लिख दूँ कुछ तुम पर मैं, प्रियतम

जीवन के कैनवास पर नेह के भावों से सजी प्रेम की पाती जैसी कविता.. कहती सब कुछ फिर भी लगता बचा है अब भी जाने कितना..

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लिख दूँ कुछ तुम पर मैं प्रियतम

दिल मेरा ये चाह रहा है

पर दिल मे जो भाव भरा

वह शब्द निराले चाह रहा है

कैसे लिख दूँ प्रीत मैं अपनी 

इन साधारण से शब्दों में

मेरे प्रेम का सागर देखो

शब्दों की नई परिभाषा चाह रहा है !!

प्रेम में  तुम को कान्हा लिख दूँ

खुद को क्या लिख दूँ ये सोचूं

राधा सा मैं संग तो चाहूँ

पर मीरा सा भाव भरा है

तुम संग डोर जुड़ी जो मन की

गगन नया एक चाह रहा है

लिख  दूँ  कुछ तुम पर मैं प्रियतम

दिल मेरा ये चाह रहा है

पर दिल मे जो भाव भरा

वह शब्द निराले चाह रहा है !!

प्रेम लिखू मैं अपना जैसे

दीपक के संग जले पतंगा

या लिख दूँ ये प्रेम है ऐसा

सागर में जैसे हो नौका

तुझ में खो दूँ ये वजूद मैं

मिले न जिसको कोई किनारा

लिख  दूँ  कुछ तुम पर मैं प्रियतम

दिल मेरा ये चाह रहा है

पर दिल मे जो भाव भरा

वह शब्द निराले चाह रहा है !!

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