कॉफी टेबिल पर एक Love Story

0
1275

कॉफी टेबिल पर ही मिले थे पहली बार हम.

टेबिल पर मौजूद आमने-सामने हम दोनों. आसपास और भी लोग थे, अपनी-अपनी टेबिलों पर विराजे हुए. रेस्टोरेंट में धीमे-धीमे संगीत चल रहा था.

मैंने कहा – ‘हाय, सना!’

उसने मेन्यू पर से निगाहें उठायीं – ‘नमस्कार!’

लगा जैसे उसकी निगाहों ने कुछ पूछा मुझसे.

‘बस यही कहना था, सुस्वागतम!’- मैने कहा.

-‘सुस्वागतम?’

‘ जी, मेरा मतलब था बहुत प्रसन्नता हुई आपसे मुलाकात हुई.’

‘जी, मुझे भी’

‘धन्यवाद आने के लिए!’ कह कर मैं थोड़ा खामोश होने वाला था. फिर उसके सामने रखे विष्णुसखाराम खांडेकर कृत ‘ययाति’ उपन्यास पर नज़र गई तो मुझे अपना प्रिय विषय मिल गया. मैने हिन्दी के साहित्यिक उपन्यासों पर व्याख्यान दे डाला. प्रसाद से लेकर शिवानी तक सभी का ज़िक्र था मेरे विश्लेषण में.

मुझे तो बहुत रोचक लगा जो बोला मैने. मुझे लगा कि वो प्रभावित हुई पर उसने प्रभावित होने का अभिनय नहीं किया.

सना ने कहा – ‘साहित्य प्रेमी ही मेरे मित्र बनते हैं.’

मेरे चेहरे पर मुस्कान आई. – ‘ये तो बहुत अच्छी बात है. मेरे साथ भी प्रायः ऐसा ही होता है.विचित्र किन्तु सुखद सत्य!’

सना – ‘जी, मुझे ऐसे ही मित्र चाहिये होते हैं.’

मैं – जी, धन्यवाद..मेरा सौभाग्य!’

‘साहित्य प्रेमियों को आज कल की युवा पीढ़ी बोरिंग समझती है..तो मैं और मेरे बोरिंग दोस्तों ने अलग दुनिया बना ली है अपनी’ – सना ने कहा.

मैं क्या कहता इस बात पर – ‘जी, जी..कोई संदेह नहीं..हम उनके लिये..बोरिंग ही हैं..’

थोड़ा रुक कर मैंने आगे कहा – ‘हमारी दुनिया में भावनायें हैं, दया है, करुणा है, मानवता है, प्रेम है, प्रकाश है..’

उसने मेरी बात पूरी होने की प्रतीक्षा की. फिर कहा – ‘जी हां, शब्दशः सत्य कहा आपने!’

मैंने कहा – ‘साहित्य में ही मानवीय मूल्य शेष रह गये हैं आज..पर मुझे ये भी विश्वास है कि आज की युवा पीढ़ी आगे चल कर हमारे पथ पर ही चलेगी..हमारा ही अनुसरण करेगी’

सना अपने बारे में कह रही थी – ‘ख़ैर, मैं तो जन्मजात बोरिंग थी’
शायद अपने साहित्यप्रेम को इस तरह प्रदर्शित कर रही थी वो. मैं चुप रहा.

उसने आगे कहा – ‘मैं हाई स्कूल में थी तब ‘गुनाहों का देवता’ और ‘यामा’ पढ़ती थी..शरतचन्द चट्टोपाध्याय का ‘देवदास’ मैंने कई बार पढ़ा..

जन्मजात बोरिंग सुन कर मुस्कान नहीं रोक पाया मैं – ‘क्या अंदाज है आपका!’

फिर याद आया उसने ‘गुनाहों का देवता’ और ‘यामा’ वाली बात भी कही थी. मैंने कहा- ‘जी बहुत अच्छा’
वो बोली – ‘साहित्य मेरे सर पर सवार रहा हमेशा’
मैंने कहा – ‘मैने भी उस किशोरवय में ही शरतचंद्र का परिचय जाना था और ‘आवारा मसीहा’ पढ़ी थी विष्णु प्रभाकर की.. साहित्य में विशेष रुचि ने ही मुझे औऱ आपको वह बना दिया जो हम आज हैं!’

