महाराष्ट्र सरकार कांड के तीन ‘खेल’नायक

    (संपादकीय)

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    संजय राउत, उद्धव ठाकरे और शरद पवार.. नेता ‘समझ’दार और जनता लाचार

    वैसे तो कहानी अभी बहुत बाकी है लेकिन महाराष्ट्र सरकार निर्माण प्रकरण पर देखे गये अभी तक के राजनीतिक ‘सिनेमा’ में तीन खिलाड़ियों का किरदार सबसे अहम नज़र आता है. इस सरकार-निर्माण-नाकामी-काण्ड के तीन खलनायक, जिन्होंने अपनी बुद्धि से सारा खेल किया, इस काण्ड के ‘खेल’नायक की उपाधि के प्रबल दावेदार हैं.

    सबसे पहले इस ‘खेल’नायक तिकड़ी के सामने का चेहरा सबसे पहले आता है जो हैं संजय राउत. तेजतर्रार होना सफल राजनीति की ग्यारंटी नहीं होता. वैसे तो ये संजय राउत के हिसाब से बड़ी ही समझदारी से खेला गया खेल था लेकिन परिणाम की तरफ नज़र डालने पर यही नज़र आता है की काफी कच्चा खेल खेला गया है. न खुदा ही मिला न विसाले सनम और धोबी का श्वान न घर का न घाट का जैसी मुहावरों का व्यवहारिक उदाहरण बना है तथाकथित किंगमेकर्स का ‘राज’नैतिक व्यवहार.

    संजय राउत की महत्वाकांक्षा पहली बार इतना परवान चढ़ी कि उन्होंने सीधे सीधे देश की सबसे बड़ी पार्टी से पंगा ले लिया. जानते हुए भी कि पैरों के नीचे पर्याप्त जमीन नहीं है, उन्होंने अनुमानों पर दांव खेल लिया ये सोच कर कि सामने वाले खिलाड़ी को पता नहीं कि उनके पास इक्का बेगम बादशाह तीनो नहीं. इक्का अपना, बेगम कांग्रेस की और बादशाह एनसीपी का. पर बीजेपी तो ये मानकर बैठी थी कि इक्का तो हमेशा उनका है, बाकी बेगम बादशाह किसी का भी हो.

    बीजेपी ने सीधी शह दी शिवसेना के बादशाह को. शिवसेना के कमज़ोर बादशाह को एनसीपी के ढाई घर वाले घोड़े की चाल ने कन्फ्यूज़ कर दिया. और उसके बाद शिवसेना को लगा कि अभी मात नहीं हुई है. अभी कांग्रेस का ऊँट बादशाह को बचा के निकाल सकता है. लेकिन कांग्रेस का ऊँट किस करवट बैठेगा इसका अनुमान उनको नहीं था. ऊंट उकड़ू बैठा रहा, चला ही नहीं. ऊंट का घूंट पी कर रह गये उद्धव. खून का घूंट भी इतना कड़वा नहीं होता शायद.

    इस हाल में कुल मिला कर खेल एक तरफ़ा लगने लगा और एम्पायर को राष्ट्रपति शासन नामक ट्रम्प कार्ड का इस्तेमाल राजनीतिक शतरंज की बिसात पर करने का मौक़ा मिल गया. संजय राउत ने महसूस किया कि बड़े बोल बोलने से तबियत खराब हो सकती है – उनकी भी और उन सबकी भी जिन्होंने उनको अपना मुखपत्र बनाया हुआ है. वही हुआ भी संजय राउत की तबियत खराब हो गई. इधर सरकार निर्माण का चेकअप राजयपाल कर रहे थे उधर डॉक्टर्स चेकअप संजय राउत की तबियत का कर रहे थे.

