किरु, तुम्हारे लिये छोड़े जा रही हूँ अपनी विश लिस्ट!

(अमर संबवेदनाओं की एक मर्मस्पर्शी कहानी)

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देख रही हो तुम्हारे मृत शरीर पर कितना विलाप हो रहा है?…..ईश्वर ने कहा|
देख रही थी….मेरी आँखें यानि कि मेरी आत्मा सब कुछ देख रही थी|रिश्तेदार.पति.बच्चे मेरी काम वाली दीदी….मेरी परम मित्र किरू जिसे मैं प्यार से किरू कहती थी और  छोटी दी मंजरी…….वो भी बहुत रो रही थी|मुझे बुरा लग रहा था कि सब रो क्यूँ रहे हैं|मैं उन सबके आँसू पोंछना चाहती थी|उन्हें यूँ दुखी देखकर मुझसे सहन नहीं हो रहा था|मेरी छोटी दी बिल्कुल माँ जैसी…..हाँ माँ ही तो थी मेरी….मेरी सबसे क़रीबी मित्र भी|
दो लोग ही थे मेरे जीवन में जिनसे अपने हृदय की हर बात कहती थी किरू और छोटी दी, क्यूँकि परिवार में रह कर अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक भारतीय नारी के लिये तो कम ही सम्भव है| एक संतुलित.शालीन.मर्यादित और कर्तव्य-परायण स्त्री स्वयं से पहले अपने परिवार का भला सोचती है, जिसके लिये बहुत सारी इच्छाओं.उम्मीदों को सहजता और संयम के साथ दरकिनार कर परिवार के हर एक सदस्य के चेहरे पर मुस्कान बनाये रखना उसकी गृहस्थी की सफलता का चिन्ह है|
एक पत्नी.एक माँ और एक बहू होने के सभी प्रयासों को सफल बनाने की पूरी कोशिश की है मैंने|
पर जीवन है लोग मिलते हैं.बिछड़ते हैं.साथ भी होते हैं……रूठते भी हैं| मैंने उन रूठे लोगों को मनाने और उनके साथ सामंजस्य बिठाने की भी भरपूर कोशिश की है, क्यूँकि मेरा ये मानना है कि रूठता वही है जो आपसे सही मायनों में प्रेम करता है|वो सब कुछ किया जिसमें कहीं सफलता मिली तो कहीं असफल भी रही|
पति मुझसे बहुत प्रेम करते है….पर उन्हें प्रेम जताना कभी नहीं आया|ये मेरी शिकायत रही हमेशा से| देख रही हूँ आज भी वो बिल्कुल मौन हो गये हैं..बस एकटक चुपचाप कोने में बैठे मेरी मृत देह पर मेरे सुंदर चेहरे को निहार रहे हैं|उनके हृदय में उठ रहे तूफान का वेग मैं समझ पा रही हूँ…..चाहती हूँ कहूँ उनसे कि “मत रोको.. स्वयं को ….बह जाने दो इस वेदना को सारे बाँध तोड़कर आँखों से….तो चैन मिलेगा आपको”… पर वो  सुन ही नहीं रहे….हमेशा की तरह|पर जानती हूँ आप स्वयं को सँभाल लेंगें इतना विश्वास है मुझे|
बेटा जिसमें मेरी जान बसती है ….सच पूछूँ तो मेरे जीवन इन्हीं दो सहारों पर टिका रहा था हमेशा से|पति हिम्मत और विश्वास तो बेटा सदा मेरे हृदय की नाज़ुक धड़कन रहा है| इन दिनों जबसे बीमार हुई थी.. ..अचानक मेरा प्रेम सिर्फ बेटे पर केंद्रित हो कर रह गया था| जानती हूँ प्रेम के साथ-साथ ये मोह की वो डोर है…..जिसमें मेरा मन मृत्योपरांत भी उलझा हुआ है| रो-रोकर वो हलकान हुए जा रहा है| मेरी आत्मा उसे अपनी बाँहों में लेकर दुलारना चाहती है…..उसके आँसू पोंछकर.माथे को चूमकर बहुत सारे आशीर्वाद देना चाहती है|
मैं उससे कहना चाहती हूँ कि तुम्हारा परिश्रम और तन्मयता व्यर्थ नहीं जायेगें| तुम मेरे और अपने पिता के सपने पूरे ज़रूर करोगे|उन्हें बहुत आराम देना बेटा…..जीवन भर उन्होंने संघर्ष किया है| अब उनका एक ही सपना है कि तुम जीवन में सफल हो| अपने सारे सपनों क़ी सजीवता वो तुममें देखते हैं अब और प्रसन्न होते हैं कि एक दिन तुम उस मुकाम पर पहुँचोगे जहाँ वो पहुँचने के लिये अब भी प्रयासरत हैं|
खैर…अब मैं छोटी दी के पास आई जो जीजू के कंधे पर सर रख कर फूट-फूट कर रोये जा रही थी और कहे जा रही थी …”कहा था…कहा था इस लड़की को कि अपना भी ख्याल रख…पर मानेगी तब ना…..बचपन से ही ज़िद्दी रही ये छोटी”…..
