फिर मिल गये हम ! – A Story by Anju

अब पीयूष भी थोड़ा गंभीर हो गया. उसका हृदय ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा. अमृता की बातों ने उसे किसी की याद जो दिला दी थी. पर वो,....वो तो.... नही. नही....ये वो कैसे हो सकती है

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दूर से ट्रेन के पटरियों पर दौड़ने की आवाज़ अमृता के कानों में पड़ रही था. काफी देर तक यह शोर जारी रहा. अतत: अमृता की नींद पूरी तरह से टूट गई. वह उठकर खिड़की के पास पहुँची तो दूर पटरियों पर भागती ट्रेन की आवाज़ अब भी सुनाई दे रही थी. मोबाइल खोला देखा रात के 2 बज रहे थे. गैलरी स्क्रॉल करते हुए पीयूष की तस्वीर पर नज़र ठहर गई.
अमृता गौर से देखने लगी पीयूष की तस्वीर… कितनी सुंदर मुस्कान है पीयूष की और आँखें.. बिल्कुल बोलती हुई जैसे अभी कुछ बोल पड़ेगीं. एकटक उसे निहारती रही. कितनी दीवानी है वो पीयूष की. पीयूष के सिवा कुछ सूझता ही नही था उसे…दिन रात बस पीयूष का नाम होता था अमृता के होंठों पर. अपनी मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करने वो कैलिफोर्निसा(सेनजोस) आई थी. कभी-कभी पीयूष की याद उसे बहुत बेचैन कर देती थी. अमृता अतीत की यादों में खो गई.
दोनों की मुलाकात भी ट्रेन में ही हुई थी जब से अमृता ट्रेन में चढ़ी थी एक “गुस्ताख मनचला” उसे छेड़ रहा था… फब्तियाँ कस रहा था. पीयूष सामने की बर्थ पर बैठे अखबार पढ़ने में लीन थे. अचानक चाय वाला आ गया
“चाय ले लो चाय, कॉफी.. कॉफी…चाय.. चाय”
“अरे भईया रूको! “
“जी बाबूजी”
“एक चाय तो देना”
“जी अभी लीजिए “
“कितने पैसे हुए”?
“जी दस रूपये”
पीयूष ने जेब में हाथ डाला.. वह टटोलता रहा लेकिन जेब तो खाली थी…..
” ओ शीट! पर्स तो घर पर ही भूल आया”
.
“अरे भइया ये चाय वापस ले लो”
“अरे क्यूँ भला, बाबूजी”
पीयूष कुछ सकुचाते हुए बोला
“नही मैं अपना बटुआ घर पर भूल आया”
पीयूष को आदत नही थी पर्स लेकर चलने की… वह अक्सर भूल जाया करता था.
“अरे कोनो बात नही बाबूजी, पैसे कल-परसों में दे देना. अभी चाय पील्यो आप.”
मुस्कराते हुए चाय वाले ने कहा.
“नही, नही मैं उधार नही रखता.”
तभी अमृता ने चाय वाले को बुलाया और एक चाय ली और बीस रुपये चाय वाले को दिये कहा “सामने वाले बाबूजी को भी चाय पिला दो.”
चाय वाले ने पीयूष को फिर से चाय दे दी.
“अरे कहा ना पैसे नही हैं मेरे पास अभी.”
“आपसे पैसे कौन माँग रहा है बाबूजी,आप चाय पीजिए ना.”
” नही ये मेरे उसूलों के खिलाफ है.”
“अरे पैसे सामने बर्थ वाली मैडम ने दे दिये, आप चाय पियो ना साहब.”
पीयूष को थोड़ा गुस्सा आया कि बिना उसकी मर्ज़ी जाने किसी अनजान ने उसकी चाय के पैसे क्यों दिये.
हालांकि पीयूष की प्रकृति में क्रोध करना नही था पर उसने थोड़ा तुनक कर अमृता को कहा..
