राष्ट्रपिता सुभाष बोस मरे नहीं थे, मारे गये थे?

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    ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा’ के प्रणेता सुभाष चंद्र बोस को नमन.

    जितना सौभाग्यपूर्ण है भारत के इस लाल का जीवन, उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है इस महान जीवन का समापन. भारत की स्वतंत्रता के लिए आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व करने वाले सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु एक रहस्य के आवरण से लिपटी हुई है. देश समय समय पर इस विषय पर राजनीतिक गलियारों में और बुद्धिजीवियों की बैठकों में चर्चा सुनता रहता है.

    आप और हम भी जब नेताजी के अंतिम समय की परिस्थितियों को देखते हैं तो उनके देहांत को नहीं उनके लापता हो जाने की घटना को देखते हैं. जिन परिस्थितियों में उनकी मृत्यु दिखाई गई है वे संदेह की परिधि से बाहर नहीं हैं और कई जाने माने लोग इस बात से सहमत हैं.

    चलिए हम खुद पड़ताल करते हैं उन हालात की जिनमें बताया गया है कि नेताजी का देहावसान हुआ है.

    चलते हैं आज से सतत्तर साल पीछे. वो तारीख थी 18 जनवरी, 1941

    स्मृति-दृश्य के इस शहर का नाम है कलकत्ता. रात के डेढ़ बजे हैं. कलकत्ता के मशहूर एल्गिन रोड पर एक बंगले के सामने एक कार आकर रूकती है. इस जर्मन वंडरर कार का नंबर था -बीएलए 7169. एक दाढ़ी मूछ वाले सज्जन बंगले से निकल कर इस शोफर ड्रिवेन कार की पिछली सीट पर आ बैठते हैं.

    लंबी शेरवानी, ढीले पायजामें और सोने की कमान वाला चश्मा पहने ये सज्जन हैं बीमा एजेंट मोहम्मद ज़ियाउद्दीन. यहां ड्राइवर और कोई नहीं उनका अपना भतीजा है जो उनके सम्मान में स्वयं इस सीट पर था और वैसे भी यह आवश्यक ही था. जियाउद्दीन साहब आते समय अपने बंगले के बाहरी कक्ष की लाइट्स ऑफ करना भूले नहीं थे, बल्कि जान कर ही जलता छोड़ आये थे.

    जियाउद्दीन साहब को नींद आ गई थी लेकिन उनका ड्राइवर सावधानी से कार चला रहा था. कुछ ही घंटों में कलकत्ता से काफी दूर निकल आये थे और अब उनकी कार चंदरनगोर की तरफ़ बढ़ रही थी.यह कार चंदरनगोर भी नहीं रुकी. कार रुकी तो धनबाद के पास गोमो स्टेशन पर जा कर ही. जियाउद्दीन साहेब उनींदी आँखों से गाड़ी से उतरे और उनका सामान ले कर चला एक कुली.

    चंद मिनटों में ही धड़धड़ाती हुई कालका मेल आ गई. इस ट्रेन से वे दिल्ली पहुंचे और फिर वहां से पेशावर. पेशावर में थोड़ा विश्राम कर जियाउद्दीन साहब काबुल की तरफ रवाना हुए और फिर काबुल हो कर वे बर्लिन पहुंच गए. यहां एक जर्मन पनडुब्बी में सवार हो कर उनकी यात्रा आगे बढ़ी और अपने अंतिम गंतव्य जापान जा पहुंची.

    और इस घटना के कुछ महीनों बाद भारतीय देशप्रेमियों ने रेडियो पर एक आवाज़ सुनी. लोगों में ख़ुशी की लहार दौड़ गई. जापानी रेडियो स्टेशन से आ रही ये आवाज़ थी सुभाष चंद्र बोस की. अपने देशवासियों से मुखातिब हो कर सुभाष के पहले शब्द थे-‘आमी सुभाष बोलछी!’

    अब हमें पता चलता है कि ये जियाउद्दीन साहब और कोई नहीं सुभाष ही थे. अपने ही देश में नज़रबंद सुभाष चंद्र बोस बीमा एजेंट जियाउद्दीन के रूप में 14 अँगरेज़ सीआईडी अफसरों को चकमा देकर भारत से निकलने में सफल हुए थे. यही नहीं आधी दुनिया पार करके वे भारत से जापान भी पहुँचे थे.

    फिर आया वर्ष 1945. द्वितीय विश्व युद्ध ने अपनी अखिरी सांस ली. जापान ने सरेन्डर कर दिया था. तीन दिन बाद ये तारीख थी 18 अगस्त की जब सुभाष बोस का एयरक्राफ्ट फ्यूल भरवाने के लिए ताइपे के हवाई अड्डे पर रुका.

