मैं, अहिल्या

उत्तरदायित्व के साथ आत्मविश्वास का एक नाम स्त्री भी है और अहिल्या अमर है. वह आज भी है हमारे आसपास जीवन संग्राम में अनजानी विजय गाथाओं की नायिका बन कर..पढ़िये इस कहानी में..

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कभी देखा है काले बादलों का झुंड सूरज की रोशनी को कैसे ढँक लेता है?परन्तु अधिक देर तक ऐसा नहीं हो पाता|ध्यान बिना हटाये एकटक निहारती रहती थी उस दृश्य को…धीरे-धीरे कुछ बादल फटने लगते थे जिनमें से किरणों का प्रकाश दृष्टिगोचर होने लगता था और कुछ क्षणों में ही वह प्रकाश समूचे नभमंंडल में फैल जाता था|मेरे होंठों पर मुस्कान फैल जाती थी ये दृश्य देखकर|
पर इस प्रयास में मेरी आँखों में आँसू भर जाते थे.. और मेरी पनीली आंखों में आसमान समा सा जाता था| फिर भी ये तो कहूंगी कि एकटक बिना पलक झपकाये आँखें मिलाना आसान तो नहीं है, है ना !!
मैं ठहरी अहिल्या, एक प्रकृति-प्रेमी…बाल्यावस्था से ही बहुत पसंद था मुझे प्रकृति के साथ एकान्त में समय बिताना|फागुनी मौसम में सरसों के वृक्ष को निहारते रहना वही बरामदे में रखी सिंगल सीटर सोफे पर बैठकर|वो स्थान मेरे पढ़ने का हुआ करता था|परिक्षाओं से पूर्व ही तैयारी करने के लिये मैं सुबह जल्दी उठकर पढ़ा करती थी|वहीं उस सोफे पर बैठकर|बार-बार आँखें उसी सरसों के पेड़ पर टिक जाती थीं|जिन पर पीले-पीले सुन्दर सरसों के पुष्प खिले होते थे|पूरी सड़क उन छोटे-छोटे फूलों से भर जाती थी जैसे कोई पीला कालीन बिछाया हो वसंत के आगमन में प्रकृति ने धरती पर|
मुझे ये सब देखना बहुत भाता था| पढ़ते-पढ़ते जब थकान का अनुभव होता था तो उसे निहारना नैनों को चैन और आनन्द की अनुभूति देता था मुझे|जो मुझमें नई उर्जा का संचार कर देता था|फिर मैं पढ़ने में जुट जाती थी|
संयुक्त परिवार में पली-बढ़ी मैं …..जानती थी कि एक-दूसरे की कमियों को नज़रअंदाज कर रिश्तों की सुंदर माला को कैसे तरोताज़ा .महकती हुई और सुरक्षित रखा जा सकता है|करीबन-करीबन सभी का प्यार-दुलार पाया मैंने|दादी की गोद में बैठकर उनकी चुटिया से खेलना मुझे बहुत भाता था|कभी उनके सर से पल्लू खींच लेती तो कभी उनकी चुटिया का रबर बैंड खोल देती थी|कितना तंग करती थी उनको मगर वो हमेशा मुस्कुराती रहती थी|उनकी मुस्कान बहुत ही स्पेशल थी.. ..हाँ सचमुच…..दो गुलाबी पँखुड़ियों  के बीच उनके चार लम्बे दाँत …. जब वो मुस्कुराती तो बाहर निकल आते अपनी खुशी का सर्टिफिकेट देने……हा हा हा…   कितनी मासूम मुस्कान होती थी उनके होंठों पर|
मेरे दादाजी जो मुझे प्यार से “सुरग्यानी” पोती कह कर बुलाते थे|उनकी एक छोटी-सी अलमारी हुआ करती थी जिसमें मीठे सौंफ का डब्बा रखते थे|वे मुझे प्यार से बुलाते “आ ऐ ! मेरी सुरग्यानी पोती”| मैं झट से उचक कर दादाजी की गोद में बैठ जाती थी |फिर वो मुझे अलमारी से सौंफ निकाल कर मेरी नन्ही मुट्ठी में भर देते तो मैं दूसरा हाथ भी बड़ी मासूमियत से आगे बढ़ा देती थी|ये देखकर वे ठहाका लगा कर हँस पड़ते थे और मेरी दूसरी मुट्ठी भी सौंफ से लबालब भर देते थे|मैं बहुत खुश हो जाती थी जैसे मुझे कोई खज़ाना मिल गया हो|