” देखिए मैडम मैं आपको नही जानता, आपने मेरी चाय के पैसे क्यूँ दिये. ये ग़लत बात है.”
कहते हुए पीयूष की भौंहे थोड़ी तन गई और उसका सुंदर चौड़ा माथा और भी साफ और चमकता हुआ दिख रहा था जो ये भी सुनिश्चित कर रहा था कि वह बहुत तेजस्वी व बुद्धिजीवी भी है.
अमृता शांत रही फिर मुस्कुराने लगी.
“अरे मैंने कोई जोक नही मारा जो आप मुस्कुरा रही हैं मैडम समझी आप?”
हा हा हा हा… अमृता ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगी
“अरे बड़ी ढीट हैं आप तो,, हंस रही हैं.”
हंसते हुए अमृता ने कहा… “जी हाँ हंसने की तो बात है कि जिसने आपकी चाय के पैसे दिये वो आपकी मित्र है और आपने उसे पहचाना ही नही.”
“जी आप मेरी मित्र हैं”.?
“हाँ.. “
“वो कैसे?”
“बताती हूँ,पहले आप चाय पी लें ठंडी हो जायेगी”
पीयूष अमृता को घूरता रहा पर न जाने क्यूँ उसकी बात मानकर चाय पीने बैठ गया.
इधर वो मनचला भी ये सब देखकर उठकर चला आया और कहने लगा.. “हाय हमें भी तो चाय पिला दो जानेमन”
अमृता ने उसकी तरफ नफरत भरी निगाह से देखा और फिर अपनी नजरें झुका ली. उसके मौन को देख वह अमृता पर हावी होने लगा.
पीयूष यह सब देख रहा था, उसने उठकर उस आवारा लड़के का कॉलर पकड़ लिया कहा…….
“आ चल मैं तुझे चाय पिलाता हूँ,चल अभी पुलिस के हवाले करता हूँ तुझे. फिर वो करेगी तुम्हारी खातिरदारी,आवभगत डंडों से ,,चल”
यह कह कर पीयूष उसे पकड़ कर ट्रेन में तैनात पुलिसकर्मी को सौंप देता है.
अमृता… “थैंक्स… पीयूष जी! “
“अरे आपको मेरा नाम भी पता है? मगर कैसे? ”
“हाँ पता है”.
“वो कैसे”
“वो ऐसे कि मैं आपके लेखन की मुरीद हूँ”.
आपके कॉलम, आलेख, कविताएँ और विशेषकर आपके राष्ट्रवादी आलेख तथा ग़ज़लें तो बहुत ही लाजवाब होते हैं पढ़कर ही जोश आ जाता है”.
पीयूष थोड़ा मुस्कुराया
“धन्यवाद आपका”
“यो’र वे़लकम”…अमृता मुस्कुराने लगी. उसके दोनों गालों पर गड्ढे पड़ गए.
“आप दिल्ली से हैं”…. पीयूष ने पूछा.
“हाँ मैं दिल वालों की दिल्ली से हूँ पीयूष जी.”
पीयूष उसके इस मासूम उत्तर पर मुस्कुराने लगा.
“जी मैं भी दिल्ली से ही हूँ”.
“हाँ मैं जानती हूँ सब कुछ आपके बारे में.”
पीयूष एक क्षण सोच में पड़ गया कि अमृता सब कुछ कैसे जानती है उसके बारे में.
अपने कौतूहल को छिपाते हुए उसने अगला प्रश्न किया.
“अच्छा आप भी पढ़ती हैं शिवानी को. मुझे भी. “
“आपको भी शिवानी का लेखन बेहद पसंद है जानती हूँ. ” अमृता ने पीयूष की बात को बीच में काटते हुए चहकते हुए कहा.
अब पीयूष हैरान था.
अपने इन भावों को सहज होने का ढोंग करके छिपाते हुए पीयूष ने आगे कहा कि
“आप क्या करती हैं”?
