बूंद-बूंद पानी बचाएंगे तब जा कर घूंट-घूंट पानी मिलेगा

अभी भी बच सकते हैं हम..अगर इस स्थिति को जीवन-मृत्यु का प्रश्न बना कर कमर कस लें

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जैसा मैंने अपने पिछले लेख में कहा था कि समस्या जितनी विकराल है उसका समाधान भी उतने ही व्यापक स्तर पर होना चाहिए.

न सिर्फ व्यापक स्तर पर बल्कि सैन्य स्तर पर भी जल संकट से निपटने के लिए सरकार को गंभीर होना होगा. और सिर्फ सरकारी प्रयासों से काम नहीं चलेगा, सरकार के साथ जनता को भी कमर कसनी होगी.

शायद मेरा यह लेख आम जनता से ऊपर के लोग ही यहां पढ़ेंगे. पर यह हम सबकी समस्या है बराबर से. इसलिए सभी लोग यदि जागरूक हो कर दूसरों को भी जागरूक करने का दायित्व गंभीरता से लें तो हम सब मिलकर इस प्राकृतिक विपदा से बच सकते हैं

यहां कुछ सुझाव हैं जो मेरे विचार से बड़ा फर्क ला सकते हैं. यदि इन पर अमल किया गया तो कदाचित ये संकट हम टाल सकते हैं और फिर इस संकट से सदा के लिए उबर भी सकते हैं. हम आधुनिक तो हो गए और कहने को इक्कीसवीं सदी के सभ्य भी हो गए किन्तु जल, वायु, मिटटी, पेड़-पौधे आदि प्राकृतिक सम्पदा को सम्हाल कर इस्तेमाल करना हमने आज भी नहीं सीखा.

घर में हर परिवार के मुखिया को ये जिम्मेदारी लेनी होगी कि अपने परिवार को पानी बचाने के लिए प्रोत्साहित करे. बच्चों को पानी का महत्व समझाए और देश के जल संकट को उनके सामने रखे ताकि बच्चों से होने वाला जल का अपव्यय रुक सके.

परिवार के बड़े लोग स्नान में पानी की बरबादी न करें. देखा जाता है कि आम लोग स्नान करते समय एक के बाद एक बाल्टी में पानी भर कर लोटे या मग से अपने ऊपर डालते चले जाते हैं. जिनके घर में शावर है वो शावर चालू करके देर तक नीचे खड़े रहते हैं और इसको स्नान मानते हैं. यह जल का शुद्ध अपव्यय है, स्नान नहीं. स्नान तो आधी बाल्टी पानी में भी हो जाता है. वो भी साबुन से नहाइये तो भी आधी बाल्टी से काम चल जाता है. पूरे शरीर को भिगोने के लिए चार-पांच लोटा पानी काफी है. उसके बाद साबुन लगा कर शरीर की मालिश करके आधा आधा लोटा पानी धीरे-धीरे और समझदारी से डाल कर बदन को फिर से मसाज करते हुए आधी बाल्टी पानी से आराम से नहा सकते हैं. आप विश्वास नहीं करेंगे लेकिन आजमा के देखिये. आधी बाल्टी पानी में आप साबुन से नहा सकते हैं और उसमें भी थोड़ा पानी बाल्टी में बचा सकते हैं. दो-तीन बाल्टी पानी बदन पर फेंक कर बरबाद करना निरी मूर्खता है और जल का दुखद अपव्यय भी.

घर के पुरुष भी रोज़ बाथरूम में जल का अपव्यय करते हैं. ब्रश करते समय और शेविंग करते समय अक्सर ऐसा होता है कि नल चलता रहता है और आप ब्रश करते रहते हैं या शेव करते रहते हैं. ये बेवकूफाना किस्म की बरबादी है पानी की. आप सोचिये साल भर में आप कितना पानी आप बहा देते हैं. साल छोड़िये दिन की बात करते हैं. इस तरह रोज़ कितना पानी आपके हाथों बरबाद होता है. और थोड़ा गणित को बेहतर कर लेते हैं. देश में यदि सवा सौ करोड़ लोग रोज़ इसी तरह पानी बरबाद कर रहे हैं तो ज़रा सोचिये रोज़ कितना पानी बरबाद हो रहा है.