दादाजी का एक पैर किसी दुर्घटना में क्षत-विक्षत हो गया था| वे बैसाखियों के सहारे चलते थे|उस वक्त “जयपुर फुट” का आविष्कार नही हुआ था| परन्तु अपना सारा कार्य स्वयं ही करते थे| सुबह पाँच बजे कबूतरों को दाना डालने जब छत पर जाते थे तो मैं उनके साथ जाती थी कबूतरों को दाना खिलाने और ये क्रम उनके जाने के बाद भी जारी रहा|इसलिये मुझे भी वही आदत है पक्षियों को दाना खिलाने की….ये सब कुछ आप एक संयुक्त परिवार में रह कर अपने आप सीख जाते हैं चाहे इसके पीछे का लॉजिक आपको  बाद में पता लगे कि इस प्रकार दाना खिलाकर या मौन-मूक पशुओं के दाना -पानी की व्यवस्था करके आप उन्हें संरक्षण देते हैं ताकि उनका जीवन-यापन भली-भाँति हो सके और वे आपको या आपकी किसी वस्तु का नुकसान न करें|इससे तो बस प्रेम फैलता है..है ना!!!!!!
हाँ, ये और बात है कि हाल ही के रिसर्च ये यह ज्ञात हुआ है कि कबूतरों से फैलने वाले कीटाणुओं से फेफड़ो का गम्भीर इन्फेक्शन दिनोंदिन बढ़ रहा है.. क्यूँकि इन्हें खिलाते-पिलाते रहने से इनकी संख्या बढ़ती जा रही है और लोग ज़्यादा इस संक्रमण का शिकार हो रहे हैं और जान का खतरा बढ़ रहा है| पर सोचती हूँ कि इनकी फीडिंग बंद करने से ये एक प्रकार की जीव हत्या करना ही होगा जो हमारे हिंदू धर्म और  मानवता के विरूद्ध है| यह कार्य प्रकृति पर ही छोड़ देना बेहतर है जो समय-यमय पर प्राकृतिक आपदाओं  के रूप में जीवन और मृत्यु के बीच सामंजस्य स्थापित करती रहती है | हमें बस मानव होने का कर्तव्य-पालन करना चाहिये|
मुझे लगता था कि बड़े उम्र के लोगों को कोई  दुख, मुश्किल या परेशानी नहीं होती| सारे झंंझट हम बच्चों के जीवन में ही है.सुबह जल्दी उठो…पढ़ाई करो..स्कूल जाओ…अध्यापिका की डाँट भी खाओ और होमवर्क भी करो| चुपचाप कक्षा में मौन धारण करके बैठ जाओ|जैसे कोई सज़ा मिली हो..उफ्फ.. बहुत बुरा लगता था मुझे|उस वक्त मुझे माँ और दादी का जीवन बहुत सहज और सरल लगता था| मुझे लगता था कि बड़े हो जाने के कितने फायदे हैं…न पढ़ना पड़ता है…न जल्दी उठना .न स्कूल जाना.न वो भारी-भरकम स्कूल का बस्ता ढोना|उस वक्त अल्मूनियम के बस्ते चलते थे स्कूल कॉपी-किताब ले जाने के लिये जो पकड़ कर चलना बहुत भारी लगता था मुझे|बाद में स्कूल बैग आया तो ये बोझ कंधों पर आ गया|मैं बचपन से ही थोड़ी नाज़ुक थी और नाजों पली थी| पर जिस कार्य को करने की ठान लेती थी उसे पूरा करके ही दम लेती थी|जो मेरी दृढ़-संकल्प-इच्छा  शक्ति को दर्शाता है।
हाँ, तो मैं कह रही थी कि बड़ों का जीवन कितना आनन्ददायक होता है…जब चाहे तब दिल जो चाहे वो कर सकते हैं…..कहीं भी आ-जा सकते हैं|तब नहीं जानती थी कि औरतों का जीवन कितना बंधनों और ज़िम्मेदारियों से भरा होता है|.
