तुम हर लो मेरा तम !

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तुम हर लो मेरा तम !
दीप हो तुम तुम हो गौतम
तुम हर लो मेरा तम !
दिव्य प्रकाश उर्जा-स्त्रोत
पथ करता है जो रौशन
हो अहम दमन
रहे पूर्ण भाव-समर्पण
तुम हर लो मेरा तम!
मैं शशधर तुम शांत धरा
दिनकर तुम मैं तारा
मेरे उर के राम तुम
स्पंदन में वास तुम्हारा
मन हो दर्पन-सा निर्मल
हृदय भाव हो चंदन
तुम हर लो मेरा तम !
अवगुंठन अज्ञान का
लुंठन हुआ हमारा
कंठ का हलाहल भी
अमृत-रस की धारा
पुष्प मैं कानन का
तुम हो वसंत उपवन
तुम हर लो मेरा तम !
तुम हर लो मेरा तम !

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