Rakshabandhan Poetry: यह मात्र नही धागा रेशम का

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पूर्णिमा खिली नभ में सुंदर
फैला प्रकाश रजत शशिधर
है अनुपम रूप कलानिधि
भ्राता-अनुज मेरे विप्रवर
बीता मधुरिम मधुमास विचर
पूरणमासी सौम्य-शीतल
उत्सुक दृग पंथ निहार रहे
है स्वसा रुचिर चंचल मनहर
मुखमंडल दमके ज्यूँ दिनकर
हो राम से धीर,वीर,आखर
चपला-चंचल जैसे गिरिधर
है वंश-मान तुमसे हलधर
माथे सोहे कुंकुम-केसर
इंदु-मुख रूप निहार रही
कर बंधन रक्षा-सूत्र का
स्नेहाशीष हूँ वार रही
माणिक-कुंदन औ मुक्ताहार
है व्यर्थ ये आभूषण-श्रृंगार
द्वि-लोचन से तुम राम-लषन
अनुराग हमारा है अपार
यह मात्र नही धागा रेशम
है मेरा प्रेम और अधिकार
हो तात-सखा सर्वस्व तुम्हीं
नैहर तुमसे तुमसे परिवार !

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