मेनोपॉज़

अमृत धीरे से कमरे में गया। ज़ोहरा के करीब बैठा। उसके बिखरे बालों को सँभाल कर कानों के पीछे कर दिया। बहुत प्यारी लग रही थी ज़ोहरा...

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”हाँ, मैं थोड़ी मूडियल हो गई हूँ।  थोड़ी सनकी….यही कहना चाहते हो ना ?” ….ज़ोहरा के स्वर में कुछ तल्खी थी.

”अरे, नही जोहरा!! ऐसा नही कहा मैंने….”.अमृत ने हैरत से कहा।

ज़ोहरा को रोना आ गया …..”सब जानती हूँ मैं….तुम्हारा यही मतलब है। हाँ, आजकल मैं जल्दी थक जाती हूँ.….थोड़ा देर से भी उठने लगी हूँ कभी-कभी…क्यूँकि…क्यूँकि मेरे बदन में ….जोड़ों में अक्सर दर्द होता है। पेट में दर्द भी जैसे माहवारी के दिनों में होता है….असहनीय। पर कितने महीनों से मुझे मासिक धर्म आया ही नही है।

समझते हो इसका मतलब ? “- एक क्षण रुक कर खींझते हुए कहा ज़ोहरा ने।

अमृत रोती हुई ज़ोहरा को हैरत से देख रहा था। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या समझे और क्या कहे इसमें। जब वो कुछ समझ ही नही पा रहा। ज़ोहरा रोये जा रही थी सुबक-सुबक कर।

आजकल वो बहुत ही संवेदनशील हो गई है। बात-बात पर रो देती है….जैसे किसी ने कितनी बड़ी बात कह दी हो।

अमृत से देखा न गया ज़ोहरा का रोना….वो पास आकर उसे बाँहों में लेकर चुप कराना चाहता था। मगर ज़ोहरा ने उसे धकेल सा दिया।

मुझे किसी की भी ज़रूरत नही…न तुम…न बच्चे …कोई भी मुझे नही समझता….मैंने कुछ खाया है या नही…तुम्हें कहाँ फुर्सत होती है ये जानने की, अमृत!….दिन भर बस काम..काम और काम।” ज़ोहरा बड़-बड़ किये जा रही थी..अमृत सोच रहा था कि जो ज़ोहरा कह रही है ये सब सच है परन्तु उसने ऐसा कुछ भी नया व्यवहार नही किया उसके साथ…उसका काम ही कुछ ऐसा है। बिज़नेस न कर रहा होता तो शायद उसके पास वक्त की कमी सचमुच नहीं होती है और वो चाहकर भी परिवार को उतना वक्त नहीं दे पाता जितना कि देना चाहिये। ये बात ज़ोहरा अच्छी तरह से जानती भी है और समझती भी है…फिर अब ये शिकायत क्यूँ ?

अब हर दो-चार दिन में यही रूटीन बन गया था…ज़ोहरा छोटी-छोटी बातों में उखड़ जाती थी। अमृत बहुत दिनों से इस बदलते व्यवहार को नोटिस तो कर रहा था पर उतनी संजीदगी से नही लिया। सोचा कि वो ठीक हो जायेगी कुछ देर में।

परन्तु अब उसे ज़ोहरा की चिंता होने लगी थी। इधर बच्चे भी टीन एज उम्र के हो चले थे…गुस्से में कुछ कह दो तो आजकल के बच्चे भी नही सहते। पंद्रह साल की रोमा तो शांत रहती है, बड़ी है न निसर्ग से तीन साल.. लेकिन निसर्ग आजकल अमृत से कम्प्लेन कर देता था – “मम्मी को आजकल क्या हो गया है पापा ? उनका मूड आजकल कभी सही रहता ही नही। हर बात को उलटे ले लेती हैं….दुखी हो जाती हैं…रोने लगती हैं। जबकि हम ऐसा कुछ कहते भी नही जो उनको चोट पहुँचाये।