सना के चेहरे पर उत्साह देख कर अच्छा लगा. वह कह रही थी – ‘और अमृता प्रीतम..मेरे लिए तो नशे जैसी होती थीं वो.. उनको पढ़ कर 2-4 बार मम्मी को स्त्री विमर्श का ज्ञान दे दिया और जम कर डाट खाई..’
मुझे हंसी आई. उसका मासूम हास्यबोध अच्छा लगा.

वेटर आ गया था.
– मैं बस कॉफ़ी लूंगी.
– ‘एक चाय और एक कॉफ़ी’ – मैंने वेटर से कहा.

अमृता का नाम सुन कर मुस्कान ठहर गई थी मेरे चेहरे पर. – ‘वाह, अमृता!’
‘जी’ – उसने कहा.
मैंने आगे कहा – ‘जी, इमरोज़..अमृता..साहिर..सुन्दर भावनाओं की सुन्दर विद्रोहिणी थी अमृता..कविता के जगत में बिन्दास लेखिका..जो जिया वो लिखा और जो लिखा वो जिया!’

-‘पर मैं तस्लीमा नसरीन से ज्यादा साहसी लेखिका किसी को नहीं मानती’
फिर सना ने मेरी इमरोज -अमृता-साहिर वाली बात पर प्रतिक्रिया दी – ‘जी हां, इमरोज’
‘जी, एक कमजोर प्रेमी..और उसके साथ एक उद्धत प्रेमिका
‘क्या कहानी है दोनो के प्रेम की..कमाल!’
मुझे अच्छा लगा सुन कर – ‘हां मानता हूं!’

फिर जो सुना मैंने, वो हैरान कर गया मुझे – ‘नहीं इमरोज कमज़ोर नहीं थे, एक समर्पित प्रेमी थे..यदि मुझे ऐसा प्रेमी मिले तो मैं दुनिया छोड़ दूँ!’

‘ओहह!’ – मेरे मुँह से निकला.

फिर अचानक वो पुरानी बात पर आ गई. उसे याद आया तस्लीमा को लेकर उसकी बात शायद अधूरी रह गई थी.
– ‘तसलीमा ने तो कायदे से देखा जाये तो अपनी जान की बाजी लगाई थी’

मेरे ह्रदय के तार झंकृत हो गए थे. – ‘एक बात कहूं’
‘जी!’
भावुक हो कर मैंने कहा – ‘आप मेरी बात को परिहास में लेना..पर मैं गंभीरता से कहूंगा..आपकी बात के उत्तर में..’

-‘जी, कहिये!’

‘कि मुझे यदि जीवन में अमृता जैसी प्रेमिका मिल जाती..तो शायद आज आपसे बात नहीं हो पाती!’
मेरे मन मे जो आया था मैने इमानदारी से कह दिया.

उसने गंभीरता से कहा – ‘उन्तीस साल की अविवाहित लड़की हूँ मैं.. और मैंने इसलिए नहीं की शादी.. घरवालों का दिल तोड़ दिया.. लेकिन शादी का इरादा आज भी नहीं है.. अब कोई कहता भी नहीं है!’

थोड़ा दुःख हुआ मुझे- ‘ओह!’

फिर मैंने सुना वो कह रही थी – ‘ओह.. आपको भी आपकी अमृता नहीं मिली..हा हा हा’
उसकी हंसी मुझे विस्मित कर रही थी. – ‘हां, नहीं मिली..मैने ढूंढी भी नहीं..’

मैंने आगे कहा – ‘क्योंकि मुझे लगा कि अमृता अब नहीं होतीं’
वो खामोश सुन रही थी. उसका मेरी और देखना भला सा लग रहा था मुझे.
– ‘एक ही हुई थी अमृता, जो इमरोज के लिये थी..मैं शायद लेट हो गया काफी!’

उसने संजीदे स्वर में कहा – ‘मुझे भी इमरोज के मिलने की उम्मीद नहीं है.. पर फिर भी मेरी आशा के दीपक जल रहे हैं!’

मैंने अमृता का परिचय उसे दिया जो पहले ही अमृता से सुपरिचित थी.

मैने कहा – ‘प्रति क्षण प्रेम को जीने का दुस्साहस करने वाली अमृता!’

हाँ..कोई शक नहीं!’

