्शन” टूट जाता है | फिर उन्हें वास्तविक दुनिया में लाना बहुत मुश्किल काम है | ये करना है मगर बहुत धीरज और प्रेम से | नहीं तो ये बच्चे रिजीड या विकराल भी हो सकते हैं | मैंने डॉक्टर के कहे अनुसार अंशिका का ध्यान दूसरी बातों में लगाना शुरू किया | शुरूआत में दिक्कत आई पर फिर वो मेरी बात थोड़ा सुनने लगी | किसी ने परिवार में “मेडिकल थेरेपी” का सुझाव दिया | डॉक्टर से पूछने पर उन्होंने कहा कि इस स्थिति में मेडिकल उपचार,थेरेपी के साथ-साथ उससे भी ज़्यादा अभिभावकों की मेहनत,समझ और उनके भरपूर सहयोग  की आवश्यकता होती है | इसलिये माता-पिता को सिर्फ कुछ घण्टों की थेरेपी पर निर्भर या निश्चिंत न रह कर थेरेपिस्ट से प्लॉन चॉर्ट लेना चाहिये और उसके अनुसार घर पर बच्चे को गाईड करना..सिखाना चाहिये | एक बच्चे के पालन-पोषण में  एक माँ दिन-रात एक कर देती है | मेरी दादी मेरी माँ से कहती थी कि” एक बच्चे को पालने में एक देह गलती है तो दूसरा जीवन पूर्ण विकसित होता है | “अंशिका की परवरिश में थोड़ा और ज़्यादा ख्याल रखने की ज़रूरत थी..बस इतनी सी ही तो बात थी | मैं सब कर लूँगी मुझमें ये आत्म विश्वास कूट-कूट कर भरा था और इसी विश्वास ने मुझमें एक नई उर्जा भर दी |
दिन महीने बने,महीने साल | दोनों बच्चों को एक सा प्यार और दुलार दिया मैंने और पतिदेव ने | हाँ अंशिका का थोड़़ा ज़्यादा ध्यान रखना पड़ता था क्यूँकि वो ईश्वर का अनुपम उपहार “स्पेशल बच्ची” जो थी |
अब चुनौती थी अंशिका के जीवन को एक नई दिशा देने की | ताकि वो बाहर की दुनिया से “सोशल कनेक्शन” बना सके | खुद की बातें दूसरों को समझा सके  | क्यूँकि भाषा उसके पास नही थी | हाँ परन्तु उसके भी अपने भाव,एहसास और दुनिया है  | हमें उससे डरना नही है..उसे बहुत प्यार देना है और उसकी क्षमतानुसार आगे भी बढ़ाना है |
इसलिये मैंने अंशिका को भी शशांक  की तरह स्कूल भेजने का निश्चय किया | पर ऐसे स्पेशल बच्चों के लिये स्पेशल स्कूल भी होते हैं | दोनों बच्चों का दाखिला स्कूल में करवाया | अंशिका को  “इंस्टीट्यूट फॉर मेंटली हेंडिकैप्ड चिल्ड्रेन” भेजना शुरू किया | वो भी एक चुनौती पूर्ण कार्य था मेरे लिये | युद्ध तो मेरी बच्ची लड़ने जा रही थी..बाहर की दुनिया में कदम रखने जा रही थी और आप समझ सकते हैं कि बाहर की दुनिया मे  कोई किसी का नहीं और अंशिका जैसी मासूम…स्पेशल फीचर वाली बच्ची को कौन कितना समझ पायेगा ?इन विचारों का द्वन्द  मेरे अंतर्मन में चल रहा था | मैंने उसका टिफिन पैक किया | नाश्ता करा के स्कूल ले कर गई | वहाँ इसी की तरह पन्द्रह-बीस बच्चे थे | अंशिका इन बच्चों की तुलना में उम्र में सबसे छोटी थी | सब एक ही रोग से प्रभावित थे | पर जैसा कि ये एक “स्पेक्ट्रम डिस्ऑर्डर” है इसलिये हर बच्चे के अपने-अपने तरीके थे प्रतिक्रिया देने के |
मैं सर से जा कर मिली | बहुत चिंतित थी | अंशिका की कुछ ज़रूरी बातें और आदतों के विषय में उनको जानकारी दी | उन्हें ये भी बता दिया कि उसे उसकी अंदरूनी घड़ी के हिसाब से टिफिन करने की सहुलियत दी जाये…स्कूल के टिफिन टाईम के हिसाब से नही | वरना उसे कितना भी कहो वो नही खायेगी और उसे सँभालना मुश्किल हो जायेगा |
सर ने मुस्कुराते हुए मुझे आश्वस्त किया और निश्चिंत हो कर अंशिका को छोड़ जाने के लिये कहा | मुझसे कहा कि बच्ची की पूरा-पूरा ख्याल रखा जायेगा | उनकी सकारात्मकता देखकर मेरा मन कुछ शांत हुआ और मैं उसे छोड़कर चली आई | बेटे शशांक ने भी दो दिन पहले ही स्कूल जाना शुरू किया था | मगर मुझे उसकी इतनी फिक्र नही थी क्यूँकि उसके साथ सब कुछ सामान्य था | घर आ कर भी घर के कार्य मेें मन नही लग रहा था | बार-बार घड़ी की तरफ ध्यान जा रहा था कि अंशिका के आने का समय हुआ या नही?
मम्मी जी मेरी व्याकुलता और बेचैनी भाँप गई और पास आ कर मेरे सिर पर प्यार भरा हाथ फेरा और कहा कि “तू थक गई होगी.. जा थोड़ा आराम कर ले | “मेरा मन द्रवित हो उठा और मैंने माँ की तरफ मुस्कुरा कर देखा | वो मुझे प्यार भरी नज़रों से निहार रही थी |
सास भी माँ ही होती है ये बात मैं पहले से ही मानती थी परन्तु आज उनका प्रेम भरा ममतामयी स्पर्श मुझे अंदर तक छू गया |    (क्रमशः / अगले अंक में समाप्त)
(अन्जू डोकनिया)