जब बेटे ने भी ऐसा कहा तो अमृत सचमुच परेशान हो गया।

ज़ोहरा सो गई थी रोते-रोते। उसने कुछ खाया भी नहीं था सुबह से। अमृत धीरे से कमरे में गया। ज़ोहरा के करीब बैठा। उसके बिखरे बालों को सँभाल कर कानों के पीछे कर दिया। बहुत प्यारी लग रही थी ज़ोहरा…आज भी उतनी ही खूबसूरत जितनी पच्चीस वर्ष पूर्व हुआ करती थी। अमृत ने उसके माथे को चूमा और चादर ओढ़ा कर कमरे से बाहर आ गया।  कमली (कामवाली दीदी) से कहा कि जब ज़ोहरा उठे उसे खाना खिला दे। बच्चों को फोन करके जल्दी घर आने को कहकर अमृत ऑफिस के लिये निकल पड़ा।

कार ड्राईव करते हुए अमृत यही सब सोच रहा था। मन बुरी आशंकाओं से भर गया था कि कहीं ज़ोहरा को कोई रोग तो नही हो गया ? जिसकी वजह से वो इतनी संवेदनशील और चिड़चिड़ी हो गई है कुछ महीनों से।

तभी सीट पर रखा मोबाईल बजा। अमृत ने सरसरी निगाह से देखा….माँ…माँ का फोन था..मसूरी से। अमृत का बचपन वहीं बीता था। आगे हायर स्टडी के लिये वो दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने आ गया और जॉब वही बहुत अच्छी लग गई। ज़ोहरा से वही कॉलेज में प्रेम हुआ था….माता-पिता की मंज़ूरी से शादी कर ली और वो ज़ोहरा के साथ दिल्ली में रहने लगा। कभी-कभी माता-पिता, कभी अमृत, जोहरा और बच्चे एक-दूसरे से मिलने आया-जाया करते थे। मतलब आपसी प्रेम और खिंचाव दोनों ही ओर से था।

अमृत की माताजी सुहासिनी जी एक बहुत ही समझदार और अनुभवी महिला हैं।  उन्होंने ज़ोहरा को कभी ये महसूस ही नही होने दिया था कि वो किसी दूसरे धर्म की है। एक माँ की तरह प्यार दिया और ज़ोहरा भी हमेशा से उनकी बेटी ही ब़न के रही, बहू नहीं।

अमृत ने कॉल रिसीव किया…इयर प्लग लगे हुए थे कानों पे। वायरलेस….कितना आसान हो जाता है न सब कुछ इन आधुनिक उपकरणों की वजह से।

अमृत ने कहा.. “हलो माँ प्रणाम! कैसी हैं आप ? ”
सुहासिनी ने कहा.. “मैं और तेरे पिता जी बिल्कुल ठीक हैं।
‘‘
तू, बच्चे और ज़ोहरा सब ठीक है ना ? ”
हाँ माँ सब……सब ठीक है…”.अमृत की ज़बान कहते हुए लड़खड़ा रही थी।

क्या हुआ अमृत …सब ठीक तो है ? मुझे क्यूँ ऐसा लग रहा है कि वहाँ कुछ ठीक नही। माँ ने कहा अमृत से।

नहीं माँ सब ठीक है…..बस..”.अमृत चुप हो गया…सुहासिनी भाँप गई कि बेटा परेशान है।
देख तुझे मेरी कसम!सच-सच बता क्या हुआ है ? “

अमृत फफक कर रो पड़ा। परन्तु सँभाला खुद को….माँ के सामने बच्चे का दर्द उभर ही आता है।