मैं भी बोल पड़ा – ‘अमृता पता नहीं कहां होगी’

उसने ऊपर दीवाल पर देखते हुए कहा – ‘इमरोज के लिये तो मैं ये कहूंगी कि वो मुझे ब्रह्मांड के किसी आयाम में कभी तो मिलेगा..’

मैंने भी उसे अपने मन का सच कहा – ‘आशा के दीप तो मैने नहीं जलाये..पर मुझे लाइफ के सरप्राइज पर यकीन हमेशा है..’

हम दोनों अपने अपने इमरोज और अमृता की काल्पनिक बातें कर रहे थे.

उसने उदासी के स्वर में कहा – ‘मेरी हिम्मत नहीं हुई शादी करने की..

-‘न न, अच्छा किया..शादी नहीं की’ -कहने के बाद मुझे लगा कि शायद ऐसा कहना उचित नहीं मेरा

उसने एक बार मेरी तरफ देखा फिर आगे कहा – ‘अपनी सबसे प्यारी सहेली की टूटी हुई शादी देखी है मैंने..उसे रोते बिलखते देखा है मैने..अगर मैं शादी करती तो..’

मैंने दृढ़ता से कहा – ‘तो अपने अस्तित्व की हत्या कर देतीं शायद आप’

उसकी सहमति उसके शब्दों में थी – ‘ओह..बहुत मुशकिल होता है अनचाहे रिश्ते को ढोना’

‘जी हाँ!’ – मैंने कहा.

अब उसने शादी को लेकर अपनी परिभाषा रखी – ‘शादी एक सामजिक समझौते से बढ़ कर कुछ नहीं है’
मैंने दो कदम आगे बढ़ कर कहा – ‘मैं तो कहता हूं कि शादी एक सामाजिक नासमझी है’

वह इस विषय पर बहुत गंभीर थी – ‘शादी जैसी तुच्छ चीज़ की प्रेम से तुलना करने वाले मुझे कतई पसंद नहीं..’
मैं शायद उसके लिए ही कह रहा था – ‘नासमझी हो जाती है नासमझी वाली उमर में!’
यहां मेरा तात्पर्य प्रेम से था. वो चुप रही.

मैने आगे कहा – ‘सहमत हूं मैं आपसे.. प्रेम तो अमृत है, उसकी तुलना नहीं हो सकती विवाह के कड़वे घूंट से’
‘मैं सही हूँ या ग़लत मैं नहीं जानती.. पर तय कर लिया है कि अपनी जिन्दगी अपने सिद्धांतों पर गुज़ारेंगे..’
उसका अपने सिद्धांतों को लेकर अटल होना अच्छा लगा. मैंने कहा -‘बहुत सुन्दर!’

फिर उसने मेरी तरफ देखते हुए पूछा – ‘आपने विवाह किय़ा है?
मुझे हंसी आई – ‘हाँ..ये गलती दो-दो बार की है मैने!’
-‘एक बार अपने कहने से’
-जी!
-‘एक बार मम्मी पापा के कहने से’
-‘अरे .. अच्छा दो शादियां की हैं आपने?’
-नहीं..शादी तो एक ही है लेकिन शादी को लेकर एक बार मम्मी पापा ने सहमति दी तो एक बार मैंने भी दी’
-‘मतलब?’
-‘मतलब ये कि बचपन में एक बार मेरी शादी के लिये मेरे पैरेन्ट्स ने हां की तो बड़े हो कर दूसरी बार मैने भी कर दी..’
बचपन में भी की आपने शादी? मतलब दो शादियाँ? इसलिये दुखी हो!’- उसे हंसी आ गई.
-‘नहीं..मैं खुश हूँ..और मैरिज भी एक ही हो रही है वो भी अरेंज मैरिज’ – मैंने कहा.
-‘मतलब? शादी अभी हुई नहीं है?’
– अरे..आई मीन कैसी?
‘हां..और अगले जनम में आवारा मसीहा बनूंगा..भगवान जी से बात हो गई है’- उसकी बात अनसुनी करके बोला मैं.

‘हा हा हा!’ – उसे हँसते हुए देखना अच्छा लगा.

– ‘जी हाँ..बाल विवाह हुआ था मेरा..बचपन में मैंने हाँ कर दी थी..बड़े हो कर मम्मी पापा ने!’