    जब ईंधन भर जाने के बाद यान उड़ा तो अचानक एक धमाके की सी आवाज़ ने सभी को चौंका दिया. बोस की तरह ही उनके साथ चल रहे कर्नल हबीबुर्रहमान को भी यही प्रतीत हुआ मानो दुश्मन की विमानभेदी तोप का गोला उनके ही विमान को आ लगा हो.

    लेकिन ऐसा नहीं हुआ था. जो जानकारी बाद में सामने आई उसके अनुसार बोस के वायुयान के इंजन में कुछ खराबी आ जाने से उसका एक प्रोपेलर टूट गया था. इस कारण अचानक ही विमान नाक के बल ज़मीन से आ टकराया था और अंदर बैठे सभी यात्रियों की आँखों के आगे अन्धेरा छा गया.
    हबीबुर्रहमान ने होश आने पर देखा की उनके विमान में पीछे की तरफ से बाहर जाने वाला गेट बिखरे सामानों से पटा पड़ा था. और आगे की तरफ आग लग गई थी. हबीब ने सुभाष बोस को ज़ोर से चिल्ला कर कहा – “आगे से निकलिए नेताजी.”

    इसके बाद जो हबीबुर्रहमान ने बताया वो ये था कि जब विमान गिरा था तो नेताजी की ख़ाकी वर्दी पेट्रोल से सराबोर हो गई थी. जब नेताजी ने आग से घिरे दरवाज़े से निकलने की कोशिश की तो उनके शरीर में आग लग गई थी. आग बुझाने के प्रयास में हबीब के हाथ भी बुरी तरह जल गए थे. घायल हालत में सुभाष और हबीब को अस्पताल ले जाया गया. उसके बाद अगले दिन नेताजी होश आने के बाद बार बार अचेत हो जाते थे. उसी हालत में उन्होंने आबिद हसन को आवाज़ दी थी.

    जवाब दिया हबीब ने – “आबिद नहीं है साहब, मैं हूँ हबीब.”

    नेताजी ने कांपती आवाज़ में जो आखिरी सन्देश हबीब को दिया था वह यह था – लगता है मेरा अंतिम समय आ गया है. तुम भारत जा कर मेरे देशवासियों से कहना कि आज़ादी की लड़ाई जारी रखें.

    बताते हैं कि ये आखिरी रात थी नेताजी की. करीब नौ बजे उन्होंने देश और दुनिया को अलविदा कह दिया. अगले दिन तारीख थी 20 अगस्त 1945 जब नेताजी का अंतिम संस्कार हुआ. अंतिम संस्कार के पच्चीस दिन बाद हबीबुररहमान नेता जी की अस्थियों को लेकर जापान पहुंचे. अपने क्रांतियोद्धा पति को अस्थियों के रूप में सामने देख कर बोस की पत्नी एमिली फूट-फूट कर रोईं थीं.

    यहां यह बताना अत्यंत आवश्यक है कि ताइपेई के हवाई अड्डे से शुरू हो कर अंत तक की सारी कहानी हबीब की सुनाई हुई है.

    यही महीना था 1945 का जब एक शाम एमिली अपने वियना के फ़्लैट में अपने रसोईघर में अपनी माँ और बहन के साथ बैठ कर ऊन के गोले बना रही थीं.पास ही स्टूल पर रखे रेडियो में समाचार चल रहे थे. अचानक एमिली ने सूना कि समाचार वाचक ने कहा कि भारत के ‘देश द्रोही’ सुभाषचंद्र बोस ताइपे में एक विमान दुर्घटना में मारे गए हैं.

    एमिली की माँ और बहन भी चौंक गई. उन्होंने एमिली की तरफ देखा जो बिना कुछ कहे अपनी जगह से उठ कर बगल के शयन कक्ष में जा रही थीं. एमिली ने शयन कक्ष में सोती हुई जहाँ सुभाष बोस की ढाई साल की बेटी अनीता को गले लगा लिया.

    कई वर्षों बाद इस घटना को याद करते हुए एमिली ने कहा कि मैं बिस्तर में अनिता को गले लगा कर घुटने के बल बैठीं और सुबक सुबक कर रो रही थी.

    अब बात करते हैं असली बात की. जिस तारीख में हबीबुर्रहमान ने इस हवाई दुर्घटना की बात कही है उस तारीख को ताइपेई में किसी भी विमान दुर्घटना का कोई विवरण दर्ज नहीं है.