15 COMMENTS

  1. बहुत बधाई अंजू सरस्वती मां तुम्हारा पथ प्रशस्त करें।

  2. सहृदय आभार दीदी|इस बधाई की हकदार आप भी उतनी ही हैं|इस कथा की प्रेरणा स्त्रोत|बहुत बधाई और शुभकामनाएँ आपको दीदी|

  3. नि:शब्द हूँ उस माँ के लिए जिसने इतना संघर्ष किया

    सच कहूं तो ये पढ़कर आँसू नहीं रोक पाया मैं

    Bahut shubhkamnaye

  4. बेहद खूबसूरत और मार्मिक कहानी जो यथार्थ को दर्शाती है
    कहानी के साथ साथ आप गीत गजल भी बहुत उम्दा लिखती
    है मैने सुना है आपको आदरणीया दी कमाल का लेखन मां शारदे आप पर हमेशा इसी तरह अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें
    ❤️

  5. हर पल जीवन एक संघर्ष है और इसी का नाम ज़िंदगी है।अपनी प्यारी सी बिटिया के लिए आँखों में आँसू दिल में दर्द लिए संघर्ष करती एक ममतमायी माँ को सलाम।।बहुत सुंदर लिखा तुमने अंजु बहुत बहुत शुभकामना तुम्हें बस यूँही लिखतीं रहो और बहुत आगे निकल जाओ यही दुआ करते है हम।।
    माँ तुझे सलाम

  6. ह्रदय को स्पर्श करती एक मजबुत माॅ की व्याकुलता,चिंतित, और अपनी बेटी के भविष्य के प्रति चिंतन करती एक मार्मिक कहानी । पहला भाग पढ़कर दूसरा भाग पढ़ने की जिज्ञासा बढ़ गयी । अच्छा लेखन ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here