हमदोनों बहनों के बीच मात्र दो वर्ष का अंतर था|मेरी एक दी और भी है .. रेशा दी…..|पर घर पर मुझे और छोटी दी को सब बड़ी .  मुझे छोटी कहकर बुलाते हैं|दी से मैं खूब लड़ती भी थी बचपन में| परन्तु इन कुछ वर्षों में वो मित्र के साथ-साथ मेरी माँ भी बन गई थी| मेरा हल्का सा दुख भी वो सहन नहीं कर पाती है| मुझसे ज़्यादा दर्द और तकलीफ उसे होती है मेरे दुख से| मेरे आँसू उसकी आँखों में होते हैं…तो हुई ना वो मेरी माँ…..हाँ मेरी माँ ही है वो|
मैं सोच रही थी किरू को कहूँ कि दी को चुप कराये| किरू जो मेरी परम मित्र और मेरे हर सुख-दुख की साक्षी और राज़दार……वो बहुत समझदार भी है और प्रैक्टिकल भी|उसे मेरे जाने का गहरा दुख है पर वो अपनी संवेदनाओं पर  नियंत्रण रखना जानती है…..इसलिये सबको वही सँभाल रही थी| मेरे आभास का एहसास शायद उसे हो चला था|
अस्पताल जब मुझसे वो रोज़ मिलने आती थी तो मैं उसे कहती थी कि…..”कुछ होना-जानी तो है नहीं…..इनसे कहकर मुझे अपने घर ले चलो ना किरू…. .अंतिम साँस अपने घर पर ही लेना चाहती हूँ…..इस…इस 2/2 के बेड पर नहीं किरू|”
किरू ये कहकर मुझे चुप करा देती कि “चुप! ऐसी भाषा नहीं निकालते मुँह से!. .हाँ ज़रूर ले चलेगें घर तुझे…..पहले तू ठीक हो जा!”
मैं उसकी बातें सुन मन ही मन मुस्कुराने लगती और सोचने लगती हूँ.. …यार ले चल मुझे.. मेरा घर है जहाँ..दो घड़ी चैन ले लूँ..अब ज़िन्दगी बची है कहाँ?
पर उससे कुछ कहती नहीं थी….सिर्फ मुस्कुरा देती थी मैं|
एक दिन बातों-बातों में उससे कहा था कि “यदि मुझे कुछ हो जाये तो मेरी आलमारी में मेरी ज्वैलरी बॉक्स में मेरी एक “विश लिस्ट होगी ….वो निकाल कर जो-जो लिखा है…पूरा कर देना यारा”……एक पल के लिये किरू और मेरे बीच निस्तब्धता छा गई…..वो मुझे घूरती रही….फिर प्यार से मुझे डाँटते हुए कहा….”चल ऐसी बातें नहीं करते…..शुभ-शुभ बोल……” मैने उसकी बातें सुनकर बस मु्स्कुरा कर बस सर हिला दिया|
खैर….किरू को मेरा आभास होते ही वो मेरी आलमारी की ओर गई….चाबी पति के पास थी..  कहकर चाबी ली और …जब आलमारी के पास पहुँची….तो देखा मैंने कि उसके हाथ काँप रहे थे….मैंने इतना असहज और भयभीत उसे पहली बार देखा था|  परन्तु उसने हिम्मत जुटा कर आलमारी खोली|  सामने हैंगर पर मेरे कपड़े झूल रहे थे|वो मेरे कपड़ों को निहारने लगी…..फिर उन्हें छुआ…..एक साड़ी थी…..सिल्क की जो मेरी फेवरेट हुआ करती थी…. पति ने जब चैन्नई गये थे तो वहाँ के सबसे महंगे शो रूम “नल्ली” से खरीद कर लाई थी| एक बार किरू ने मेरी वो साड़ी किसी फंक्शन में पहनी थी|
वो बहुत सुंदर लग रही थी उस साड़ी में|वैसे भी उसकी पर्सनैल्टी ही कुछ ऐसी है…  गोरा चटक रंग.   ….चेहरे पर हरदम मुस्कान कि सब कुछ फबता है किरू पर| उसे वो साड़ी बहुत ही पसंद है|
मैंने उससे कहा था कि “तेरी ही है पर मेरे पास रहेगी….क्यूँकि पतिदेव ने बड़े प्यार से गिफ्ट की है……तू जब भी तेरा दिल हो हक से मँगा कर पहनना|”इस बात पर वो हँसने लगी थी…   यही सच्चे मित्र की निशानी है|उसके स्थान पर कोई और होता तो शायद बुरा मान जाता| पर वो मुझे समझती थी|  अचानक ही उसे ख्याल आया कि वो यहाँ क्यूँ आई थी|  उसने अब हौले से मेरा लॉकर खोला|  सामने गहनों का डिब्बा रखा था| काँपते हाथों से उसने वो डब्बा उठाया|फिर बैड पर बैठकर उसे खोला |