    जबकि बोस के साथ जा रहे हबीबुररहमान ने पाकिस्तान से आकर शाहनवाज़ समिति के सामने साफ़ तौर पर ये गवाही दी कि नेता जी उस विमान दुर्घटना में मारे गए थे और उनके सामने ही उनका अंतिम संस्कार किया गया था.

    जो सवाल हबीब से नहीं पूछे गए वो हम तात्कालीन कांग्रेस सरकार से पूछना चाहेंगे :

    1. अगर हवाई अड्डे पर दुर्घटना हुई तो दुर्घटना का रिकॉर्ड क्यों नहीं है?
    2. अमूमन देखने में ये आता है कि विमान दुर्घटना होने पर बहुत ही कम संभावना होती है कि कोई जीवित बच जाए..किन्तु हबीब बताते हैं कि वे और सुभाष दोनों जीवित बच गए थे और हॉस्पिटल लाये गए थे.
    3. अगर ये कोइंसीडेंस था तो क्या यह भी कोइंसीडेंस था कि बाद में सुभाष बोस की मृत्यु हुई किन्तु हबीब बच गए?
    4. ऐसा होने की संभावना बहुत ही नगण्य है कि उड़ान भरते ही विमान का एक डैना टूट गया. जबकि सब जानते हैं कि विमान का पूरा परीक्षण होता है तभी विमान को उड़ा न भरने की अनुमति मिलती है. तब भी ऐसा हो गया कि जहाज के उड़ान भरते ही दुर्घटना हो गई?
    5. ऐसा क्यों हुआ कि हबीब पहले पाकिस्तान गए बाद में वापस आ कर उन्होंने सुभाष बोस की मृत्यु को लेकर गवाही दी?
    6. ताइवान में उस समय जापानियों का कब्ज़ा था. जापान के पास आज भी ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है कि उस दिन वहां हवाई अड्डे पर कोई दुर्घटना हुई थी.
    7. सोवियत संघ के बिखर जाने के बाद भारत आये एक तात्कालीन स्कॉलर ने बताया था कि नेताजी तो ताइवान गए ही नहीं थे. वो साएगोन से सीधे मंचूरिया आए थे, जहाँ उन्हें हमने गिरफ़्तार किया था. बाद में स्टालिन ने उन्हें साइबेरिया की यकूत्स्क जेल में भिजवा दिया था जहाँ 1953 में उनकी मौत हो गई थी. इस तथ्य की सत्यता पर स्वतंत्र भारत की कांग्रेस सरकार ने जांच क्यों नहीं कराई?

    एक महत्वपूर्ण जानकारी के अनुसार नेहरू के स्टोनोग्राफ़र श्याम लाल जैन ने शाहनवाज़ जांच आयोग के सामने कहा था कि 1946 में उन्हें एक रात नेहरू का संदेश मिला कि वो उनसे तुरंत मिलने आ जाएं. उनके निवास तीन मूर्ति पर नहीं बल्कि आसफ़ अली के यहाँ जो उस ज़माने में दरियागंज में रहा करते थे.

    जैन कहते हैं कि नेहरू ने उन्हें ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली के लिए एक पत्र डिक्टेट कराया था जिसमें कहा गया था कि उन्हें स्टालिन से संदेश मिला है कि सुभाष बोस जीवित हैं और उनके कब्ज़े में हैं.

    अब इस बात का क्या जवाब है तब की कांग्रेस के पास.. और अभी तक भारत में राज करती आई कांग्रेस के पास.

    भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी इस विषय के विशेषज्ञ हैं. सुभाष बोस के लापता करा दिए जाने को लेकर उन्होंने बीबीसी के पत्रकारों को दिए गए इंटरव्यू में ही उन्होंने नेहरू के स्टेनोग्राफर वाले सबूत का ज़िक्र किया था.

    डॉक्टर स्वामी कहते हैं कि इस विषय पर दूसरा अहम सबूत उन्हें तब मिला जब वो चंद्रशेखर के मंत्रिमंडल में मंत्री बने. उस समय हमारे पास जापान से अनुरोध आया कि रिंकोजी मंदिर में सुभाष बोस की जो अस्थियाँ रखी हैं, उनको आप ले लीजिए लेकिन एक शर्त पर कि आप इसका डीएनए टेस्ट नहीं कराएंगे.”

    और एक सबसे बड़ी बात जो स्वामी ने इस विषय पर बताई है वो बिना जांच किये ही समय के गर्भ में समा गई. उन्होंने बताया था उनको पता चला था कि इंदिरा गाँधी ने अपने कार्यकाल में नेता जी पर एक पूरी फ़ाइल को अपने सामने फड़वाया (श्रेड करवाया) था.