माँ न जाने ज़ोहरा को आजकल क्या हो गया है…..”और सारी बात सुहासिनी को बता दी।

कुछ पल वो खामोश रही…फिर बोली….”देख बेटा, मैंने तुझे हमेशा ऐसी परवरिश दी है कि तू औरत का सम्मान करे। जैसे तू मेरा करता है,मेरी परवाह करता है,मुझे समझता है…ठीक वैसे ही तुझे पत्नी की हर बात को भी समझना चाहिये। जैसे वो तुझे और बच्चों को समझती है…तुम सबका ख्याल रखती है।

सुहासिनी जी ने आगे कहा….”तू उसे एक अच्छी “गायनो” को दिखा ।  वैसे मैं समझ रही हूँ कि उसे आजकल ऐसा क्यूँ हो रहा है क्यूँकि मैं भी एक औरत हूँ और उसकी तकलीफ समझ सकती हूँ। तेरी कोई गलती नही क्यूँकि तुम्हें इसकी कोई जानकारी नही। परन्तु आज के समय में एक माँ को अपनी बेटी के साथ-साथ बेटे को भी इन बातों के लिये शिक्षित करना चाहिये। आगे उसे ही अपनी पत्नी के साथ जीवन गुज़ारना है।

मैं कुछ समझा नही माँ।

बेटा ज़ोहरा अभी उस परिस्थिति से गुज़र रही है जिससे उसके उम्र की हर औरत गुज़रती है..इस अवस्था को “मेनोपॉज़” कहते हैं। जब स्त्रियों का मासिक धर्म अनियमित हो जाता है..रूकने लगता है। जिससे शरीर की गर्मी सामान्य तरीके से बाहर नही निकल पाती जैसे पहले हो पाती थी। इसका सीधा प्रभाव उसके स्वास्थ्य पर पड़ता है।  वो शारीरिक और मानसिक तौर पर कमज़ोर होने लगती है। तब उसे समझना बहुत ज़रूरी है। उसका ख्याल रखना बहुत आवश्यक है। ऐसे समय में मूड स्विंग बहुत होते हैं बेटा। कभी बहुत खुश रहेगी तो कभी दुखी और परेशान हो जायेगी। तुम्हें और बच्चों को ये समझना होगा। जब तक वो इस स्थिति से बाहर न निकल जाये। इसमें वक्त भी लगेगा। तुम्हें संयम से काम लेना होगा अमृत।

अमृत चुपचाप सब कुछ सुन रहा था। सब कुछ उसके लिये नया और अजीब था पर वो समझ गया था कि उसकी ज़ोहरा को अभी उसके प्रेम और परवाह की खास तौर पर बहुत आवश्यकता है…भावनात्मक स्तर पर।

माँ ने पूछा….”समझा तुमने अमृत जो मै़ने कहा ? “

हाँ माँ! मैं समझ गया। थैंक्स माँ….आप जैसी माँ हर बेटे को मिलनी चाहिये। लव यू माँ।
सुहासिनी हँस पड़ी बोली….”चल शैतान माँ को बटरिंग करता है…..हा हा हा”

अमृत भी मुस्कुराने लगा…”ठीक है माँ मैं घर जाकर आपसे फिर बात करता हूँ….तभी पिताजी से भी बात हो जायेगी…मेरा प्रणाम कहना उनको। बॉय माँ”

फोन रखकर बिना सोचे अमृत ने कार घर की तरफ मोड़ दी। रास्ते में दोनों बच्चों से बात करके समझा दिया संक्षिप्त में सब कुछ।

अमृत घर पहुँचा….कमली ने दरवाज़ा खोला…..”भाभी उठ गई, कमली? …”अमृत ने कहा।
हाँ भई़या…नहाने गई हैं”

ठीक है पन्द्रह मिनट में मेरा और भाभी का खाना बेडरूम में ही ले आना। हम वही खायेगें…और सुनो ….एक ही प्लेट ले आना…समझी ? “