    दूसरे ‘खेल’नायक श्री उद्धव ठाकरे जी हैं. पिताश्री ने अपने जीवन की राजनीतिक पारी के दौरान एक बार साफ़ तौर पर कहा था जिसे आज उद्धव ठाकरे को अपना मार्गदर्शक मंत्र बना लेना चाहिए था. बाल ठाकरे ने कहा था कि अगर सीटों की संख्या बीजेपी की ज़्यादा है तो मुख्यमंत्री बीजेपी का ही बनना चाहिए. जिनकी सीट कम उन्हें पीछे और जिनकी ज्यादा उनको आगे चलना चाहिए. आज प्रदेश की महाराष्ट्रियन जनता उद्धव ठाकरे का मुँह देख रही है. क्या करना चाहिए था आपको और आपने क्या किया? पुत्र मोह में महाभारत हो गया था. सत्ता भी गई थी और सौ पुत्र भी. उद्धव को धृतराष्ट्र नहीं बनना चाहिए.

    तीसरे ‘खेल’नायक राजनीति के मैदान के महान घाघ खिलाड़ी हैं और सभी उनको शरद पवांर नाम से जानते हैं. उन्होंने अपने शातिर अनुभव की बानगी यहां भी दे डाली. पहले अंदर से सहयोग के गुपचुप वादे किये और जब शिवसेना की गाड़ी पटरी से उतर गई तो मुह पर कह दिया कि अपनी रोड खुद बनाके आगे जाओ – हम तो अभी बैठेंगे. पहले ऐसे मुँह खोला कि लगा हाँ बोलेंगे. फिर ऐसा मुँह बंद कर लिया कि न हाँ की आवाज आई न ना की – हम तो अभी देखेंगे.

    ये शायद कोई राजनैतिक प्रतिशोध था जो पवार ने उद्धव से ले लिया. या फिर बड़ी बारगेनिंग का बड़ा माहौल तैयार करने की शुरुआत. उद्धव यह क्यों भूल जाते हैं कि अकेले पवांर कुछ नहीं कर सकते, सोनिया की हां भी तो चाहिये. और फिर वैसे भी, शत्रुओं से गले मिल कर पांच साल सरकार चलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है.

    पवार अब पावर सिद्ध हों या न हों, संजय अब सिर्फ वक्ता-प्रवक्ता बन कर रह गए हैं, मार्गदर्शक नहीं. उद्धव ठाकरे श्रीकृष्ण सखा उद्धव की तरह राजनीति की गोप-गलियों में अवाक से खड़े हैं.. कहें क्या अब और सुनें क्या अब! कह कर भी क्या होगा और सुन कर भी क्या होगा! न चल पा रहे हैं न रुक पा रहे हैं..कहां गये सखा संजय राउत?

    ये रोड-जाम किसने किया है, अभी साफ़ नहीं है. पवार ने गाड़ी रोक कर अपना ड्राइवर चाय पीने भेज दिया है या सोनिया ने अपने ड्राइवर के बिज़ी होने की बात कह कर गाड़ी नहीं बढ़ाई – कुछ कहा नहीं जा सकता. कौन किस से बदला ले रहा है और कौन कितना पुराना हिसाब चुकता कर रहा है – ये भी अभी पता नहीं चल सका है. हाँ, एक बात तय है कि तीन तोपों का मुहाना है और एक ही निशाना है जिसने खामियाजा उठाना है औऱ वह है शिव सेना!

    मगर सबसे ज्यादा नुकसान में रही प्रदेश की जनता..जिसने अपनी आंखों के सामने मजबूर हो कर अपने जनादेश का व्यापार देखा और प्रजातंत्र का खुल्लेआम उड़ता हुआ उपहास भी देखा.

    महाराष्ट्र में ये सड़क दूर तक आगे जाती है. इसमें पांच साल के पांच चौराहे तो आयेंगे लेकिन अब शायद यू-टर्न नहीं है नहीं इस रोड पर.. क्योंकि बड़ी गाड़ी के ड्राइवर और कोई नहीं अमित शाह हैं.

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