एक भारतीय समाज के हिंदू परिवार में उनके अनगिनत कर्तव्य होते हैं हर रिश्ते के प्रति जो उन्हें मुस्कुरा कर निभाने होते हैं |क्यूँकि समाज तब भी पुरूष-प्रधान था और आज भी है| हाँ, समय के साथ कुछ परिवर्तन..बदलाव अवश्य आते रहे हैं परन्तु अब भी महिलाएँ समाज के रूढ़िवादि बंघनों और कुरितियों से पूर्णत: स्वतंत्र नहीं हो पाई हैं|
सबसे बड़ा बदलाव परिधानों में देखने को मिलता है| एक राजस्थानी लड़की ..लहंगा-चोली से जींस पेंट-टॉप तक का सफर..पर बात सोच में बदलाव लाने की है| परिधान कोई भी हो फर्क नहीं पड़ता..हाँ, बस वो पहनने में आरामदायक  हो..ये मेरी सोच रही बचपन से ही|वैसे मेरी माँ ने हम बहनों को ये स्वतंत्रता हमेशा दी| मुझे याद है कि मैंने विवाह से पूर्व बस एक या दो बार सलवार-कुर्ता पहना है|वह भी इसलिये कि कभी नहीं पहना था तो मुझे शौक  था कि पहनूँ| हमेशा से मिनी फ्रॉक.मिनी स्कर्ट.जींस.लेगिंग.बलून स्कर्ट.ससपेंडर..उस ज़माने में पहने हैं मैंने और बॉय स्टेप कट बाल…उस ज़माने में ये सब मॉडर्न होना माना जाता था जो मेरी माता जी की स्वतंत्र और आधुनिक सोच का परिचायक है|घर वाले यानि मेरे चचेरे भाई इन सबका विरोध करते और बातें बनाते थे| परन्तु मेरी माँ ने कभी इन सब उलाहनों पर ध्यान नहीं दिया| मेरी माताजी उस ज़माने के हिसाब से विचारों और व्यवहार से बहुत आधुनिक मगर अपने रीति-रिवाज़ और संस्कारों को साथ रख कर चलने वाली महिला रही हैं|
वे हमें विद्यालय में होने वाली प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिये प्रोत्साहित करती थीं| मैं हमेशा अपने अंदाज़ में ही बोलती थी..    “हम जायेगा….हम उससे बात नही करेगा”..लड़कों की तरह..हिंदी में ही बात करती थी….चूँकि हमारे घर में ज़्यादातर सब मारवाड़ी भाषा का ही प्रयोग करते थे वार्तालाप के लिये| खैर,..हमेशा प्रेरित किया हमें हमारी माँ ने||पर कुछ बातों में वो स्वयं सहते-सहते रिजीड हो गई थी| बेटी की माँ जो थी| वो भी तीन-तीन बेटियाँ..मेरे चचेरे भाई लोग मेरी माँ से ..पिताजी से कहते थे कि चाचा आपने इस “छोटी” को हिंदी में बात करने की स्वतंत्रता देकर बिगाड़ दिया है|
हम तीनों ही बहनों का रंग गेहुआँ है..पर नैन-नक्श बिल्कुल अपनी माँ की तरह  तीखे|पर वो लोग कहते थे मेरे पिताजी को कि “आपको तो चप्पल घिसनी होगी ..चाचा.. बेटियों के ब्याह के लिये|”
