हां, नारी तुम संसार हो!

0
21
हां, नारी तुम संसार हो 
इस सृष्टि का आधार हो
तुम मंद-सुगंध पवन जैसी
तुम सरिता-सा विस्तार हो
ऋतुओं जैसी मौसमी
छटा इंद्रधनुषी हो तुम
तुम पावन गंगाजल-सी हो
बागेश्वरी सम विदुषी हो
तुम वंदना का उद्गार हो
संस्कृति का व्यवहार हो
संतति का आधार हो
नव-जीवन का संचार हो
चंचलता हो तुम जीवन की
रस-मादकता हो मधुवन  की
तुम मंगल शुभ घड़ी, शुभ दिन सी,
तुम शक्ति-पुंज प्राकार हो
सभ्यता तुम्हीं से विकसित है
सम्पूर्ण विश्व खुशहाल है
रूप तुम्हारे भिन्न सभी में
फैली ये सृष्टि विशाल है
आवाहन हो माँ दुर्गा का
काली तुम चण्ड-प्रचण्ड-सी
अन्नपूर्णा-से भण्डार भरे
सौभाग्यवती अखण्ड-सी
ये विडंबना इस कलयुग की
असुरों का अत्याचार है
अबला समझ कर नारी को
कर रहे ये व्याभिचार हैं।
जब-जब दुनिया में पाप बढ़ा,
लिया तुमने शक्ति अवतार है
फिर दमन करो “महिषासुरों” का
सृष्टि पर पाप का भार है

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here