मुझे उन्मुक्त हवा सी बहने दो !!

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    (महिला दिवस पर मेरी दो कवितायें)

    1. जननी

    मेरे वजूद की परछाईयां भी अब नाज़ुक नहीं हैं…..
    स्त्री थी मैं सदा रहूंगी इसमें कोई शक़ नहीं है…
    समाज ने सिर्फ़ जननी होने बड़ी पहचान दी
    हाँ ,जननी हूँ और रहूंगी इसमें कोई शक़ नहीं है।।

    सृजन की असीमित श्रृंखलाओं की नींव हूँ मैं..
    प्रेम की हवाओं में मदमस्त झूलती शाख हूँ मैं..
    शाख पर लगे पत्तों के मानिंद खड़कते हुए लोग
    ज़रा अदब से रहो क्योंकि सृष्टिगर्भ की आग हूँ मैं !

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    2- नदी (स्त्री) व्यथा

    उन्मुक्त हवा सी बहने दो
    मुझे गर्भ धरा के रहने दो
    अविरल सी बहती हुई
    मुझे अस्तित्व मेरे मिलने दो !!

    सबके हित राहें बदली थी
    खुशियों में सब के संग हो ली थी
    रूप बदल सबके सपनों सा
    अपनी गति मिटा ली थी !!

    सांस थमती हुई सी बहती,
    अब और नहीं चल सकती,
    मुझमें मेरी धार नहीं अब ,
    तुम संग और नहीं चल सकती !!

    उन्मुक्त हवा में रहने दो
    गर्भ धरा में अब सोने दो
    अविरल बहती थक गई मुझे
    अस्तित्व मेरे मिलने दो !!

    (शालिनी सिंह)

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