मुझे उनकी ऐसी दकयानूसी सोच पर बहुत क्रोध आता था|पिताजी कुछ कहते नहीं थे जैसे ध्यान ही न दिया हो और माँ भी चुपचाप रहती थी| तो मैं कहती थी उनसे कि “आप जवाब क्यूँ नहीं देती?” उत्तर में वे हँसकर कहती कि “उन्हें समय जवाब देगा|”
मैं बहुत छोटी थी, उनकी इस बात का अर्थ तब नहीं समझ पाई थी|परन्तु जब मेरे विवाह में मेरे चचेरे भाई आये थे तो पिताजी से कह रहे थे कि “आप तो बहुत भाग्यशाली हो चाचा….पिछले जन्म में कोई मोती दान किये होंगें आपने जो  तीनों जँवाई एक से बढ़कर एक मिले हैं आपको..धनवान.गुणवान और सुंदर भी|वैसे हमारी बहनें भी कुछ कम नहीं जँवाईयों से…अब छोटी के धणी को ही देख लो..आपके तीनों जँवाईयों में सबसे सुंदर है चाचा.. ऊपर से इतना ऊँचा घराना…बिहार में फर्टिलीईज़र के किंग…नाम.रूतबा.अपना मकान..छोटी के तो भाग्य ही खुल गये|” मैं ये सब कुछ दुल्हन बनी बैठी सुन रही थी और सोच रही थी कि माँ ठीक ही कहती हैं कि वक्त जवाब देता है|
खैर, रोते-रूलाते मेरी विदाई हो गई|पतिदेव ने रास्ते में बहुत चुप कराया..रो-रोकर पूरा मेकअप बह गया था मेरा….काजल फैल गया था गालों पर जो उन्होंने साफ करने में मेरी मदद की और मेरे कंधों पर अपने हाथ का विश्वास रख ये आश्वासन दिया कि “डरो नहीं मैं हूँ तुम्हारे साथ|” मेरा दिल उनके इस इशारे को शायद समझ गया था तभी फिर मैं थोड़ी सहज हो चली थी|ससुराल पहुँची..वहाँ द्वार पर सासु बाई ने हमदोनों का स्वागत किया|ननद रानी जो उम्र में मेरी माँ समान ही थीं|बाढ़ ढुकाई का नेग लिया इनसे जो हर बहन का हक भी होता है| मैं घर के अंदर आँगन में आई|रात के फेरे थे तो सब थके थे|मुझे आँगन में एक चौकी पर बिठा दिया गया| समीर मेरे पति भी न जाने कहाँ चले गये थे|में मौन-मूक सी मूर्ति बनी बैठी आते-जाते लोगों को देख रही थी|समझ नहीं पा रही थी कि अब क्या होगा|
मैं भी बहुत थकी हुई थी ऊपर से ये भारी-भरकम लहंगा…उफ्फ..इसे उतार कर हल्के कपड़े पहनना चाहती थी पर याद आया कि मैं मायके में नहीं ससुराल में हूँ….चुपचाप बैठी रही|तभी हमारे रिश्तेदार की किसी उम्रदराज़ महिला ने कहा कि” बहू भी बहुत थक गई होगी इसे कमरे में ले जा किरण..सो लेगी कुछ देर तो थकान उतर जायेगी|” सुबह के चार बज रहे थे.