“मैं एक राईटर हूँ. ”
“अरे वाह”
“तब तो आपकी मेरी खूब जमेगी अमृता जी. “
“हैं गो शक्ति (सच में)….. हमारी पहले भी जमती थी और अब भी जमेगी. गीतों और कविताओं की जुगलबंदी. है ना शो….. ” अमृता वो अंतिम शब्द कहते-कहते रूक गई.
अब पीयूष भी थोड़ा गंभीर हो गया. उसका हृदय ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा. अमृता की बातों ने उसे किसी की याद जो दिला दी थी. पर वो,….वो तो…. नही. नही….ये वो कैसे हो सकती है……. कैसे हो सकता है ये? पीयूष अपनी सोच में सवालों की उधेड़-बुन में था कि अमृता ने एक बॉक्स पीयूष की ओर ऑफर किया.
“ये क्या है. “
“देखिए तो खोलकर.”
“अरे वाह…असॉर्टेड डार्क चॉकलेट्स. “
“मुझे बहुत,,, आपको बहुत पसंद है. “
दोनों एक साथ बोल पड़े.
दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा और फिर ठहाका लगा कर हँस पड़े दोनों.
पीयूष अमृता के गालों पर पड़े गड्ढों को निहार रहा था. “बिल्कुल शर्मीला टैगोर की तरह. “पीयूष के मुँह से निकला.
“हाँ बिल्कुल शर्मीला टैगोर की तरह और बातें मीना कुमारी की तरह.. है ना पीयूष. “
अब पीयूष को पसीने आ गए. वो हैरान सा अमृता की ओर देखने लगा. उसे समझ नही आ रहा था कि अमृता इतना कुछ कैसे जानती है उसके बारे में परन्तु वो हिम्मत नही जुटा पा रहा था उससे पूछने की.
अमृता उसके उठते-गिरते भावों को भाँप गई थी पर उसने कुछ कहा नही.
इधर पीयूष की उत्सुकता भी बढ़ती जा रही थी. वह अमृता के कॉन्फिडेंस को देखकर हैरान था. अमृता का व्यवहार ऐसा था कि जैसे वह वर्षों से पीयूष के साथ रही हो. पीयूष ने सिग़रेट सुलगा ली.
तभी अमृता ने चुप्पी तोड़ी.
“आपने तो सिग़रेट छोड़ दी थी ना. “
पीयूष कश लेत-लेते अमृता की ओर भौंचक्का हो कर देखने लगा.
“हाँ पर फिर से शुरू कर दी, किसी के कहने पर छोड़ी थी. उसने साथ छोड़ा तो फिर से आदत पड़ गई.”
इस बार अमृता पीयूष को घूर रही थी.
“पर क्यूँ छोड़ा आपने जानने का प्रयास नही किया. “
“मेंने नही छोड़ा वो खुद ही मुझे छोड़कर चली गई. ”
पीयूष ने आगे कहा……
” बहुत ही मसृण प्रेम था उसका. “
“तब तो ऐसे प्रेम को तो संजोकर रखना चाहिए, आपने जाने क्यूँ दिया. “
कहा ना वो “मैडम” स्वयं ही छोड़ गई मुझे.”
“अच्छा…. परन्तु आपने कोशिश नही की ये जानने की कि क्यूँ किया उसने ऐसा.?
“ना… नही किया… उसने छोड़ा तो उसे ही बताना था ना. ”
अब अमृता भी गंभीर हो गई. पीयूष ने अपनी सिगरेट बुझा दी थी तब तक.
