तुम्हारी जीवन-संगिनी !

(कहानी)

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पौ फटने को है……आज रात नींद नहीं आँखों में|

पर मैं समझता हूँ कि जान-बूझकर नहीं सोया|तुम्हारा इंतज़ार जो करना था…..हमेशा कि तरह कि तुम आओगी वही मेरी पसंदीदा गुलाबी साड़ी में लिपटी थोड़ी शरमाई.लजाई…..पर घबराहट नहीं|क्यूँकि इतने वर्षों के हमारे साथ ने एक-दूसरे पर विश्वास को पुख्ता जो कर दिया था|मैं तुम्हारा अप्रतिम सौन्दर्य निहार कर निहाल हुआ जा रहा था|पर मैं सिर्फ तुम्हारे देह की खूबसूरती का कायल नहीं…..तुम्हारे आत्मिक सौन्दर्य ने मुझे तुम्हारा दीवाना बना दिया है|जिसे मैं रोज़ तुम्हारे सुंदर मुखड़े पर चमकता देखता हूँ|

इतनी…..इतनी सादगी और मासूमियत का सुंदर समन्वय मैंने नहीं देखा था|तुम्हारे प्रेम और अनगिनत त्याग ने मुझे हर क्षण तुम्हारे और नज़दीक खींचा है|कभी…..कभी तुमने मुझे किसी स्वांग या टोटके से बाँधने का प्रयास नहीं किया प्रिये!!….

मैं स्वयं तुम्हारे इस निश्छल प्रेम की गंगा में डुबकी लगाने उतर गया|जो पवित्र.निर्मल और गहन है|कृतार्थ हूँ तुम्हारा कि तुमने मेरे रंगहीन.सूने जीवन की बगिया में सुंदर पुष्प खिला दिये|मेरे जीवन का बसंत हो तुम मेरी प्रिया…….

तुम मुस्कुराती हो तो जीवन-उपवन खिल उठता है….महकने लगता है|तुम्हारे अधरोंं की नमी मेरे शुष्क जीवन को प्राण दान देती है|तुम सदैव यूँ ही मुस्कुराती रहो मेरी अर्धांगिनी|

स्मरण है तुम्हें?…..एक बार तुमने पूछा था कि “कहीं मुझे भुला तो न दोगे प्रियवर!!”

मैंने कहा था…”तुम मेरा जीवन-अमृत हो.मेरी देह का अर्धभाग.मेरी चाहत.मेरा विश्वास.मेरा अभिमान…..तुम जीवन हो …तुमको कैसे छोड़ सकता हूँ स्नेह…….”

हाँ तुम बिल्कुल अपने नाम के अनुरूप थी……….थी?…..तुम हँस पड़ी …खिलखिलाकर…..हवा में तुम्हारी हँसी की तरंगें गूँजने लगी और तभी कुछ महसूस हुआ मुझे…..मैं..बैचेन हो गया….कसमसाने लगा …और …..और…..हड़बड़ा कर उठ बैठा…पसीने-पसीने….तेज़ श्वाँसें….गला सूख रहा था मेरा……स्वयं को सँभालते हुए मैंने पास की साईड टेबल पर रखा पानी का  गिलास उठाया और एक ही साँस में पूरा पी गया|कुछ देर में चित्त शांत हुआ|मैं अपने आस-पास तुम्हें ढूँढने लगा……कहाँ हो…कहाँ हो स्नेह……स्नेह……  कोई आवाज़ नहीं …. सब कुछ शांत था उस रात्रि के अन्तिम प्रहर में….कुछ पल के लिये मैं भी बिल्कुल शांत और चुपचाप किसी गहन विषय का चिंतन करने की मुद्रा में बैठा रहा| चेतना लौटी तो आभास हुआ कि स्वप्न देख रहा था|परन्तु विश्वास नहीं कर पा रहा था कि ये स्वप्न था|तुम…..तुम कितने क़रीब थी मेरे …….ओहहहह|यही सोचते-विचारते बिस्तर पर लेट गया आँखें बंद करके|

ज़ेहन में यकायक एक गीत कौंधने लगा…”तू जहाँ-जहाँ चलेगा . मेरा साया साथ होगा…मेरा साया..मेरा साया”….उफ्फ…. मैं ……मैं समझ गया कि तुम मेरे स्वप्न में हकीकत बन कर आई थी स्नेह…..|

आज भी तुमने अपना वादा निभाया है …जैस आज से पचपन वर्ष पूर्व मेरे जीवन में तुम आई थी स्नेह|

4 मार्च…आज हमारे विवाह की वर्षगाँठ है प्रिये…..तुम भूली नहींं..हाँ मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था और कब आँख लग गई पता न चला|अच्छा ही हुआ वर्ना तुमसे मुलाकात कैसे होती स्नेह|

आँखों से दूर परन्तु मेरे हृदय में तुम सदैव जीवंत हो….मेरी रगों में.मेरी धड़कन बनकर साथ हो|

हमारे प्रेम की निशानी जिनके बीच तुम मुझे छोड़ कर गई हो …..वो सब तुम्हारे ही अस्तित्व की छाया है|जो हर क्षण तुम्हारे प्रेम और परवाह का स्पर्श मुझे देते रहते हैं|

तुम इस जगत में कहीं नहीं हो परन्तु तुम फिर भी साथ हो…..मेरे अंग-संग……..मेरी स्नेह…..”वैवाहिक बर्षगाँठ की तुमको बहुत-बहुत बधाई …..मेरी जीवन-संगिनी.. …तुम मेरी आत्म-संगिनी हो..हमेशा….हमेशा के लिये|”

अगले जनम में भी तुम्हारी माँग में सिंदूर भरना चाहता हूँ.सात फेरे लेना चाहता हूँ तुम्हारे साथ… ये सौभाग्य दोगी ना मुझे?

सूरज की हल्की-हल्की लालिमा ये संदेश दे रही थी कि नये दिन की शुरूआत हो चुकी है जो इस बात का चिन्ह भी है कि उम्मीद पर दुनिया कायम है और मेरी चाहत भी ईश्वर अवश्य पूरी करेंगें…….खुद ब खुद हाथ उसकी प्रार्थना में उठ गये…………..मेरे होंठों पर दुआ और चेहरे पर  एक नई उम्मीद और विश्वास की मुस्कुराहट थी…..जो …. तुम हो….हाँ तुम……

समझ ग़या हूँ कि “जीवन के बाद भी एक जीवन है.जिसे प्रेम में रह कर जिया जा सकता है|”

मेरी स्नेहमयी….

सिर्फ तुम्हारा…….

 

(अंजू डोकानिया)

 

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