-‘ओह!..’ सना को मेरी बेचारगी पर शायद अफसोस हुआ.
अब लगा कि उसे मुझसे सहानुभूति है. उसने कहा –
‘नहीं नहीं…. अगला जन्म मिले न मिले… ये जुआ मत खेलना!’
‘न न..बिलकुल.. अगले जन्म में सिर्फ प्रेम करूंगा..उसके लिये ही एक जन्म और मांगा है मैंने’

मैंने सुना वो कह रही थी – ‘हा हा हा..आप तो बिलकुल मेरे जैसे हैं… दूर रहियेगा मुझसे…. मुझे आपसे प्यार हो सकता है’
मेरी हंसी उसका साथ दे रही थी या ये मेरी ख़ुशी वाली हंसी थी, मुझे नहीं पता.
मैने भी हंस कर पूछा- ‘धन्यवाद है जी..क्या ऐसा हो सकता है?’

वाह..उसकी बेबाकी ने मुझे हतप्रभ कर दिया – ‘हाँ, क्यूं नहीं हो सकता! आपको क्या लगता है?’
‘मुझे तो डर लगता है कि कहीं सचमुच हो न जाए प्यार!’ – मैंने भी हंस कर कहा.
बीच में ही मुस्कुराते हुए बोली वो – ‘जी..बिलकुल.. ये दुर्घटना घट सकती है आपके साथ कभी भी!’
मैंने अब अपनी गंभीरता के स्वर को सुना – ‘हाँ..सना.. किन्तु मुझे लगता है कि प्रेम आसान नहीं है.. प्रेम की गहनता और प्रेम की सरलता दोनो का साम्य निभाना सबके बस की बात नहीं!’
फिर मैंने उसकी दुर्घटना वाली बात पर मुस्कुरा कर कहा – ‘हां, बिलकुल.. इस दुर्घटना का स्वागत करूंगा’
मैंने उसकी तरफ देखा, वो कह रही थी – ‘आप भरोसा रखिये… आपसे वादा करती हूँ कि कभी मुझसे किसी प्रकार की तकलीफ़ आपको नहीं पहुचेगी!’

मैंने अपने दार्शनिक मन को स्वर दिया – ‘जीवन के प्रत्येक उपहार का स्वागत किया है मैने!’
फिर उसकी बात का जवाब दिया जो वादे वाली बात उसने कही थी, उसका उत्तर न देना उसका असम्मान होता शायद. – ‘विश्वास है मुझे..आपको विश्वास दिलाने की आवश्यकता नहीं..विश्वास पर ही आश्रित है प्रेम!’
वह बहुत मजबूत थी. उसने वैसे ही हवा में शब्द नहीं फेंक दिये थे.
मेरी तरफ देखे बिना दार्शनिक की भांति उसने भी कहा – ‘रंगमंच है जिन्दगी… अपना किरदार निभा कर चले जाना है सबको!’
‘औऱ प्रेम पर ही आश्रित है ये सारा संसार’
‘यस..सही कहा आपने!’

उसकी बात सुनते हुए मैं उसकी आँखों की चमक देख रहा था. वो कह रही थी – ‘बड़ा सुन्दर रंगमंच है जीवन!’
मैं सिर्फ सुन रहा था.
उसने आगे कहा – ‘लेकिन भारत में प्रेम की हत्या हो चुकी है…. यहाँ प्रेम के नियम क़ानून तय करता है’

मैंने भी अपना पक्ष रखा सशक्त भाव से – ‘ नहीं सना, मुझे अपना किरदार निभा कर निकल नहीं लेना है!’
प्रश्नवाचक दृष्टि से उसने मेरी तरफ देखा.
‘प्रेम का किरदार निभाऊंगा..उसको जियूंगा..और उसको ले कर ही अमर हो जाउंगा’
‘ओह..धन्यवाद!’ कह कर सना ने मेरी आँखों में देखा – ‘आप मेरे दोस्त बनेगे?’
मैं कहे जा रहा था. – ‘प्रेम आत्मा की भांति ही अनंत है अमर है!..’
लेकिन उसकी बात ने रोक दिया मुझे वहीं..क्या वास्तव में उसने ऐसा कहा था?
मैने कहा – ‘ओह.. स्वागत है आपका सना..बहुत प्रसन्नता होगी!’
मैंने स्वयं को आगे ये कहते सुना – ‘ये तो सम्मान के शब्द हैं आपके मेरे लिये.. धन्यवाद सना!’
‘मैने आपका चेहरा नहीं देखा’ – उसने कहा- ‘ज़रा देखिये तो मेरी तरफ’
वो मुस्कुरा रही थी. मुझे बहुत मीठा सा लगा उसका हास्यबोध.