उन्होंने जैसे मेरे मन की बात कह दी थी|तभी नणद बाई ने कहा कि “हाँ हाँ..ठीक है ले जायेगें..वैसे भी इतने वर्षों अपनी माँ के घर में आराम ही तो किया होगा इसने.. कुछ दे और जग लेगी तो कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा|”
नणद बाई के शब्दों ने जैसे मेरा हृदय छलनी कर दिया..मन काँपने लगा इस विचार से कि “बाप रे! ये कहाँ आ गये हम..लग रहा था कि ये प्रारम्भ है तो आगे क्या-क्या होगा हमारे साथ|” आँखें भर आई और माँ का चेहरा आँखों के आगे घूमने लगा| तभी मेरी बड़ी जेठानी जी आई और प्यार से मेरी पीठ पर हाथ रख कर मुझे उठा कर अपने साथ एक कमरे में  ले गई| कमरे में अंधकार था बस हल्की सी रोशनी थी| वो कमरा जैसे किसी भूत की कोठरी सा लग रहा था मुझे|मुझे अँधेरे से वैसे भी बहुत डर लगता है पर संकोचवश कुछ कह न पाई मैं| उन्होंने मुझे वहाँ रखे एक छोटे से पुराने पलंग पर सो जाने के लिये कहा और चली गई|मैं फिर बिल्कुल अकेली थी| ये कमरा मुझे बहुत डरा रहा था|
मैं धीरे से पलंग पर जा कर बैठ गई दोनों घुटनों पर कोहनी टिकाकर अपनी ही हथेलियों में अपना चेहरा सँभाले मैं आँखें फाड़-फाड़कर देख रही थी पर अँधेरा इतना था कि कुछ नहीं दिख रहा था| बगल के कमरे से ननद और ननदोई की धीमी आवाज़ सुनाई पड़ रही थी| सोचा दीदी से कहूँ कि मुझे अकेले यहाँ डर लग रहा है परन्तु तभी उनके बोले हुए शब्द मुझे याद आ गये और मैं रूक गई| माँ की याद सता रही थी| रोते-रोते कब आँख लग गई पता ही नहीं चला|
परन्तु हृदय के भीतर एक अनजाने भय ने जन्म ले लिया था तो ठीक से सो भी नहीं पाई| कुछ ही देर में जाग गई| सुबह सासु बाई आई और कहा कि “नहा लो मंदिर जाना है पूजा के लिये गठजोड़े से|” फिर दिन भर नेग-चार का कार्यक्रम चलता रहा| ये सब आपको इसलिये बताया कि मैं शहर से बिहार के एक छोटे से टाऊन.. टाऊन भी नही कहेगें..कस्बा…जगतपुर आ गई थी मेरी ससुराल| जहाँ सब कुछ जिस वातावरण में मैं पली-बढ़ी थी उससे बिल्कुल अलग और कुछ-कुछ अजीब भी था|मैं बहुत सहमी-सहमी सी थी|
अक्सर बिजली चली जाती थी|लालटेन जलाकर काम किया जाता था घर में| मेरे लिये बहुत मुश्किल  था| एक तो शहरों में लोडशेडिंग जल्दी नहीं होती थी और यदि हो भी जाये तो इन्वरटर या जेनरेटर होते थे तो लोडशेडिंग का एहसास दूर-दूर तक नहीं था|पर यहाँ एक तो मैं नई बहू..छोटी जगह..जहाँ लोग परदा  प्रथा को बहुत बढ़ावा देते थे..उस पर लम्बा घूँघट और लालटेन में काम करना मेरे लिये सज़ा से कम न था|
छोटी-छोटी बातों में मेरी गलती निकाली जाती थी..शहर और गाँव का फर्क बताकर मुझे मूर्ख बना दिया जाता था जैसे शहर में पले-बढ़े होना पाप हो| धीरे-धीरे सख्ती बरती जाने लगी| मेरी कोमल भावनाएँ आहत होती रही| काफी संवेदनशील हूँ मैं पर अब तो आँखों में हर समय पानी भरा रहता था जैसे मूसलाधार बारिश के बाद छोटे-छोटे गड्ढों में पानी भर जाता है और जब तक वो गर्मी के ताप से सूख नहीं जाता तब तक पानी लबालब भरा रहता है|
