यादें बरसात कीं

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तुम्हें याद नहीं होगा 
हमेशा की तरह 
यह वाकया भी तुम्हारे ज़ेहन से उतर गया होगा , 
चलो आज इन बारिशों को देखकर वो सारी बातें अनायास ही याद आ गयीं
वो भी था इक बरसात का दिन 
कहीं जाना था हमें तुमने वादा किया था मुझे उनसे मिलवाने 
जो शहर के काफी प्रतिष्ठित डॉक्टर थे ,
व किताबें लिखना भी शौक था उनका, 
सो , 
बस आज ही हमारा मन हो गया कि मिल आते हैं 
बुलाया था उन्होंने मुझे, 
मुझसे मिलना चाहते थे 
आज छुट्टी सा भी था सो ऑफिस में कोई काम खास नहीं था 
सो हम निकल पड़े तुम्हारे पुराने स्कूटर पर बैठकर 
और हाँ, हमेशा की तरह तुम मुझे पानीपूरी खिलाने ले गए 
मेरा पसंदीदा 
तुम हमेशा जीत जाते थे और मै हमेशा हार जाती थी 
बात कुछ भी हो पर 
इस दस रूपए की पानीपूरी के चटपटे, तीखे, मीठे स्वाद के आगेे फिर किसी प्रकार का रूठना नही पनप पाता था दिल में मेरे
और तुम्हें खूब पता थी मुझे मनाने की कला 
खैर, हमने मजे से पानीपूरी खाया और हम चले उनसे मिलने 
शाम का धुंधलका सा हो रहा था शाम सिंदूरी जैसे
पंछी अपने घर को लौट रहे थे 
शाम वाली लैंप पोस्ट भी जल चुकी थी 
बस हम वहाँ पहुँच गए जिनसे मिलने हम पहूँचे 
वो काफी ऊर्जावान वृद्ध थे
कइएक तरह के काम करना उनके रोजमर्रा के कार्यों मे शामिल था
और घर उनका किताबों से भरा हुआ 
काफी बात चीत हुई, 
सच कहूँ तो मुझसे मिलकर उन्हें काफी खुशी हुई
इसी बीच जोरदार मूसलाधार बारिश शुरू हो गई 
अगस्त के महीने मे यूँ ही बारिश होती है 
एक ही बार सारे बादल बस बरस लेना चाहते हैं
बड़ी जल्दी रहती है इन्हें
इंतजार करना आता ही ना हो जैसे 
तो खूब बारिश 
और अब समय भी हो चुका था घर लौटने का 
पर जाएँ कैसे 
हम अगर भीग भी जाएँ तो कोई बात नही पर लैपटॉप का क्या होगा 
यही सोंचकर हम बारिश रूकने का इंतजार करने लगे 
पर कहाँ रूकने वाली थी बारिश 
वह तो और जोर और जोर बस बरसे ही जा रही थी 
यहाँ हमारी बातें भी खतम कहाँ हो रही थीं पर जाना है मन मे लगा था 
बारिश नहीं रूकता देखकर फिर हमने यूँ ही भीग कर जाने का फैसला किया 
और जाने से पहले उन्होंने मुझे उनकी लिखी 3 किताबें भेंट की 
इससे बड़ी खुशी की बात और क्या होगी , है ना !!!
मतलब आज बस खुशियाँ ही खुशियाँ मिल रही थी 
तो बस अब हम निकल पड़े 
लैपटॉप व मोबाईल को सुरक्षित रखते हुए भीगते हुए घर की ओर 
लैपटॉप की सुरक्षा की जिम्मेवारी मेरी, 
मै पीछे बैठी थी और लैपटॉप को ऐसे पकड़ रखा था कि कम से कम पानी नही जा पाए इसके अंदर 
वरना बहोत नुकसान हो जाता हमारा 
सारा काम वही तो संभालता है हमारा

और प्लास्टिक के कवर में मोबाईल हम दोनों के मेरी पर्स में 
तो हम निकल पड़े बारिश में 
पानी मे भींगते ही मन कितना खुशगँवार सा हो गया था हम दोनों का 
पानी की बूँदे जहाँ बदन पर चोट कर रहीं थी
ठंढी ठंढी बूँदों का देह को छूना कितना तृप्त कर जा रहा था हमारे अंतस को 
वहीं रोमांच भी महसूस करा रही थी बूँदें बारिश की
रास्ते में कोई नहीं था 
बस हम दोनों तुम्हारी स्कूटर पर भीगते जा रहे थे 
फिर जोर जोर से गाने भी गाते हुए 
बच्चों की तरह चिल्लाते हुए 
सच , कितना अद्भूत व सुंदर था ना वो सब 
बार बार तुम्हारी स्कूटर भी रूक जा रही थी 
तो भीगने का मौका बढता ही गया 
और मैं तो मानो यही चाह रही थी कि अच्छा ही है, कौन सा रोज रोज हमे ऐसे भीगने को मिलता है 
तो मैं तो बहोत ही खुश थी 
आज तो दोगुनी खुशी
आज तो नाचने का दिल कर रहा था 
बिल्कुल वैसे ही जैसे फिल्मों मे करते हैं 
पर यूँ ही सोंचते, चिल्लाते हुए, गाते हूए हम अंततः घर को पहुँच ही गए 
पूरी तरह से भीगे हुए 
पर ये क्या घर का आँगन तो आधा तालाब सा बन गया था 
पत्तों के गिर कर बहने से पानी की निकासी बंद हो गई थी 
और पूरा पानी भर गया था 
दो तीन सीढियों तक 
मैने स्कूटर से उतरकर सबसे पहले मोबाईल व लैपटॉप को सुरक्षित अंदर रखा 
और हम दोनों फिर से आँगन में आ गए 
कि चलो आज नाच भी लेते हैं 
और भीगी साड़ी को थोड़ा उठाकर बस शुरू हो गए हम दोनों 
दोनों साथ में एकदूसरे का हाथ पकड़ कर 
कि कहीँ हम फिसल ना जाएँ
छई – छपा – छई ………
छई – छपा – छई ……
जितना चीख सकते थे खुशी से उतना चीखे 
बिल्कुल बच्चों सरीखा था वह नाचना हमारा जैसे बच्चे कूद पड़ते हों पानी मे बस वैसे ही 
वह मेरे जीवन की सबसे सुंदर बरसात की रात थी 
मुझे आज भी याद है 
पर शायद तुम भूल गए……..

(श्वेता चंचल)

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