आपके घर की काम वाली याने कि बर्तन वाली बाई को कहिये कि बरतन मांजते समय पानी कम फेंके. अगर आपको पता न हो तो खुद जाकर किचेन में देखिये. वे जितनी देर बर्तन मांजती हैं नल लगातार चलता रहता है. भले ही वो उस नल का बर्तन धोने में उस समय इस्तेमाल कर रही हों या बीच बीच में कर रही हों, नल बहता रहता है और वे बर्तन मांजती रहती हैं. ये अजीब सी बात है. शायद इससे उनका कुछ मिनट्स का टाइम बच जाता है. लेकिन इतनी देर में कितना सारा पानी नाली में बेकार बह जाता है, आप आसानी से अंदाज़ा लगा सकते हैं.

बड़े और चौड़े टैब बंद किये जाएँ जो एक दम ही ज्यादा पानी फेंकना शुरू कर देते हैं. उनको रिप्लेस करके हर बाथरूम में छोटे मुँह वाले टैब लगाए जाएँ. होटलों में या जनसुविधा केंद्रों में उन टैब्स का भी इस्तेमाल बंद किया जाये जिनको ऊपर से घुमा कर चालू और बंद नहीं करना पड़ता. उनको सिर्फ दबा देने से कुछ देर तक पानी आता रहता है. ये भी पानी की बरबादी है. जितना पानी आपको हाथ या मुँह धोने को चाहिए उससे दस गुना अधिक पानी एक बार में बह जाता है. ऐसे नल आप चाह कर भी बीच में बंद नहीं कर सकते. देश भर में एक दिन में ही करोड़ों ऐसे नल कितने पानी की बरबादी करते होंगे इसका अनुमान क्या आप लगा सकते हैं?

एक बहुत बारीक छन्ने वाला टैब माउथ / टैब कवर बाजार में उपलब्ध है जो बहुत बारीक जलधार फेंकता है जिसमे बहुत कम मात्रा में जल बाहर आता है लेकिन वो इतना फैल कर बाहर आता है कि अपना काम पूरा करता है पानी काम भर के लिये पूरा आता है लेकिन कम मात्रा में आता है. अगर नल-छन्ना-कवर भारतीय बाजार में उपलब्ध न हो तो इनको बाहर से आयात किया जाये. ज्यादातर देखा जाता है कि जल ज्यादा बर्बाद करते हैं हम लोग. हाथ धोने या मुँह धोने के लिए जितना पानी चाहिए उससे अधिक पानी नल से निकल कर बर्बाद होता है हमसे. और ऐसा रोज़ होता है और दिन भर होता रहता है.

घर घर जा कर चेकिंग की जाये. बहते और लीक होते नल सुधारे जाएँ. यदि दोबारा वे बहते हुए मिलें तो उस घर का चालान हो. तीसरी बार भी यही हालत पाई जाए तो व्यक्ति को जेल भेजा जाये.

हर मोहल्ले में वाटर वाच डॉग बनाये जाएँ जो पानी बरबाद करने वालों पर नज़र रखें, उनको रोकें और न मानने पर उनकी एफआईआर की जाए. शिकायत की बजाये ऐसे लोगों की एफआईआर हो तो लोग ज्यादा जल्दी सचेत होंगे.

कानूनी अनिवार्यता बनाई जाए. जनता को बताई जाए. जल बरबाद करने वालों पर कानूनी कार्रवाई की जाए. बार-बार ऐसा करते पाए जाने वाले लोग जेल भेजे जाएँ.

सिर्फ सरकार ही नहीं जनता भी इस बड़ी मुहिम का हिस्सा बने. हर व्यक्ति इसे अपनी जिम्मेदारी समझे और दूसरों को भी समझाए कि पानी बर्बाद न करें, पानी बचाएं. जो न समझे या समझने को ही न तैयार हो उसकी शिकायत की जाए.

सरकारी स्तर पर जन-जन को जल-संकट की जानकारी दी जाए. ताकि लोगों को समझ आये कि जल की बरबादी कुल मिला कर उनका अपना ही घातक नुकसान है.

स्वीमिंग पूल बंद किये जाएँ. अब पानी विलासिता की वस्तु नहीं रह गई है. दर-असल जल कभी विलासिता की वस्तु थी ही नहीं. बस हमने ही उसकी कदर कभी न जानी. इसलिये अब तो कम से कम अति-उपयोगिता की दुर्लभ होती जा रही वस्तु घोषित किया जाए.

