क्योंकि मेरे साथ हो तुम ! (Poetry)

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भोर के उजाले में
जब होता है आरंभ 
जीवन का एक नया अध्याय
खिड़की से झांकता अनंत आकाश
कहता है मुझे बाहर आने को
मेरी उनींदी आंखों के सपनों से 
देता है दस्तक
एक नई शुरुआत को 
सबसे पहले तुम्हारा अक्स
आता है जहन में 
और फिर शुरू होता है 
जीवन रण के एक नए व्यूह का 
कभी कभी सोचती हूं
कि मैं अभिमन्यू हूं 
जो जीवन के चक्रव्यूह में
अकेला युद्ध कर रहा है 
संसार के कौरवों की
चतुरंगिनी सेना से 
और जो शायद कभी
बाहर नहीं निकल पाएगा
इस चक्रव्यूह से 
फिर लगता है मैं अर्जुन हूं 
क्योंकि मेरे साथ तुम हो 
मेरे सारथी मेरे साथी 
कृष्ण की तरह 
मुझे सही राह दिखाने वाले 
मुझे मेरे कर्तव्य पथ का
ज्ञान कराने वाले 
तुम्हारे विराट स्वरूप के
दर्शन किए मैंने
फिर भी एक अबूझ रहस्य
हो तुम मेरे लिए 
माया मोह में लिप्त
और कभी विरक्त भी 
कर रही जीवन युद्ध मैं 
इस विश्वास के साथ 
तुम हमेशा रहोगे मेरे साथ
मेरे सारथी मेरे सखा मेरे ईष्ट बनकर !!

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