नौजवान क्रान्तिवीर खुदीराम बोस

    0
    1421
    Khudiram Bose

    खुदीरामबोस वह नौजवान क्रान्तिकारी थे जो मात्र 19साल की उम्र में हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिये हंसते-हंसते फाँसी पर चढ़ गये थे.

    इस में कोई संदेह नहीं कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास सैकड़ों क्रांतिकारियों के साहसिक कारनामों से अटा पड़ा है. ऐसे ही क्रांतिकारियों की सूची में एक स्मरणीय नाम खुदीराम बोस का भी है.

    बंगाल में मिदनापुर ज़िले के हबीबपुर गाँव में वह तारीख थी 3 दिसंबर 1899 की जब त्रैलोक्यनाथ बोस के घर जन्म हुआ था खुदीराम बोस का. बड़ी छोटी उमर में ही खुदीराम बोस के माता-पिताउनका साथ छोड़ कर दिवंगत हो गये थे. बड़ी बहन ने बड़ी मेहनत और शिद्दत से उनका लालन-पालन किया था. सन 1905 में बंगाल का विभाजन होने के बादखुदीराम बोस देश के मुक्ति आंदोलन में कूद पड़े थे. सत्येन बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया था.

     खुदीराम बोस राजनीतिक गतिविधियों में स्कूल के दिनों से ही भाग लेने लगे थे. उन दिनों अंग्रेज़ों से छोटे-छोटे हिन्दुस्तानी स्कूली बच्चे भी नफ़रत किया करते थे. वे जलसे जलूसों में शामिल होते थे तथा अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ नारे लगाते थे. बोस को ग़ुलामी की बेड़ियों से जकड़ी भारत माता को आज़ाद कराने की ऐसी लगन लगी कि उन्होंने नौवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और सिर पर कफ़न बांधकर जंग-ए-आज़ादी में कूद पड़े.

    वह रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और वंदेमातरम पंफलेट वितरित करने मेंमहत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. 1905में बंगाल विभाजन के विरोध में चलाए गए आंदोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़ कर भागलिया.

    पुलिस ने 28 फ़रवरी, सन् 1906 ई. को सोनार बंगला नामक एक इश्तहार बाँटते हुए बोस को दबोच लिया. लेकिन बोस मज़बूत थे. पुलिस की बोस ने पिटाई की और उसके शिकंजे से भागने में सफल रहे. 16 मई, सन् 1906 ई. को एक बार फिर पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया, लेकिन उनकी आयु कम होने के कारण उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था. 6 दिसम्बर, 1907 को बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर किए गए बम विस्फोट की घटना में भी बोस भी शामिल थे. उन्होंने अंग्रेज़ी चीज़ों के बहिष्कार आन्दोलन में बढ़चढ़ कर भाग लिया.

    उन दिनों कोलकाता का चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं को अपमानित और दंडित करने के लिए बहुत बदनाम था. क्रांतिकारियों ने उसे समाप्त करने का काम प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस को सौंपा. सरकार ने किंग्सफोर्ड के प्रति लोगों के आक्रोश को भांपकर उसकी सुरक्षा की दृष्टि से उसे सेशन जज बनाकर मुजफ्फरपुर भेज दिया. पर दोनों क्रांतिकारी भी उसके पीछे-पीछे पहुँच गए.

    किंग्सफोर्ड की गतिविधियों का अध्ययन करने के बाद उन्होंने 30 अप्रैल, 1908 को यूरोपियन क्लब से बाहर निकलते ही किंग्सफोर्ड की बग्घी पर बम फेंक दिया. किन्तु दुर्भाग्य से उस समान आकार-प्रकार की बग्घी में दो यूरोपियन महिलाएँ बैठी थीं जो कि पिंग्ले कैनेडी नामक एडवोकेट की पत्नी और बेटी थी, वे मारी गईं. क्रांतिकारी किंग्सफोर्ड को मारने में सफलता समझ कर वे घटना स्थल से भाग निकले.

    भारतीय स्‍वतंत्रता आंदोलन के आरंभिक चरण में कई क्रांतिकारी ऐसे थे जिन्‍होंने ब्रिटिश राज के विरुद्ध आवाज़ उठाई. खुदीराम बोस भारत की स्‍वतंत्रता के संघर्ष के इतिहास में संभवतया सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी थे, जो भारत माँ के सपूत कहे जा सकते हैं. बंगाल के विभाजन के बाद दुखी होकर खुदीराम बोस ने स्‍वतंत्रता के संघर्ष में अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों से एक मशाल चलाई. उन्‍होंने ब्रिटिश राज के बीच डर फैलाने के लिए एक ब्रिटिश अधिकारी के वाहन पर बम डाल दिया.

    कलकत्ता में उन दिनों किंग्सफोर्ड चीफ प्रेंसीडेसी मजिस्ट्रेट था. वह बहुत सख़्त और क्रूर अधिकारी था. वह अधिकारी देश भक्तों, विशेषकर क्रांतिकारियों को बहुत तंग करता था. उन पर वह कई तरह के अत्याचार करता. क्रान्तिकारियों ने उसे मार डालने की ठान ली थी. युगान्तर क्रांतिकारी दल के नेता वीरेन्द्र कुमार घोष]ने घोषणा की कि किंग्सफोर्ड को मुज़फ्फरपुर में ही मारा जाएगा. इस काम के लिए खुदीराम बोस तथा प्रपुल्ल चाकी को चुना गया.

