राजनीति कहती है कि साध्वी को चाहिये संयम

(सुभाष चन्द्र)

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या साध्वी प्रज्ञा सिंह की जय कर लो या मोदी की – जिस गोडसे की जय जयकार करते हो,
उस गोडसे के कारण देश में कांग्रेस राज कायम हो गया..

मैं इस विषय पर कुछ नहीं लिखना चाहता था जबकि ये विषय पहले भी उठता रहा है –आज भी बहुत से लोग साधवी प्रज्ञा सिंह के गोडसे को देशभक्त कहने पर संयम त्याग कर भावनाओं में बह कर उसकी जय-जयकार कर रहे हैं और गोडसे को महान देशभक्त कह रहे हैं –जो ऐसा कर रहे हैं, मुझे माफ़ करें, वो कोई नेक काम नहीं कर रहे –आज मजबूर हो कर इस पर लिख रहा हूँ.

साध्वी को पता है गाँधी जी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को कितने प्रिय हैं और गाँधी के नाम से ही उन्होंने अनेक योजनाएं शुरू की हैं — मोदी को गाँधी सही पसंद हैं या नहीं, ये बहस का विषय नहीं होना चाहिए मगर ये जाहिर है मोदी जी और भाजपा साध्वी के बयानों को पसंद नहीं कर सकते -ये उनकी अपनी विचारधारा हो सकती है- इसके लिए वे चाहें तो संसद और पार्टी को छोड़ सकती है.

साध्वी प्रज्ञा ने 9 वर्ष जेल में रह कर कांग्रेस की दी हुई अनेक यातनाएं झेली हैं जिसके लिए वो अभिनन्दन की पात्र हैं, उनकी बातें सुनकर पीड़ा होती है मगर दुर्भाग्य से कौन सी बात कहाँ कहनी हैं इसका उन्हें भान नहीं है –संसद में ए राजा के गोडसे का नाम लेने पर साध्वी को उत्तेजित होने की बजाय DMK पर ही वार करना चाहिए था जिसके उपर राजीव गाँधी की हत्या में शामिल होने के आरोप लगे थे.

हमारे मित्र बहुत तैश में लिख रहे हैं कि हम तो हज़ार बार कहेंगे गोडसे देश भक्त थे –कुछ लोग ये भी नारा लगाते हैं -रघुपति राघव राजा राम, देश बचा गए नाथूराम”.. मेरा विनम्र अनुरोध है ऐसी बातें करने से पहले पूरी तरह सोच विचार करना चाहिए.

नाथूराम गोडसे देशभक्त थे -इस तथ्य पर कुछ लोग विवाद कर सकते हैं लेकिन ये उनकी अपनी सोच है. आज एक मित्र ने लिखा कि वो एक पत्रकार थे और गाँधी द्वारा 55 करोड़ रुपया देने पर संयम नहीं रख पाए –एक और मित्र ने लिखा है कि जिस जज ने गोडसे का बयान सुना, उसके कहा था कि वो खुद गाँधी को गोली मार देते.

ठन्डे दिमाग से सोचिये गोडसे द्वारा संयम खो कर गाँधी की हत्या के क्या दुष्परिणाम हुए –गाँधी 55 करोड़ रुपया पाक को देने के बाद देश भर में अपनी विश्वसनीयता खो देते और कलंकित हो जाते -चुनाव 1952 यानि 4 बाद हुए और तब तक कांग्रेस और गाँधी भारत की राजनीती में अपना महत्त्व खो चुके होते क्यूंकि उस वक्त हिन्दू 95% से ज्यादा थे और संघ का प्रभाव बहुत ज्यादा बढ़ चुका था जो नेहरू के लिए चिंता का विषय था.

गोडसे द्वारा गाँधी की हत्या नेहरू और कांग्रेस के लिए वरदान बन गई –कलंकित गाँधी को होना था मगर गोडसे की हरकत से नेहरू ने कलंकित कर दिया संघ (RSS) को जो आज भी रक्षात्मक मुद्रा में रहता है –गाँधी हत्या का परिणाम था कि नेहरू और कांग्रेस ने देश में अपने पैर पूरी तरह जमा लिए.

गाँधी हत्या ना होती तो हिन्दू समाज का देश भर में दबदबा बढ़ चुका होता –पाकिस्तान को 55 करोड़ भी गया और आज कांग्रेस ने दूसरा पाकिस्तान बनाने की स्थिति भी पैदा कर दी. गाँधी जी में हो सकता है लाख बुराई थीं मगर हत्या से उन्हें अमर कर दिया –अगर हत्या न होती तो शायद ऐसा ना होता.

वस्तुतः कांग्रेस गाँधी हत्या की वजह से 55 साल तक राज कर सकी, जिसके लिए गोडसे काफी हद तक जिम्मेदार हैं, इस पर कोई अनर्गल टिपण्णी करने की बजाय सोचने की जरूरत है.

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