प्रेयसी – A story by Anju

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प्यारे शिरीष,
जानते हो प्रेयसी होने का अधिकार तुमने दिया. जब-जब जो दिया मैंने सहर्ष स्वीकारा है. क्यूँकि बहुत भरोसा है तुम पर. वैसे मैंने भी कभी कोई मांग तुमसे नही की…प्रेमिका जो हूँ….पत्नी नही…..
 नही मांगा कि तुम अपनी आलमारी में मुझे वो कोना दो जहाँ मैं सलीके से अपने कपड़े तुम्हारे कपड़ों के साथ रख सकूँ. नहीं माना तुम्हारे शयनकक्ष को अपनी विरासत ……नही माँगी तुम्हारे घर की चाबियों को कमर पर लटकाने की ज़िम्मेदारी. हर औरत अन्नपूर्णा है पर नही मांगा वो हक कि मैं तुम्हारे लिये तुम्हारी सेहत और पसंद के अनुसार भोजन बना सकूँ.  तुम्हें देर रात काम करने से रोकूँ, अपने स्वास्थ्य के प्रति जो लापरवाही तुम करते रहते हो ना…. वो मैं न होने दूँ. तुम्हारी दवाइयाँ खत्म होने से पहले मैं उन्हें खरीद लाती.
आफिस में फोन करके याद दिलाऊं कि जो टिफिन साथ दिया है प्लीज़ समय से खा लेना और हाँ ये भी पूछूँ कि रात के भोजन में तुम्हारी पसंद का क्या बनाऊँ? आज गुड़ की रसमलाई बना लूँ? ताकि तुम जी भर कर खा सको. जानती हूँ मीठा पसंद है तुम्हें… है ना!
मेरे पास तो इतना भी अधिकार नही कि तुम अपने बटुए में मेरी एक तस्वीर रख सको. तुम्हारे बारिश में भीगकर आने पर तौलिए से तुम्हारा सर पोंछ दूँ और गर्म तेल की चम्पी भी फिर… आहा….. वो तुलसी-अदरक की सुगंध और चमत्कारिक गुणों वाली चाय और गर्मागरम पकौड़े भी खिलाऊँ.  तुम्हारे एटीएम पर हक नही जताया और न ही कोई साड़ी, सलवार-क़मीज़ या गहने का उपहार माँगा….. हाँ प्रेम अवश्य माँगा… तुम्हारे हृदय का वो कोना जिस में मैं पूरे अधिकार से रह सकूँ.
वैसे मैंने भी महँगे उपहार न सही पर तुम्हारे कप की बची कॉफी को कल्पनाओं में आ कर अपने होंठों से लगाया है वो प्रेम चिन्ह अब भी उस पर अंकित है. मेरा वो गुलाबी स्कार्फ तुम्हारे पास इसलिये छोड़ दिया मैंने ताकि तुम्हें मेरे साथ होने का एहसास होता रहे.  समय के इतर और कुछ भी नही था मेरे पास जो मैं तुमको दे पाती जब तुम टूट रहे थे…. तब भी साथ थी तुम्हारे अब भी हूँ….
पर तुम्हारा वक्त अब बहुत व्यस्त हो गया है… जहाँ न दिन का होश है और न रात का आराम तुम्हें.. हाँ ज़िम्मेदारियों की भट्टी में खुद को झोंक दिया तुमने.. इतना कि तुम चाहते हुए भी अब मेरे लिये उपस्थित नही हो पाओगे.  पत्नी को साथ मिल जाता है इस व्यस्तता में भी पति का,,,, प्रेयसी को नही… न घर पर मुझसे बात कर पाते हो और न ही आफिस में…. तुम्हारा वक्त तुमसे भी अधिक व्यस्त और मूल्यवान हो गया है….
ये शिकायत नही प्रेम है…मुझे कुछ नहीं चाहिए… नही दे सकते अब समय  मुझे तो कोई बात नही….हृदय का प्रेम फिर भी कम नही होगा….हाँ पर अपने शौक और बचपने के लिये समय अवश्य निकालना कुछ देर ये तुम्हारे थके मन को संतोष व उर्जा प्रदान करेगा ताकि तुम दोगुने उत्साह के साथ  कार्य कर सको…. प्रेयसी हूँ ना तुम्हें कभी परेशान नही देखना चाहती… चाहती हूँ बस तुम प्रसन्न रहो….
कभी कुछ भी नहीं चाहिए तुमसे…. बस कभी यदि तुमको सचमुच मेरी याद आये तो चले आना क्यूँकि तुम्हारे दरवाज़े पर पड़ा व्यस्तता का ताला बहुत मजबूत है. बहुत प्रयास किया पर नहीं खुला….. खैर….. खुश रहो सदैव.
मैं प्रेमिका ही बने रहना चाहती हूँ तुम्हारी….. पत्नी नही…. तुम भी तो यही चाहते हो ना…..जैसा चाहते हो वैसा ही होगा…  मैं रहूंगी सदा…… तुम्हारी प्रेयसी!!

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