Nirala : महाप्राण निराला का एक परिचय ये भी है!

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मैं ही वसंत का अग्रदूत !

महादेवी वर्मा निराला के अंतिम दिनों को याद कर के भावुक हो जाती हैं। बोलते-बोलते उनका गला रूँध जाता है। महादेवी वर्मा एक साक्षात्कार के दौरान कहती हैं:

“उस वक्त समझिए कुछ नहीं था। एक फटी चादर थी। वही छेद वाली फटी चादर ओढ़कर जमीन पर लेटे थे। अब तो रोना आ जाता है। बहुत कष्ट होता है उनको सोचकर। उनका एक टूटा बक्सा था जिसमें पैराडाइज लाॅस्ट और गीता, दो किताबें थीं। एक कपड़ा भी दूसरा नहीं। उसके बाद सरकार को (मृत्यु का) पता चला, तो ये हुआ कि उनका चित्र लेना है। कहां तो ओढ़ने को साफ चादर नहीं, कहां सरकार का पूरा विभाग दौड़ पड़ा और उनको सजाने लगा। जब वो मर गये तो उन्हें सजाने लगा, बताओ !”

अज्ञेय जैसे धीर-गंभीर और मितभाषी व्यक्ति ने भी निराला के कवि को मृत घोषित कर दिया था। यह बात निराला को शूल की तरह जीवन भर चुभती रही। अपनी विक्षिप्त मनोदशा में वो बार-बार इस उद्धरण को खुद दुहराते रहते ..निराला इज डेड !

बाद में अपने लिखे को मिटाने की अज्ञेय ने भरसक कोशिश भी की, लेकिन वह समय की शिला पर लिखा जा चुका मिथ्या वाक्य था। उस मिथ्या दुष्प्रचार में अज्ञेय निमित्त भर बने थे। उसे निराला के अलावा कौन मेट सकता था। अंततः निराला ने ‘तुलसीदास’ लिखकर उस प्रवाद का रचनात्मक प्रत्याख्यान किया।

‘तुलसीदास’ पढ़ने के बाद अज्ञेय की धारणा कुछ यूं बनी…”मैं मानो संसार का एक स्थिर चित्र नहीं बल्कि एक जीवंत चलचित्र देख रहा हूँ। ऐसी रचनाएँ तो कई होती हैं जिनमें एक रसिक हृदय बोलता है। विरली ही रचना ऐसी होती है जिसमें एक सांस्कृतिक चेतना सर्जनात्मक रूप से अवतरित हुई हो। ‘तुलसीदास’ मेरी समझ में ऐसी ही एक रचना है। उसे पहली ही बार पढ़ा तो कई बार पढ़ा। मेरी बात में जो विरोधाभास है वह बात को स्पष्ट ही करता है। ‘तुलसीदास’ के इस आविष्कार के बाद संभव नहीं था कि मैं निराला की अन्य सभी रचनाएँ फिर से न पढूँ, ‘तुलसीदास’ के बारे में अपनी धारणा को अन्य रचनाओं की कसौटी पर कसकर न देखूँ।”

निराला के काव्यपाठ को याद करते हुये अज्ञेय यह भी लिखते हैं, ” काश कि उन दिनों टेप रिकार्डर होते – ‘राम की शक्तिपूजा’ अथवा ‘जागो फिर एक बार’ अथवा ‘बादल राग’ के वे वाचन परवर्ती पीढिय़ों के लिए संचित कर दिए गए होते। प्राचीन काल में काव्य-वाचक जैसे भी रहे हों, मेरे युग में तो निराला जैसा काव्य वाचक दूसरा नहीं हुआ।”

निराला हिन्दी साहित्य के मल्ल थे। उनमें कवि होने का अकुंठ अभिमान था। वह अभिमान थोथा नहीं था। वह अनुकरणीय शील और ठोस चरित्र से सदा संवलित रहा। उसी से बना और सँवरा था। उस अभिमान को कोई चुनौती दे, यह निराला को बर्दाश्त नहीं। इसी आत्मबल से वो गांधी और नेहरू के सामने सीना तान कर खड़े हो गये थे। मुखापेक्षिता और याचना के लिए निराला के व्यक्तित्व में तिल भर अवकाश नहीं था। इससे वो जीवन भर लड़ते रहते और अभाव का गरल पीते रहे।

हमें स्कूल स्तर से ही निराला के विद्रोह के बारे में पढ़ाया जाने लगता है। सच भी है, निराला ने अंधकार, अशिक्षा और पराधीनता की जिस कारा को तोड़ा, उन्होंने भारतीय संस्कृति और मनीषा के जिस रिक्थ को समृद्ध किया, हिन्दी उनके दाय को कभी भुला नहीं सकती।

पाठकों के मन में निराला की क्रांतिधर्मी चेतना का सम्मान और भी बढ़ जाता है जब हम उनके परिवेश के बारे में पढ़ते हैं। आधुनिकता और प्रगतिशील मूल्यों का यह पुरोधा अपने अभाव, परिवेश और पिछड़ेपन में मध्यकाल में जी रहा था। वहां अखबार नहीं पहुँचते थे, लिखने के लिए कागज नहीं थे। वह पूरी तरह संचार से कटा हुआ था। जयशंकर प्रसाद को लिखे उनके पत्र इस बात की गवाही देते हैं। वो लिखते हैं, “आप मुझे पत्र लिखने पर अपना एक सादा letter paper साथ ही रख दिया कीजिएगा। बज्र देहात है। यहां कागज का बड़ा अभाव रहता है।”
(निराला की साहित्य साधना – 3)