जल संसाधन मंत्रालय को एक टेलीफोन सेवा शुरू करनी चाहिए जिसमें सिर्फ पानी की बरबादी की शिकायतें रिसीव की जाती हों. कहीं भी आपको पानी बरबाद होता दिखे या कोई पानी बरबाद करता दिखे तो आप कॉल करके उनकी शिकायत करें.

दिन भर एक्सेस में पानी बहा कर कार, स्कूटर, मोटर-गाड़ी या अपनी दूकान / घर के सामने सड़क धोते लोगों के विरुद्ध शिकायत हो और त्वरित कानूनी कार्रवाई हो.

हर घर, हर दूकान, हर भवन पर छत में वाटर हार्वेस्टिंग को कम्पलसरी किया जाये. सरकारी मदद के साथ सरकारी निगरानी में इसकी लॉन्चिंग हो और आगे भी इसकी निगरानी जारी रहे ताकि जिस आवश्यकता को दृष्टि में रख कर यह कदम उठाया गया है उसकी वास्तव में पूर्ति हो. पौधारोपण अभियानों की तरह न हो कि पौधा लगाते समय बहुत शोर-शराबा उत्साह और उत्सव होता है, किन्तु कुछ दिनों बाद वह नन्हा पौधा अपनी मौत मरने को मजबूर हो जाता है. देखरेख हमेशा जरूरी है, चाहे छोटे बच्चे हों, छोटे पौधे हों या छोटे मगर बड़े कदम हो – वाटर हार्वेस्टिंग की तरह.

हर व्यक्ति हर माह कम से कम एक पौधा लगाए. और सरकार इसे अनिवार्यता बनाये. वन विभाग या जल विभाग अथवा दोनों विभाग मिल कर प्रत्येक व्यक्ति के इस योगदान को रजिस्टर करें और इसके लिए उनको प्रोत्साहित करें तथा ऐसे लोगों को भांति-भांति के पुरस्कारों और सामानों से नवाज़ें. हर व्यक्ति पेड़ लगायेगा तो पेड़ों के झुन्ड बादलों को बुलाएंगे और बादल आएंगे तो पानी बरसेगा.

होटलों को मिलने वाले अनलिमिटेड पानी की सप्लाई को रोका जाये. उनको उनकी सही जरूरत के मुताबिक़ ही पानी दिया जाये. और उनके द्वारा बताई गई जरूरत का परीक्षण करके ही जल की मात्रा उनके लिये स्वीकृत की जाए.

पानी बचाने के अधिक से अधिक उपाए सोचे जाएँ. पानी बचाने के सुझाव जनता से आमंत्रित किये जाएँ. अच्छे सुझाव देने वालों को सम्मानित किया जाये और उनके उपाए अमल में लाये जाएँ.

छोटी सी एक बात, जो देश भर के लोगों की गिनती को सामने रख कर देखी जाये तो बहुत ही बड़ी हो जाती है – हम लोग अक्सर गिलास भर पानी ले तो लेते हैं लेकिन आधा अधूरा पानी पी कर बाकी गिलास का पानी फेंक दिया करते हैं. इससे हमारी अपनी लाइफ-लाइन और जीवन के लिये जरूरी प्रकृति की सबसे बड़ी देन के प्रति असंवेदनशीलता साफ दिखाई देती है.

देश भर में व्यापक स्तर पर वाटर रीसाइक्लिंग प्लांट्स लगाए जाएँ. अब वाटर रीसाइक्लिंग प्लांट्स बौद्धिक वागविलास न हो, व्यवहार की वस्तु बने.

वाटर हार्वेस्टिंग का प्रबंधन हर घर, दूकान और भवन की छत पर की जाए. यही नहीं हर बगीचे का आधा हिस्सा वाटर हार्वेस्टिंग के लिए सुरक्षित कर दिया जाए.

सरकार भी अपने स्तर पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास जारी रखते हुए इज़राइल और अमेरिका जैसे देशों से समुद्र का खारा पानी उपयोग लायक मीठे पानी में बदलने की तकनीक लाय और अविलम्ब युद्ध स्तर पर उस पर कार्य प्रारम्भ किया जाये.

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