मेरे गहनों के नीचे एक कागज़ रखा था|जो उसे बड़ी आसानी से मिल गया|  उसने पढ़ना शुरू किया|लिखा था…..”मेरी प्यारी किरू……जानती हूँ तू मुझसे नाराज़ है…..क्यूँकि हम दोनों ने एक-दूसरे से प्रॉमिस किया था कि जब हमारे बच्चे बड़े होकर अपनी-अपनी लाईफ में सैटल हो जायेगें| तो तू और मैं अपने बुढ़ापे को एक-साथ मिलकर खूब एन्जॉय करेगें| हम चारों बूढ़ा-बूढ़ी फिर खूब आऊटडोर जायेगें और ज़िन्दगी की वो सब ख्वाहिशें पूरी करेंगें जो हमारे कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के नीचे दबी फाईल जैसे हैं अभी| सारी चाहतें पूरी करेंगें और जो-जो विश पूरी होती जायेगी उस फाईल का वो-वो पन्ना फाड़ते जायेगें| कितना मज़ा आयेगा ना .. किरू.
पढ़ते-पढ़ते किरू की आँखें भर आई| पर उसने खुद को सँभाला और आगे पढ़ने लगी|लिखा था…. .”देख यूँ तो मेरी हज़ारों ख्वाहिशें हैं जिसे पूरा करना सम्भव न होगा..   पर मेरी कुछ अंतिम इच्छाये हैं जो चाहती हूँ तू पूरी करे, किरू|जाते-जाते तुझे ये काम सौंपे जा रही हूँ…..जिसे सिर्फ तू ही पूरा कर सकती है|  तू नीचे के बिन्दुओं में पढ़ लेना मेरी विश लिस्ट –
1) मैंने इनको इनके बर्थ डे पर एक सोने का ब्रैस्लेट गिफ्ट किया था | कहना अब उसे हमेशा पहने| ये उसे कभी-कभी किसी खास मौके पर ही पहनते हैं|इन्हें वो बहुत प्रिय है| पर मैं चाहती हूँ कि ये अब उसे हमेशा पहने ताकि मैं इनके क़रीब रह सकूँ|
2) मेरी डायरी में एक पेन है वो बेटे को दे देना और कहना जीवन में जब भी कोई महत्वपूर्ण कार्य करे .. तो इसे साथ रखे|उसे हमेशा सफलता मिलेगी| मेरा प्रेम और आशीर्वाद उसके साथ है|
3)  मेरी काम करने वाली लड़की सुभद्रा को मेरी पतली सोने की चेन दे देना| मैंने उससे वादा किया था कि बेटे की शादी पर उसे कोई निशानी दूँगी| अब बेटा उस वक्त कहाँ रहेगा.. कहाँ शादी करेगा| पता नहीं…  तो मेरे गले की चेन उसे दे देना ताकि मेरा वादा पूरा हो सके|
4) मुझे सजाते वक्त मेरी लाल साड़ी जो शायद मेरी वार्डरोब की सबसे महंगी  और खूबसूरत साड़ी है| वही पहनाना मुझे……..मुझे असली गहने मत पहनाना..  मुझे गहनों का शौक कभी नहीं रहा|वो सारे गहने बेटे की पत्नी की अमानत हैं…..जिसे खुद अपने हाथों से अपनी बहू को पहनाना चाहती थी| पर खैर..   ये सारे गहने पति से कहकर लॉकर में रखवा देना कि मेरी होने वाली बहू के लिये हैं…
5) मुझे इन गहनों में से बस एक माँग टीका है जो मैंने इनके साथ सात फेरे लेते वक्त पहना हुआ था …. वो पहना देना और ब्याहवली नथ और साधारण लाल चूड़ियाँ काँच की| मुझे हमेशा से पसंद थी| मगर जीवन भर इसलिये नहीं पहनी कि रोटी बेलते वक्त ये बहुत आवाज़ करती थी और विध्न भी उत्पन्न करती थी| पति को भी कम पसंद थी तो नहीं पहनती थी|पर अब मेरी विदाई पर मुझे मेरी पसंदीदा चटक लाल काँच की सुंदर चूड़ियाँ पहना देना|
6) सुहागन जा रही हूँ तो इनके हाथों मेरी माँग में भरपूर सिंदूर भरवा देना|