    ये दोनों क्रांतिकारी बहुत सूझबूझ वाले थे. इनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था. देश भक्तों को तंग करने वालों को मार डालने का काम उन्हें सौंपा गया था. एक दिन वे दोनों मुज़फ्फरपुर पहुँच गए. वहीं एक धर्मशाला में वे आठ दिन रहे. इस दौरान उन्होंने किंग्सफोर्ड की दिनचर्या तथा गतिविधियों पर पूरी नज़र रखी. उनके बंगले के पास ही क्लब था. अंग्रेज़ी अधिकारी और उनके परिवार अक्सर सायंकाल वहाँ जाते थे.

    30 अप्रैल, 1908 की शाम किंग्स फोर्ड और उसकी पत्नी क्लब में पहुँचे. रात्रि के साढे़ आठ बजे मिसेज कैनेडी और उसकी बेटी अपनी बग्घी में बैठकर क्लब से घर की तरफ आ रहे थे. उनकी बग्घी का रंग लाल था और वह बिल्कुल किंग्सफोर्ड की बग्घी से मिलती-जुलती थी. खुदीराम बोस तथा उसके साथी ने किंग्सफोर्ड की बग्घी समझकर उस पर बम फेंक दिया. देखते ही देखते बग्घी के परखचे उड़ गए. उसमें सवार माँ बेटी दोनों की मौत हो गई. क्रांतिकारी इस विश्वास से भाग निकले कि किंग्सफोर्ड को मारने में वे सफल हो गए है.

    खुदीराम बोस और घोष 25 मील भागने के बाद एक रेलवे स्टेशन पर पहुँचे. खुदीराम बोस पर पुलिस को इस बम कांड का संदेह हो गया और अंग्रेज़ पुलिस उनके पीछे लगी और वैनी रेलवे स्टेशन पर उन्हें घेर लिया. अपने को पुलिस से घिरा देख प्रफुल्ल चंद ने खुद को गोली मारकर शहादत दे दी पर खुदीराम पकड़े गए. उनके मन में तनिक भी भय की भावना नहीं थी. खुदीराम बोस को जेल में डाल दिया गया और उन पर हत्या का मुक़दमा चला. अपने बयान में स्वीकार किया कि उन्होंने तो किंग्सफोर्ड को मारने का प्रयास किया था. लेकिन उसे इस बात पर बहुत अफ़सोस है कि निर्दोष कैनेडी तथा उनकी बेटी ग़लती से मारे गए.

    मुक़दमा केवल पाँच दिन चला. 8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें प्राण दण्ड की सज़ा सुनाई गई. इतना संगीन मुक़दमा और केवल पाँच दिन में समाप्त. यह बात न्याय के इतिहास में एक मज़ाक बना रहेगा. 11 अगस्त, 1908 को इस वीर क्रांतिकारी को फाँसी पर चढा़ दिया गया. उन्होंने अपना जीवन देश की आज़ादी के लिए न्यौछावर कर दिया

    मुज़फ्फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने उन्हें फाँसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फाँसी के तख़्ते की ओर बढ़ा था. जब खुदीराम शहीद हुए थे तब उनकी आयु 19 वर्ष थी. शहादत के बाद खुदीराम इतनेलोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे उनके नाम की एक ख़ास किस्म की धोती बुनने लगे. इनकीशहादत से समूचे देश में देशभक्ति की लहर उमड़ पड़ी थी. इनके साहसिक योगदान को अमरकरने के लिए गीत रचे गए और इनका बलिदान लोकगीतों के रूप में मुखरित हुआ. इनकेसम्मान में भावपूर्ण गीतों की रचना हुई जिन्हें बंगाल के लोक गायक आज भी गाते हैं.

    इतिहासकार शिरोल के अनुसार- बंगाल के राष्ट्रवादियों के लिए वह शहीद और अधिक अनुकरणीय हो गया.विद्यार्थियों तथा अन्य लोगों ने शोक मनाया. स्कूल-कॉलेज बंद रहे और नौजवान ऐसीधोती पहनने लगे जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था.

    खुदीरामबोस को भारत की स्वतंत्रता के लिए संगठित क्रांतिकारी आंदोलन का प्रथम शहीद माना जाता है. अपनी निर्भीकता और मृत्यु तक को सोत्साह वरण करने के लिए वे घर-घर में श्रद्धापूर्वक याद किए जाते हैं. खुदीराम बोस की शहादत से समूचे देश मेंदेशभक्ति की लहर उमड़ पड़ी थी. उनके साहसिक योगदान को अमर करने के लिए गीत रचे गएऔर इनका बलिदान लोकगीतों के रूप में मुखरित हुआ. उनके सम्मान में भावपूर्ण गीतोंकी रचना हुई, जिन्हें बंगाल के लोक गायक आज भी गातेहैं.

    (इन्दिरा राय)

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here