9 दिसंबक 1927 के उक्त पत्र का उल्लेख करते हुये रामस्वरूप चतुर्वेदी कहते हैं, यह उस कवि का संघर्ष है जिसे आगे चलकर ‘राम की शक्तिपूजा’ और ‘तुलसीदास’ लिखना है।

क्रांतिधर्मी कवि-कलाकार बहुधा तेजोदीप्त हो तमाम मानवीय मूल्यों की अनदेखी कर जाते हैं। उनके तेज प्रभंजन में बहुत कुछ समूल उखड़ जाता है। कबीर का तेज भी इस बात की सनद है। तीक्ष्ण विवेक के स्वामी, भाषा को मनोनुकूल हाँकने वाले, और ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ के निर्भ्रांत उद्घोषक, कबीर भी स्त्री को मान न दे सके। नारी विषयक बद्धमूल आदिम धारणा को वो तनिक हिला न सके, और कह बैठे…नारी की छाया पड़त अंधा हो भुजंग !
कहना न होगा, माया महाठगिनी को जानने वाले और माया के तिरगुन रूप का सटीक संधान करने वाले कबीर भी स्त्री की इन बेड़ियों को न तोड़ सके। और, ताज्जुब तो तब होता है जब निवृत्तिकामी वही कबीर स्त्री का भेष धारण कर ईश आराधना में रागात्मिका वृत्ति से जुड़ जाते हैं। इस अवस्था में कबीर काव्य, कला, अध्यात्म और समर्पण के सर्वोत्तम भावों का स्पर्श करने लगते हैं। तब वो सर्वाधिक रमणीय और काम्य लगते हैं। लेकिन परलोकोन्मुखी कबीर ने अध्यात्म की चाहना में जीवात्मा स्त्री पर जितनी लाली उड़ेली है, उसका छटाँक भर भी यदि इहलोक पर छिड़क देते तो आधी आबादी का बड़ा उपकार करते।

यह देखना बड़ा दिलचस्प है कि कबीर और तुलसी अपने निर्गुण और सगुण के परस्पर विरोधी और मतांतर स्थापनाओं के बावजूद स्त्री विषयक मध्यकालीन मनोवृत्ति पर एकमत हैं। विधाता की इस रचना के प्रति तुलसी चाहे जितने प्रश्नाकुल हों, (कथ विधि सृजी नारि जगमाही?) कुठाराघात करते हुये (ढ़ोल गँवार शूद्र पशु नारी) वे भी वहीं पहुँचते हैं, जहां कबीर भुजंग के अंधा हो जाने से भयाक्रांत लुकाठी लेकर खड़े थे।

निराला में मानवतावाद सर्वोपरि था। उनका कवि स्त्री को देखते समय सहिष्णुता, धीरज और शील का परिचय देता है। वह स्त्री को देखकर गुहावास नहीं करता, उसकी छाया से बचकर भागता नहीं, बल्कि उसके लिए शीतल छाया की चिंता करता है। वह देखता है, “कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार !” स्त्री को देखने की निराला दृष्टि भी बड़ी अनूठी है. एक उदाहरण देखिये:

“श्याम तन, भर बंधा यौवन,
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन!”

ऐसी ही साफ दृष्टि में सरोज का सौंदर्य दमक उठता…
“तू खुली एक उच्छ्वास संग,
विश्वास स्तब्ध बध अंग अंग।
नत नयनों से आलोक उतर,
काँपा अधरों पर थर थर थर !”

आदिकाल ने अपह्रत किया, पूर्वमध्यकाल ने स्त्री को ढँका, उत्तरमध्यकाल ने ताक-झाँक की, और आधुनिक काल तो क्रांति की पिनक में उसे उघाड़ता ही चला गया। इस अंतराल में एक निराला ही थे, जिसने संतुलित दृष्टि से उसे देखने की स्वस्थ प्रस्तावना की।

निराला ने काव्य सौंदर्य का उदात्तीकरण किया। उनके पास क्रांति का उद्घोषक बादल है। वह न केवल गर्जना करता है, बल्कि बरसता भी है। उनका सौंदर्य विधान आसमानी नहीं है, वह पातालगंगा की तरह फूटता है और रससिक्त कर देता है …ज्यों भोगावती उठी अपार !

उनका काव्यनायक पवन, और नायिका जूही की कली है। उनके पास अभिसार के लिए प्रकृति का अनिंद्य उद्यान और गिरि कानन हैं।

उनके लिए स्मृतियां ही पाथेय, और अभाव ही संपदा है…
ले चला साथ मैं तुझे कनक,
ज्यों भिक्षुक लेकर स्वर्ण झनक।

जगत को फूल फल देकर अपनी प्रतिभा से चकित करने वाला, राग-विराग में झूमता मतवाला ही वसंत का अग्रदूत हो सकता है।

(अंबुज पाण्डेय)

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