    नेताजी की रहस्य्मयी मृत्यु पर एक पुस्तक भी लिखी गई है- ‘इंडियाज़ बिगेस्ट कवर-अप’. इस पुस्तक के लेखक अनुज धर कहते हैं कि उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय से मांग की थी कि उन्हें वो दस्तावेज़ उपलब्ध कराए जाएं जिसमें सोवियत संघ में सुभाष बोस के होने की जांच की गई. लेकिन पीएमओ ने ये कह कर इसे देने से इंकार कर दिया कि इससे विदेशी ताक़तों से हमारे संबंधों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा.

    अनुज धर का कहना है कि विदेशी संबंध तो एक बहाना है. असली भूचाल तो इस देश के अंदर ही आएगा.

    सुभाष चंद्र बोस पर एक विशेष पुस्तक और भी लिखी गई है -‘हिज़ मैजेस्टीज़ अपोनेंट’. यह पुस्तक उनके ही प्रपौत्र सौगत बोस ने लिखी है. सौगात बोस भी कहते हैं कि ये विदेश से संबंध ख़राब होने की बात गले नहीं उतरती.

    सौगत बोस ने बताया कि उन्होंने अपने शोध में पाया कि विंस्टन चर्चिल ने 1942 में सुभाष बोस की हत्या के आदेश दिए थे लेकिन इसका अर्थ ये नहीं हुआ कि इस मुद्दे पर भारत आज ब्रिटेन से अपने संबंध ख़राब कर ले.

    रूस से सम्बन्ध खराब होने के लंगड़े बहाने पर डॉक्टर सुब्रम्मण्यम स्वामी का तर्क है कि – “पहली बात तो ये है कि सोवियत संघ अब है नहीं. उस ज़माने में जनसंहार के ज़िम्मेदार माने गए स्टालिन पूरी दुनिया में बदनाम हो चुके हैं. पुतिन को इस बात की कोई परवाह नहीं होगी अगर स्टालिन पर सुभाष बोस को हटाने का दाग लगता है.”

    बड़े दुख से सौगत बोस बताते हैं कि उन्हें ये जान कर बहुत आश्चर्य हुआ कि नेहरू के कार्यकाल में इंटेलिजेंस ब्यूरो उनके पिता, चाचा और सुभाष बोस की पत्नी एमिली की चिट्ठियाँ खोलता रहा, पढ़ता रहा और उसकी प्रतियाँ बनाता रहा..किसी व्यक्ति की निजता में सेंध लगाने का इससे बड़ा उदाहरण नहीं मिलता. और ये तब जब कि निजी तौर पर नेहरू मेरे पिता को बहुत मानते थे. जब भी वो दिल्ली जाते थे, उन्हें अपने यहाँ नाश्ते पर बुलाते थे. कमला नेहरू की अंत्येष्टि में खुद सुभाष चंद्र बोस मौजूद थे.

    अनुज धर की एक अहम बात का भी राजगद्दी वाली कांग्रेस के पास जवाब नदारद है. अनुज कहते हैं कि – “मेरे पास ऐसे दस्तावेज़ हैं जिसमें नेहरू ने अपने हाथों से आईबी को चिट्ठी लिख कर निर्देश दिया है कि पता लगाओ कि बोस का पौत्र अमिय बोस जापान क्यों गया है और वहाँ क्या कर रहा है? क्या वो रेंकोजी मंदिर भी गया था?”

    और इसी बात को लेकर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और जाने माने पत्रकार एमजे अकबर का मानना है कि इस पूरे प्रकरण से यही संकेत मिलता है कि कहीं न कहीं नेहरू के मन में संदेह था कि बोस उस विमान दुर्घटना में नहीं मरे थे.

    अकबर कहते हैं, “कॉमन सेंस कहता है वो अपने परिवार से ज़रूर संपर्क करते. शायद इसलिए नेहरू उनके पत्रों की निगरानी करवा रहे थे.”
    2019 में यदि भाजपा सरकार फिर से चुन कर देश के राजपटल पर वापस आती है तो उसे इस अहम विषय की पूरी जांच अवश्य करानी चाहिए. क्योंकि यह है स्वतंत्र भारत के राष्ट्रपिता श्री सुभाष चंद्र बोस के साथ हुए अन्याय की कहानी!!

    बजाये इसके कि यह देश उन्हें उनके राष्ट्रप्रेम के लिए अभिनंदित करता, हमने उनके साथ हुए अन्याय पर अपनी मूक सहमति प्रदान की है! दुखद है यह सत्य..किन्तु मैं इस अकृतज्ञ सत्य का हिस्सा नहीं बनना चाहता!

    (पारिजात त्रिपाठी)

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