यूँ तो मैं सत्य कहने से कभी डरी नहीं पर यहाँ आने के बाद मुझे ये समझ आया कि एक लड़की के लिये बंधन जन्म से ही लागू कर दिये जाते हैं..धीरे-धीरे वो बड़ी होती है और साथ-साथ उसके बंधन.वर्जनाओं का शिकंजा उस पर बढ़ता और कसता जाता है|
मैं अपने माँ-पिताजी.बहन-भाईयों को बहुत मिस करने लगी थी| मेरी सासू बाई मुझे हर कार्य सिखाने के लिये प्रेरित करती रहती थीं ..पर कुछ बंधन थे जिन्हें न मानने पर बहुत कुछ सुनना भी पड़ता  था|पुरूष और महिलाओं के लिये एक ही बात के लिये अलग-अलग नियम-कानून थे….ऐसा क्यूँ? मैं यही सोचती थी कि एक माँ के लिये उनके सभी बच्चे बराबर होते हैं लड़का हो या लड़की| मेरी माँ ने हमें हर प्रकार की स्वतंत्रता दी लड़की होने पर भी बस शाम या रात को घर से निकलने कम देती थी..ज़रूरी होता तो कोई घर का सदस्य साथ जाता था| वो एक माँ की चिंता थी जो मैं उस वक्त नही समझ पाई थी परन्तु एक माँ बन कर मैंने ये जाना है कि वो अपनी जगह बिल्कुल सही थी| पर सास के लिये बेटे और बहु में फर्क होता ही है चाहे रत्ती भर का ही सही मगर होता है|
यहाँ कुछ अलग ही वातावरण था| घर की औरतें देर  रात सोती और सुबह चार बजे ही जग जाती थी|सिर्फ मैं अकेली नहीं सभी को ये रूटीन फॉलो करनी होती थी|मेरी जेठानियाँ और सासु बाई इस दिनचर्या में स्वयं को ढाल चुकी थी|इसलिये उनके माथे पर कभी परेशानी की सिलवटें दृष्टिगोचर नहीं होती थी| परन्तु मेरे लिये ये उतना सहज और सरल न था| हालांकि मायके से ही मुझे भी जल्दी उठने का अभ्यास था मगर चार बजे उठकर दिन भर कार्य करना मेरे लिये आसान न था|कुँए से पानी निकालना ससुराल में सीखा| हम वह बनते हैं जो हमारे संस्कारों से हमें मिलता है|इसीलिये कहते हैं आम की गुठली रोपने पर आम ही देगी बबूल नहीं|
मैंने स्वयं को उस वातावरण के अनुसार ढालने का भरसक प्रयास किया|कुछ हद तक सफल भी रही परन्तु देहात के लोग मुझे प्रवृति से थोड़े चतुर लगे जो मैं बिल्कुल नहीं थी|जिसके कारण मैं बलि का बकरा बनती थी| गलती न होने पर भी उसका दोषारोपण मुझ पर किया जाता था| विवाहोपरांत पति का अच्छा-खासा काम बंद हो गया जिसका जिम्मेवार मुझे ही ठहराया गया और “मनहूस” की उपाधि मिल गई  मुझे| जबकि कारण कुछ और था | मेरे पति स्वयं अपने दूसरे बिजनेस को सँभाल रहे थे और नया  काम परौंद कर .पैसे इन्वेस्ट कर पार्टनरों के विश्वास पर छोड़ दिया क्यूँकि उनके पास समय़ नहीं था सँभालने का|उनलोगों ने पति के साथ विश्वासघात किया और  अच्छा-खासा बिजनेस बंद हो गया|जिसका कारण मुझे ठहराया गया कि मेरे आते ही उनके बिजनेस में तालाबंदी हो गई| ऐसी परम्पराओं और सोच के कारण तो लड़की होना भी अभिशाप माना जाने लगा था कि किसी के साथ कुछ अनहोनी होने पर उस लड़की को दोषी ठहराया जाता है|कितनी विकृत मानसिकता के लोग हैं मन ही मन सोचकर मुझे बड़ा दुख हुआ|