-‘चलो, मैं भी देख लूं तुम्हें!’ – हंस कर उसके मुस्कुराते चेहरे को देखा मैने.

सना ने मेरी आँखों में उतर कर कहा – ‘रेगिस्तान में पानी के पोखर से लगे आप!’
बड़ा सुन्दर उपमान था उसका मेरे लिये. मुझे बहुत अच्छा लगा.
मैने भी ईमानदार तारीफ की उसकी – ‘साहित्यिक सौन्दर्य है आपके मुखमंडल पर!’
‘ओके, ढंग से देख लीजिये!’ – उसने मेरी ओर देख कर मानो अपने चेहरे का पोज़ बनाया..
मैने उसके मुस्कुराते चेहरे पर दो गोल-गोल हंसती हुई आँखें देखीं.
-‘आपसे मिल कर प्रसन्नता हुई सना!’
मुझे भी- वो बोली.

मेरा जन्म भी जयपुर का ही है..हम पड़ौसी भी हैं इस तरह..तुम ओरीजनली जोधपुर की ही हो ना?’
वो बस मुझे देख कर मुस्कुराती रही.

-‘और, हां तुम्हारा पिंकी नाम बहुत प्यारा है’.
उसने भोलेपन से कहा – ‘क्योंकि बचपन में पिंकी का कालम पढ़ना बहुत अच्छा लगता था’
-हा हा हा
‘क्या क्या पसंद है तुमको सना..मेरा मतलब तुम्हारी हॉबीज़?’- मैंने पूछा

– ‘किताबें पढ़ना..मेरे घर में मेरा कमरा और मैं बंद रहते हैं एकदूजे के साथ..और हमारे बीच में होती हैं किताबें.’
– ‘ओह..अच्छा!’
– ‘हां, मेरा कमरा देख के आपको शायद अच्छा न लगे.. बेतरतीब बिखरी किताबें!’
‘हा हा हा..वही तो प्यारा लगता है मुझे..किताबें चारों तरफ अलमारी में टेबिल पर बिस्तर पर..’ – मैने जवाब दिया.

-‘अब मुझे भी कहना होगा हम दोनो का काफी कुछ ..मिलता जुलता है यार ..जेएनयू से पढ़ाई हुई है मेरी..मेरे कमरे का भी यही हाल था.’
-‘सच मैं किताबों के साथ ही सोती हूँ..तीन हज़ार के करीब किताबें हैं मेरे पास’
-‘अऱे वाह!’
-‘ओह… जेएनयू में पढ़े हो आप’ – सना बोली.
– ‘पर इस मामले में दुर्भाग्य रहा मेरा.. मेरी पुस्तकों की दिल्ली कई बार लुटी’ – मैने अपने जीवन का सत्य कहा था उससे. पुस्तकें मुझे अतिप्रिय हैं और वही मेरे पास नहीं बचतीं.

-‘क्या पढ़ते हो आप..क्या पसंद है पढ़ना आपको?’
– ‘सब कुछ..साहित्य धर्म दर्शन..राजनीति को छोड़ कर सब कुछ’ – मैने कहा

-‘धर्म ..असल में 8 साल जम कर धर्म के बारे में पढ़ा मैंने…. और तब नास्तिक हो सकी..आप धर्म की गहराई में उतरिये …नास्तिक हो ही जाएँगे’
– हा हा हा ..सही कहा ..मैं आपकी ये बात आपको सिद्ध कर दूंगा ..किन्तु यहां नहीं..काफी बोलना पड़ेगा
– ‘जी..अच्छा!’
– ये तो अन्त है सापेक्षता का जहां हमें पता चलता है कि यह तो निरपेक्षता का सह-धर्मी है..साथ चलते हैं जीवन के कुछ तत्व पारस्परिक द्वंद्व बन कर..दिन रात और सुख दुख की तरह