“परन्तु प्रेम में ऐसा कहा होता है पीयूष जी. “
“प्रेम में परवाह का भाव होना अति आवश्यक है, सिर्फ प्रेम ही काफी नही होता ना. “
“मैं उससे बहुत प्रेम करता था… स्वच्छंद प्रेम. ”
” स्वच्छंद प्रेम…? “
“ये किस प्रकार का प्रेम है पीयूष जी. प्रेम प्रेम होता है, बंधन और स्वच्छंदता से परे. मेरे हिसाब से कुछ पल साथ बिता लेना प्रेम नही. प्रेम में सब कुछ मीठा-मीठा नही होता खट्टा भी होता है, तीखा भी और चटपटा भी….. है ना. “
“ये सब कुछ भी मायने नही रखता जब दो लोग प्रेम में होते हैं अम्मो.. .. ” पीयूष के मुँह से निकला ये संबोधन जिसे कहकर वह स्वंय ही चौंक पड़ा और अमृता भी.
“हाँ… प्रेम में एक-दूसरे को सुख देने और समझने के इतर एक-दूसरे की परिस्थिति को समझते हुए उसे अकेले नही छोड़ देना होता पीयूष, साथ देना ही प्रेम की सार्थकता है. “
“लेकिन मेंने तुम्हारे प्रेम की समग्रता को समझा था अम्मो… फिर तुम क्यूँ चली गई थी मेरे जीवन से. “
अब दोनों के बीच कोई औपचारिकता नही बची थी, सीधे-सीधे ही संवाद हो रहा था.
“तुमने क्यूँ नही रोका मुझे पीयूष.”
” मैं रोकता तो क्या तुम रूक जाती?”
“हाँ पर तुमने कुछ कहा ही नही. “
“मैं भी ये पूछना चाहता हूँ कि आखिर तुम मेरी ज़िन्दगी से गए क्यूँ. “
“हाँ तुमको अधिकार है पूछने का तो उस वक्त क्यूँ नही उपयोग किया इसका पीयूष?”
तुम सदैव ओशो धारा पर चलते रहे हो जबकि प्रेम स्वच्छंद होने के साथ-साथ हृदय का ऐसा बंधन है जिसमें एक-दूसरे पर अधिकार दिया नही जाता स्वत: ही हो जाता है पीयूष. ”
अमृता कहते हुए भावुक हो गई.
“एक-दूसरे के प्रति चिंता, परवाह जताना प्रेम के ही विभिन्न पहलू हैं ना, तुमने ऐसा कभी नहीं किया. ”
“जब तक मैं उस स्तर तक नही पहुँची कि मेरे आंसू निकले तुम पलटकर देखते भी नहीं थे पीयूष.”
“सबको अपनी समस्याओं का निदान स्वयं ही करना पड़ता है अमृता. ”
“हाँ करना पड़ता है परन्तु वो साथ तो महसूस होना चाहिए ना पीयूष कि मेरे हर सुख-दुख में तुम मेरे साथ हो. सिर्फ सुख बाँटना प्रेम नही होता पीयूष.”
अब अमृता की आँखों में सचमुच आँसू आ गए.
“हाँ जानती हूँ तुम एक साहित्यकार हो ,ज्ञान के मामलों में तुम्हारी पीएचडी है. परन्तु तुम दिल की बातों में हर वक्त दिल कम दिमाग़ अधिक इस्तेमाल करते हो पीयूष. “
“अच्छा… ”
“हाँ पीयूष… “
“ठीक है तो बताओ क्यूँ चली गई थी मुझे छोड़कर तुम”
“अब जाने दो वो पुरानी बातें. ” कहकर अमृता उठने को हुई. तभी पीयूष ने उसका हाथ थाम लिया.
पीयूष के स्पर्श से अमृता सिहर उठी.

“छोड़िए हमारा हाथ पीयूष. ”

“ना ना ना”…बिल्कुल नही पहले मेरे पास बैठो और मुझे बताओ कि क्या हुआ था. तुम्हें सिर्फ तस्वीरों में देखा, दो-चार बार बस तुम्हारी ऑडियो वॉयस में आवाज़ सुनी थी. कभी मिला नही था तुमसे… फिर भी बस तुम्हारी बातों से मुझे तुमसे प्यार हो गया अमृता. हाँ याद आया एक बार तुमने अपनी आँखों की और होंठों की तस्वीर भेजी थी, तभी तो कहा था तुम जब हंसती हो तो शर्मिला टैगोर की तरह तुम्हारे गालों में गड्ढे पड़ते हैं. सही कहा था मैंने. आज मिले हो तो ही पहली बार देखा है और मैने ग़लत नही कहा था तुम्हारे लिये अमृता.”
