अभी भी एमपी & राजस्थान में भाजपा सरकार बना सकती है

    0
    1282

    तैयारियां पहले से होनी चाहिए. पहले से की गई तैयारियां आपकी उम्मीदों की रखवाली अच्छी तरह करती हैं. ऐन टाइम पर तो बेवकूफ भी हाथ-पैर मार लेता है. हालात के शिकार होना समझदारी नहीं, हालात के सवार बनना कलाकारी है.

    पर ईश्वरीय विधान अभी आपके पक्ष में है. ये चुनाव नहीं चेतावनी थी आपके लिए. 2019 सर पर सवार है. स्लॉग ओवर्स में लापरवाह बल्लेबाज़ी घातक सिद्ध हो सकती है. इसके विरोधी कोण पर दृष्टि डालें तो शायद वह भी कहीं आपके समर्थन में ही दिख रहा है. विपक्षी खेमा भी अब आपके रोग से ही आक्रान्त हो सकता है और अति-आत्मविश्वास की बीमारी उसे कई लापरवाहियां करने को विवश कर सकती हैं.

    किन्तु आप अब किंगमेकर की भूमिका में बहुजन समाज पार्टी को देख रहे हैं जिसे मध्यप्रदेश में दो ही सीटें मिली हैं. राजस्थान में इस पार्टी को सिर्फ छह सीटें मिली हैं. पर इन दोनों ही प्रदेशों में किंगमेकर मायावती ही हैं. यदि उनको महागठंधन की शक्ति में विश्वास होगा तो वह कांग्रेस को ही समर्थन देंगी. साथ ही उत्तरप्रदेश को ध्यान में रख कर 2019 में भाजपा से प्रतिशोध लेने का विचार भी उनके मन में है तो वह भाजपा से किसी तरह का गठजोड़ नहीं चाहेंगी. लगता है आज की स्थिति को लेकर बसपा की तैयारी पहले से ही पक्की थी.

    मायावती ने आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट तौर पर कहा है कि जनता को दिल में पत्थर रख कर कांग्रेस को चुनना पड़ा है, फिर भी मैं कांग्रेस को समर्थन देना चाहूंगी. मायावती ने दोनों तरफ के विकल्प खुले रखे हैं. कांग्रेस को समर्थन देने की घोषणा करके भाजपा के लिए अपने ‘भाव’ बढ़ा दिए हैं. और अब कोई भी हैरानी की बात नहीं होगी कि आगे आप मायावती को यू-टर्न लेते देखेंगे और कोई सुन्दर सा बहाना लगा कर बहन जी भाजपा को समर्थन दे देंगी और देखने वाले देखते रह जायेंगे.

    मायावती ने यू-टर्न का रास्ता खुला रखा है. उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि मजबूरी में न चाहते हुए भी हम कांग्रेस को समर्थन देने के लिए बाध्य हैं. शिवराज सिंह चौहान ने भी कह दिया है कि हमें स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण हम सरकार बनाने का दावा पेश नहीं करेंगे. इसका अर्थ है कि माया-राज सामने आ सकता है. अर्थात जैसा दिखाया जा रहा है उसका बिलकुल उलट भी हो सकता है.

    हां, यदि सचमुच ऐसा हो गया तो दोनो ही प्रदेशों में चेहरा-बदली हो सकती है अर्थात दोनों पूर्व मुख्य मंत्रियों को केन्द्र में खींच कर प्रदेश का सिंहासन नये और बेहतर चेहरों को दिया जा सकता है.

    इस दिशा में होने वाली अप्रत्यक्ष प्रक्रिया को कार्यान्वित करने हेतु अब कुछ बड़े लोग बीच में आ सकते हैं और कुछ बड़े समझौते हों सकते हैं. इसे हॉर्स ट्रेडिंग कोई कहे, तो गलत कहेगा. यह ट्रस्ट-ट्रेडिंग है. जिस पर विश्वास है उसी का साथ है. यह प्रतिष्ठा के संघर्ष से भी बड़ा अस्तित्व का संघर्ष है दोनों के लिए. प्रतिष्ठा सिर्फ आज का विषय है जबकि अस्तित्व आज के बाद भी और कल के बाद भी परम आवश्यक है..

    भाजपा थोड़ा सा अति-आत्मविश्वास का शिकार हो गई थी. पर इस चुनाव परिणाम से उसे बड़े युद्ध के लिए अब अंत समय में सम्हल जाने का लाभ मिला है. अब फूंक-फूंक कर कदम रखना उनके काम आएगा. अब आगे आप राजनीति का तेल देखिये और तेल की धार देखिये. शिव-माया तो शिव ही जानें..

    संस्कृत में एक नीति वाक्य है – यथा राजा तथा प्रजा. इसके बिलकुल उलट एक इंग्लिश फ्रेज़ है कि people have the government they deserve ! मोदी मान कर चल रहे थे कि जैसे वे स्वयं हैं जनता भी वैसी ही है अथवा वैसा ही बनने का अनुसरण करेगी. किन्तु राजा भोज के चाहने से भी गंगू तेली राजा भोज नहीं बन सकता. अतएव, फिलहाल मोदी जैसे धीर गंभीर नेता के लिए यह समय निराश या भावुक होने का नहीं है. उन्हें समय की सीख को स्वीकार करके आगे बढ़ना होगा.

    जनता जनता है. राष्टवाद और आदर्श जनजीवन का अंश नहीं होते. वरना सिर्फ कुछ क्रांतिकारी देश की आज़ादी के लिए जान नहीं देते, सारा देश अपना बलिदान कर देता. इसलिए जन संस्कृति को समझना होगा और उसे वैसे ही स्वीकार करना होगा. गालियां, मोब लॉन्चिंग, दंगा-फसाद, भ्रूण ह्त्या, दहेज़ ह्त्या, हॉनर किलिंग, आदि आपराधिक प्रवृत्तियां जनता के जीवन का हिस्सा हैं. इसलिए जनता को आदर्श नहीं समझा जा सकता, कुछ बेहतर लोग ही आदर्शों की सत्ता स्थापित करते हैं. यही लोग हैं जो जीवन में और समाज में स्तर निर्धारित करते हैं. किन्तु वर्तमान युग का दुखद सत्य यह है कि यही जनता जिसके लिए स्तर और आदर्श मायने नहीं रखते, अपने शासकों का चयन करती है. ऐसी स्थिति में आप क्या उम्मीद कर सकते हैं !

    हुइहहि वोहि जो राम रची राखा ..को करि तर्क बढ़ावहि साखा !

    (पारिजात त्रिपाठी)

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here