हाँ, तुमने किये हैं अनगिनत प्रेम

हृदय के मचलते भाव प्रस्तुत कर देने का अधिकार भी तो प्रेम ही देता है..ये भाव जब संप्रेषित नहीं होते तो उदासी के मौसम में बदल जाते हैंं अक्सर

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जब हैंग अप करते हो फोन 
लगता है कही दूर जा रहे हो
मुझे छोड़कर 
हैंग अप, ब्रेक अप 
कितना मिलता-जुलता है
ऐसी अंग्रेज़ी पर तो
लानत भेजने का मन करता है मेरा
तुम्हारा बाय कहना
लगता है जैसे
फिर कभी नही मिलेगें 
काश! तुम कहते 
फिर बात करता हूँ 
या मिलते हैं कुछ देर में
पर तुमने ऐसा कभी
कुछ भी नही कहा 
तुम्हारा प्रेम लहरों की भाँति
स्पर्श करता है मुझे
और उतना ही शीघ्र 
लौट जाता है
वापस जाती तरंगों की तरह
अपेक्षाएँ जन्म तो लेती हैं
साकार नही होती
तुम सागर हो 
प्रेम का
गहन गंभीर 
पर तुम्हारे निकट
 न आऊँ तो
 पास तुम भी नहीं आते
मर्यादा सिर्फ 
तुम्हारी नहीं
मेरी भी है
प्रेम का झरना
सदैव झुकता है
समर्पण है ये
अहंकार नहीं
हाँ तुमने किये हैं
अनगिनत प्रेम
इस अभिव्यक्ति 
से परिचित हो
शायद तभी मैं
छू नही पाई 
अब भी
तुम्हारे हृदय का वो कोना
जिस पर तुमने
 बाड़ लगा रखी है
चाहती हूँ 
खोल दो, बहा दो
वो ज़िद
जो स्वयं से कर बैठे हो
दुखित नहीं होगा मन तुम्हारा
बस इतना कह सकती हूँ !

काश, तुम पहले मिल जाते !

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