चलो जाने दो, धीरे-धीरे मैंने स्वयं को भाग्य के हवाले कर बहती धारा के प्रवाह के साथ बहना ही उचित समझा| समय व्यतीत होता गया|पति के नये बिजनेस में उनको नुकसान हो गया|घर में सभी उन्हें भला-बुरा कहने लगे| मुझसे ये बर्दाश्त न हुआ पति को कहा कि वे जॉब करं| पहले तो वे तैयार न हुए परन्तु बाद में उनको मेरी सलाह ठीक लगी|अच्छा जॉब मिला और दिनदुनी रात चौगुनी वे तरक्की करते गये|
पति  भी अब ज़रूरी बात पर मेरी सलाह लेने लगे|पूरे घर में एक ससुर जी ही थे जिन्होंने प्रारम्भ से ही मेरा साथ दिया था|अब सासु बाई को भी ससुर जी को जिमाने और उनके सामने बैठकर पेपर पढ़कर सुनाने पर कोई एतराज न था|
कहने का तात्पर्य ये है कि मैंने वो कार्य किये अपनी ससुराल में जो किसी बहू ने नही किये थे| पाबंदियाँ तो अब भी बहुत थी पर उनके साथ मैंने तालमेल बैठाना सीख ल़िया था|शायद मैं ये सब इसलिये कर पाई क्यूँकि मुझे अपने मायके से संस्कार की जो धरोहर मिली थी उसने मुझे प्रोत्साहित किया.समय-समय पर नई उर्जा का संचार दिया..कभी न डरने का.न किसी के दबाव में आकर कुछ गलत करने का||इस प्रकार मेरे घर में आने के पश्चात काफी चीजों में परिवर्तन भी आये जो रूढ़िवादी विचारधारा के कुछ लोगों के लिये स्वीकारना मुश्किल हो रहा था|परन्तु प्रकाश अँधेरे को चीर कर अपनी रोशनी फैला ही देता है..है ना !!
मेरा मानना ये है कि चाहे कितना भी कठिन संघर्ष  हो पर घने जंगलों से भी मेन सड़क का मार्ग निकल आता है..
घर पर सबका ख्याल रखने वाली मैं संवेदनशील लड़की ने ये सब कुछ करते हुए अपने नैतिक मूल्यों पर जीने का पूर्ण प्रयास किया|मैं  अहिल्या परिवार के संग उचित ताल-मेल बिठा कर आज जिस मकाम पर पहुँच पाई हूँ जिसमें मैंने स्वयं से आगे की पीढ़ी के लिये एक ज्वलन्त उदाहरण प्रस्तुत अवश्य किया है| लड़कियाँ आजकल हर क्षेत्र में.हर कार्य में सफल हो रही हैं|
हाँ. मैं इस कलियुग की अहिल्या हूँ जिसने होल्कर वंश की सुन बाई अहिल्या राव के पद्चिन्हों पर चलकर स्त्री-पुरूष के बीच की असमानता की खाई को भरने का स्वप्न देखा है जिसमें कुछ हद तक सफल भी रही हूँ|
नारीवाद .नारी-सशक्तिकरण  पर विश्वास करती हूँ..आजीवन करती रहूँगी..परन्तु किसी को नीचा दिखाकर नही अपितु समानता का एहसास दिलाकर..मैं अहिल्या हूँ और अहिल्या ही रहूँगी, हमेशा !
(अँजू डोकानिया)

3 COMMENTS

  1. लाजवाब कहानी बहुत ही सुन्दर लिखा है भगवान का आशीर्वाद यू ही बना रहे हमेसा।।

  2. बहुत बधाई हो अंजू , रोचकता बनाये रखने की कला में महारथ है तुमको हर बार दमदार कहानी जीवंत हो उठती है। माँ सरस्वती की अनुकंपा बानी रहे। शुभेच्छा मित्र

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