कमली का मुँह खुला का खुला रह गया…”जी भईया..” कहकर वो रसोईघर में चली गई।

अमृत कमरे में पहुँचा…..ज़ोहरा नहा कर आ चुकी थी। उसके गीले बालों से हल्का पानी टपक रहा था। कितनी मासूम लग रही थी। ज़ोहरा को हैरानी हो रही थी…अमृत! इस वक्त ?  इस वक्त तो ऑफिस में होते हैं……

तभी अमृत पास आया ज़ोहरा को ड्रेसिंग की पूफी पे बैठने का इशारा किया। न जाने क्यूँ ज़ोहरा भी चुपचाप उसकी बात का अनुसरण करते हुए बैठ गई। हेयर ड्रॉयर से उसके बाल सुखाये। बिंदी लगाई उसके माथे पर। ज़ोहरा समझ नही पा रही थी कि आखिर आज अमृत को हो क्या गया है। तभी कमली आ पहुँची खाना लेकर। ज़ोहरा ने कहा एक ही प्लेट ? अमृत ने कहा “मैंने ही कह था जान।

कमली को जाने का इशारा किया।

आओ, ज़ोहरा साथ खाना खाते हैं…कितना वक्त हो गया ना हमें एक ही प्लेट में साथ खाये। शुरूआती दिनों में हम ऐसे ही साथ-साथ खाते थे ना।

ज़ोहरा उसे घूर रही थी.. पर जैसे नींद से जागी..कहा . “हाँ…हाँ अमृत….तुम मुझे अपने हाथों से खिलाते थे और मैं तुम्हें।

अब रोज़ खिलाऊँगा ऐसे ही..” –रोटी का कौर ज़ोहरा के मुँह में रखते हुए अमृत ने कहा।

सच अमृत! आप सच कह रहे हो”- ज़ोहरा का गला कहते-कहते रूंध गया। वो खुश थी कि अमृत नाराज़ नहीं था बिलकुल भी।

हाँ ज़ोहरा बिल्कुल सच….”

जोहरा ने भी एक कौर अमृत को खिलाया। अमृत ने खा कर उसके हाथों को चूमा और प्यार से सर पर हाथ फेरते हुए कहा…”कल का एप्वाईंमेंट लिया है शीतल चौधरी का…द बेस्ट गायनो ऑफ द सिटी.कल पाँच बजे शाम तैयार हो जाना चलेंगे।

ज़ोहरा समझ नही पा रही थी अमृत का ये रूप…उसे किसी चमत्कार से कम नही लग रहा था। पर ये सच था बिल्कुल जो उसकी आँखों के सामने प्रत्यक्ष हो रहा था। उसने मुस्कुरा कर सर हिलाया। उसकी आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे।

अमृत समझ गया था…उसने ज़ोहरा के आँसू पोंछे।

बच्चे कमरे के बाहर से ये नज़ारा देखकर मुस्कुरा रहे थे अपने माता-पिता की खुशी देखकर।

उन्होंने भी जीवन का एक नया रहस्य,एक नया सत्य जान लिया था जिससे वे अनजान थे..

और कमाल तो तब हो गया जब ऑफिस से आने के बाद शाम को अमृत को कोने में ले जा कर रोमा ने समझाया – पापा, आपको पता नहीं है मम्मी क्यों चिड़चिड़ाती है..उनका मेनपॉज का टाइम है न..इसलिए ऐसा होता है.आप मम्मी के साथ कूल रहो!

अमृत खड़ा रह गया निश्शब्द..उसे आज पता चला कि बेटी बड़ी हो गई है ..और उससे कहीं ज्यादा समझदार भी..

(अंजू डोकानिया)

 

 

2 COMMENTS

  1. मां सरस्वती की अनुकम्पा बनी रहे अंजू डोकानिया ,तुम्हारे शब्दों के सम्मोहन में पाठक डूबते उतरते रहें । बेबाक़ लेखनी को सलाम, भाषा माधुर्य की उपलब्धि से तुमको सम्मानित किया जाना चाहिए ❣️

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