7) मेरे कबर्ड में एक पश्मिना स्टोल( छोटी शॉल) है वो मेरी प्यारी छोटी दी को दे देना| मेरी निशानी के तौर पे|
8) सोच रही होगी कि सबके लिये कुछ न कुछ छोड़ा है ..  मेरे लिये कुछ भी नहीं….. हा हा हा….  .तुझे कैसे भूल सकती हूँ… .   तेरे लिये मेरी वही फेवरेट साड़ी छोड़े जा रही हूँ जो तुझे बहुत पसंद है| वैसे भी वो तुझ पे बहुत जँचती है तो तू ही पहनना उसे| मुझे बहुत खुशी होगी|
9) तुझे पता है ना मुझे पारिजात के पुष्प बहुत पसंद हैं |मेरी अर्थी पर उन्हीं पुष्पों से सजावट करवा देना, किरू! इन पुष्पों से मेरा नाता गहरा है बचपन से ही| हमारे मायके के आँगन में एक पारिजात का वृक्ष था, जिसकी सौंधी-सौंधी खुशबू से रात्रि को पूरा घर महक जाता था|
मैं अक्सर उसे खिड़की से निहारा करती थी और उससे खूब बातें किया करती थी.जैसे वो मेरा मित्र हो| बचपन में बाल मन अबोधतावश ऐसा करता है| परन्तु वो इसी भोलेपन में मेरा प्यारा मित्र बन गया था| सुबह होते ही माँ को किरू के लिये पुष्प चाहिये होते थे| तो मैं वही पारिजात के वृक्ष से जो पुष्प गिरते थे| उनको चुन-चुन कर ले आती थी कान्हा जी के पूजन-वंदन के लिये|
उस पारिजात के पेड़ का मुझ पर कर्ज़ है| उसका आभार व्यक्त नहीं कर पाई|  विवाहोपरांत उससे मिलना नहीं हो पाया क्यूँकि पिताजी का तबादला हो गया था तो वो पुराना घर भी छूट गया जहाँ मेरी और उसकी मित्रता की यादें हैं| चाहती हूँ अगले जन्म में उसका ये कर्ज़ शायद उतार पाऊँ|
मैं किरू को पत्र पढ़ता हुआ देख रही थी….तभी…..तभी ईश्वर ने कहा……”चलो अब तुम्हारी इस जन्म की यात्रा समाप्त हुई……तुम्हें जाना होगा..हाँ मुझे जाना होगा…..मुझे जाना होगा.  जाना होगा….  तभी किसी ने जोर से मुझे झंझोड़ा….मैंने झटके से आँखें खोली| मुझे कुछ धुंधले चेहरे और गूँजती आवाज़े सुनाई दे रही थी| कुछ क्षण में पूरी तरह चेतना लौटी तो देखा पतिदेव कह रहे थे….”.तुम लौट आई….लौट आई तुम रूक्कू”…..मैं रूक्मिणी…..पति प्यार से रु़क्कू बुलाते हैं मुझे||उनकी और बेटे की आँखों में खुशी के आँसू थे|
मुझे लगा मैंने कोई स्वप्न देखा था| परन्तु वो स्वप्न नहीं था| सचमुच कुछ क्षणों के लिये इस संसार से विदा ली थी मैंने|
मैंने सामने रखी कृष्णा की मूर्ति की ओर देखा|वे मुझे देखकर मुस्कुरा रहे थे…..लगा कह रहे हों.  … अभी नहीं……अभी तो तुम्हें बहुत से काम करने बाकि हैं|”
मैंने भी सहमति में आँखों से हामी भर दी और नज़रें उठाकर देखा तो एक नया सवेरा सामने था, नई आशा और विश्वास के साथ सूर्योदय हो रहा था|
समझ गई थी कि जीवन का सही मर्म कि करने हैं बहुत से काम अभी| जीवन अभी बाकी है….बहुत बाकी है जीवन अभी……..
 (अँजू डोकानिया)
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4 COMMENTS

  1. सच में, बहुत कम करने हैं अभी तुम्हे, ये कहानी जीवंत हो आँखों के सामने चल-चित्र सी कौंध गई जैसे अपनी ही कहानी हो बस क़िरदारों के नाम बदल गए। तुम्हारी लेखनी पर ईश्वर की अनुकम्पा बनी रहे, मां सरस्वती प्रकाशपुंज सम तुमपर नेह बरसाती रहे ❣️

  2. सुनीता मेहता जी सहृदय आभार आपका|सदैव अपना स्नेह बनाये रखिये

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