-‘साहित्य के अलावा आप क्या करते हैं?’ – सना की उत्सुकता दिखी मुझे.
– ‘हा हा हा..साहित्य तो कहां कर पाते हैं यार..मीडिया में हैं, साहित्य के अतिरिक्त सब करते हैं..मगर हां, साहित्य करने की तमन्ना ले कर रोज़ जीते हैं ..कभी कभी हो जाता है लेखन..रचनाधर्मिता को यदा कदा अवसर दे ही देता हूं..बहुत संतुष्टि मिलती है..’
-‘मैं आ गई हूँ न… आपके जीवन में साहित्य घोल दूँगी’
-‘आहा..कितनी सुन्दर बात कही है तुमने सना.. बहुत स्पर्श किया तुम्हारे शब्दों ने मुझे!’
बाद में याद आया था मुझे कि यहां मैं सना के साथ आप से तुम पर आ गया था.
– ‘जी..’- सना मेरी तरफ देख रही थी
– ‘अब कैसे कहूं तुमको..धन्यवाद ..इस प्रसन्नता के लिये..जो दी है तुमने अभी मुझे’ – मेरा हृदय मेरा स्वर बन गया था.
-‘धन्यवाद कह कर बेगाना भी कर दिया आपने!’
-‘नहीं कहा ना..इसीलिये तो कहा कि कैसे कहूं!’

वैसे एक पुरूष एक स्त्री के हृदय को शायद ही समझ सके – वो बोली.
-ओह नो प्लीज ऐसा नहीं कहना दुबारा..सना..अगर आगे कभी मिले हम तो उस दिन ही उत्तर दूंगा तुमको

मैने फिर आगे कहा – वो लोग दुर्भाग्यशाली हैं जो नहीं समझ पाते स्त्री को..क्योंकि स्त्री के हृदय में मानवता बसती है औऱ सारे मानव मूल्य बसते हैं..इसलिये उसको समझने के लिये एक संवेदनशील मानव हृदय चाहिये!

‘चलों बच्चों..हो गया..अब ट्रेन भी पकड़नी है.’ – खान अंकल की आवाज़ आई. दरवाज़े पर उनके साथ पापा भी दिखे. पापा हमारे बिल का पेमेन्ट करने चले गये.
मम्मी ने पूछा – ‘कुछ खिलाया सना को?’
मम्मी और खान आंटी दोनो कब आ गईं थीं, पता ही नहीं चला.
मैने कहा नहीं..ध्यान ही नहीं रहा
‘चलो वहीं खायेंगे ट्रेन में..आधे घंटे में ट्रेन है’- सना की मम्मी बोलीं

हम लोग उठ गये. मैं सर झुकाये चल रहा था. रास्ते में एक बार भी सना की ओर नहीं देखा, ट्रेन में भी नहीं.
मम्मी बहुत चहक रहीं थीं. बाबा के आराम से दर्शन हुए. अच्छा हुआ पापा ने खान अंकल को भी ले लिया साथ में. उनकी फैमिली से भी मुलाकात हो गई. खान आंटी भी बाबा की भक्त निकलीं..

और हां, पापा बताते थे कि अंकल की बेटी भी अच्छा लिखती है. पत्रिकाओं में उसकी कहानियां छपती रहती हैं.
शिरड़ी के ट्रिप के बहाने दोनो फैमिलीज़ भी मिल लीं एक-दूसरे से..और मैं सना से..पहली बार.
शिरड़ी से जयपुर पहुंच कर विदा हुए हम दोनो..और हमारी ये पहली डेट हमारी पहली लव स्टोरी बन गई.

जैसा मैने कहा था..मेरी तो हां थी पापा-मम्मी की भी थी हां ही थी, बस उसके माबाप के हां का इन्तेजार था.
फिर फोन भी आ गया उधर से.. पापा ने हंस के बताया – मान गये वो भी..उनकी लाड़ली ने तो कसम खाई थी नहीं करूंगी शादी..अब कह रही है जल्दी शादी कर दो नहीं तो खुद कर लूंगी..
मम्मी भी हंस पड़ी.

फिर हमारी शादी हो गई. आज सना मेरे दो नन्हें-मुन्नों की मम्मी है. और आज हमारी शादी की सालगिरह है..

‘चाय कबकी ठंडी हो गई!’ – सना ने चौंका दिया मुझे.

ओ हां.. हांथ में शादी का एलबम लिये कहां चला गया था मैं.

‘कहां खो गये राइटर साहब?’

मैने बस इतना कहा – ‘फिर तुम्हारी कहानी याद आई, सना!’

(पारिजात त्रिपाठी)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here