अब अमृता के गाल गुलाबी हो गये थे पीयूष की बात सुनकर. पीयूष ने खींचकर उसे बिल्कुल पास बैठा लिया और अपलक निहारता रहा.
“उफ्फ… “
“क्या हुआ पीयूष. “
” कितनी प्यारी हो तुम अमृता और तुम्हारी बातें भी.”
“अच्छा?”
“हाँ,,, “
“क्यूँ चली गई थी मुझे छोड़कर. “
“पीयूष जब तुमसे बाते होती थी संदेशों में तुमने कभी ये बताया नही कि तुम्हारी सगाई बचपन में ही हो चुकी है.”.
“ओ… हाँ, पर,, तुमको कैसे पता लगा ये. “
“तुम्हारी मंगेतर ने मुझे फोन किया था, पता नही उनको मेरा नम्बर कहाँ से मिला. ”
पीयूष हैरान था ये सब सुनकर.
“क्या कहा उसने तुमको अमृता. “
“उसने कहा कि तुम्हारी और उसकी शादी अगले महीने होने वाली है जो बचपन में ही फ़िक्स हो चुकी है. “
” और तुमने सच मान लिया. “
“हाँ… पीयूष. “
” बुद्धीजीवी हो तो दिमाग़ भी इस्तेमाल कर लेती. एक दफा मुझे तो पूछ लेती.तुम नही सुधरोगी, रहोगी वही…”
“क्या कान की कच्ची?” दोनों एक साथ बोल पड़े और दोनों ही एक-दूसरे को देखकर हँस पड़े.
” हाँ उससे बचपन में शादी फिक्स हुई थी पर बड़े होने पर उसके और मेरे बीच स्वभाव और पसंद का उतना ही अंतर था जैसे “उत्तर-दक्षिण. “
“मेंने माँ से कहकर इन्कार कर दिया था क्यूँकि मुझे तुम अच्छे लगे थे अमृता. प्रेम करने लगा था तुमसे. ”
” तो कहा क्यू नही पीयूष. “
“हम दोनों ने जो पल साथ बिताए, इतनी बातें की, एक-दूसरे को जाना. क्या फिर ये कहना आवश्यक था कि आई लव यू अमृता”
“ओह पीयूष, मैं,, मैं नही समझ पाई थी. आई एम सॉरी पीयूष. “
“पर अब क्या हो सकता है. “
पीयूष ने अमृता का हाथ अपने हाथों में लिया और उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में झाँक कर कहा… “कहूँ वो तीन शब्द,, क्या तुम फिर मेरे जीवन में वापस लौट आओगेे अमृता. “
अमृता की आँखों में आँसू आ गए.
” हाँ कहो ना,,,, “
” आई लव यू अमृता, तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ. “
“ओह पीयूष,, पहले कह देते तो कभी नही जाती तुम्हारे जीवन से. “
“मैं भी तुमसे प्रेम करती हूँ. “
पीयूष ने अपनी अमृता को सीने से लगा लिया. ट्रेन पटरी पर दौड़ती रही. कब स्टेशन आ गया पता ही नही चला. चाय वाले ने आ कर कहा…. “बाबूजी स्टेशन आ गया है. “
“ओह… धन्यवाद मित्र”
“बारूदी धन्यवाद उस कान्हा जी का कीजिये जिसने आप दोनों को फिर से मिला दिया. “
सुबह चार बजे का अलार्म बज उठा और अमृता भी चौंक कर लौट आई उन यादों से. पीयूष की तस्वीर देख कर मुस्कुरा उठी अमृता.

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