कश्मीर घाटी में वो स्वाधीनता दिवस

'लाइफ विद ए राइफल इन माई हैन्ड' से लिया गया एक अनुभव

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ढाई दशक से भी अधिक पुरानी बात है। आज की तरह वह पन्द्रह अगस्त का ही दिन था। मैं श्रीनगर (कश्मीर) स्थित बटमालू के “पुलिस कंट्रोल रूम” में तैनात था। काफ़ी हद तक कश्मीर घाटी तब आतंकियों व फिरकापरस्त जमातों के चंगुल में छटपटा रही थी।

लोकल मीडिया के नामचीन पत्रकार या तो अलगाववादियों के हाथों अपनी जमीर बेच चुके थे या फिर एक रहस्यमयी चुप्पी उन्होंने ओढ़ ली थी। भय का माहौल चहुँओर पसरा था।

अहले सुबह कश्मीर पुलिस के अनुरोध पर प्रतिदिन “सीआरपीएफ” की दर्ज़नों कंपनियां लॉ एंड आर्डर ड्यूटी हेतु पोलिस कंट्रोल रूम (पीसीआर) बटमालू (श्रीनगर) में रिपोर्ट किया करती थी।

दिन भर “सीआरपीएफ” कम्पनियों की श्रीनगर में जोखिम भरी तैनाती और जगह-जगह उनके साथ होती फायरिंग की वारदात के बाद , देर शाम उनकी पुरसूकून वापसी होने तक मन बेहद उद्दिग्न बना रहता था।

मामला केवल यही तक सीमित नही था। चन्द महीने क्या बीते होंगे, पुलिस कंट्रोल रूम (पीसीआर) द्वारा मुलाकातियों के लिये मुकर्रर वक़्त में, आतंकियों के हमदर्दों एवं जरखेज पत्रकारों से मेरी अनबन, अब नोक झोंक में तब्दील होने लगी थी।

क्या बिडम्बना थी उन दिनों कि, घाटी का कोई भी बाशिंदा स्वतः सीमा पार कर आतंकी तंज़ीम में शामिल होने चला जाये, तो भी उसकी गुमशुदगी का इल्ज़ाम फौजियों पर ही नाफिस होता था।

फौजियों द्वारा कश्मीरियों का इनकॉउंटर कर उन्हें पाकिस्तान को जाने वाली झेलम नदी में फेंक देने की वाहियात और मनगढंत बातें, घाटी के अधिकांश समाचार पत्रों की सुर्खियां होती थी।

निसंदेह ये फौजियो पर अनुचित दबाब बनाने और उनके मनोबल तोड़ने की पाकिस्तानी साजिश का हिस्सा था, पर प्रत्येक इलजाम की बारीकी से जाँच करने की विभागीय अपरिहार्यता, बेहद उबाऊ और निसंदेह थकाऊ थी।

इसे महज़ संयोग ही कहिये कि संबंधित एरिया के फौजी कमांडर से संपर्क कर, सिविलियन्स के छोटे-बड़े सभी इल्ज़ामों की सत्यता जानने और उन्हें अपने वरीय अधिकारियों के संज्ञान में लाने का गुरूतर भार “पुलिस कंट्रोल रूम” में तैनात रहते मेरे ही हिस्से आया।

श्रमसाध्य तो था यह काम, पर मुझे रुचिकर लगा। शुरूआत में परेशानी भी बहुत हुई, पर धीरे-धीरे मेरे परिचय का दायरा बढ़ा और कश्मीर घाटी के राजनीतिक घटनाक्रम पर मेरी पकड़ भी मजबूत हुई।

पर इन सबके बीच, अगस्त 15 को घटे एक वाकये का मलाल मेरे मन पर आज भी अमिट है। सुरक्षा बलों की कथित ज्यादतियों की नालिस करने मुलाकातियों के साथ अंग्रेज़ी का एक नामचीन पत्रकार भी मेरे पास आया करता था। घाटी में उस वक़्त उसके कलम की तूती बोलती थी।

पढ़ा लिखा मान, मैं औरों से अधिक उसकी इज़्ज़त किया करता था। पर धीरे-धीरे उसके आवाज़ में तल्खी, व्यंग और हिकारत का पुट शामिल होने लगा। वह बात-बात पर असभ्य तरीके से भड़काऊ आंगिक चेष्ठा कर, हवा में मुक्का भी लहराने लगता था।

उसकी अदा मुझे बेहद नागवार गुजरती थी। महीनों तक उसे तुनुक मिजाजी भर मान, उस व्यतिक्रम की मैंने अनदेखी की, पर महोदय थे कि अपनी आदत से बाज़ नही आ रहे थे। पुरे तौर पर आजिज आ चुका था मैं उसके असभ्य आचरणों से !

मेरा सहकर्मी जम्मू कश्मीर पुलिस का इंस्पेक्टर भी उस पत्रकार महोदय के व्यवहार से बुरी तरह व्यथित था, पर चौथे स्तम्भ की अलिखित चौधराहट से वह था किंकर्तव्यविमूढ़।

फिर आया अगस्त 15 का पावन दिवस, मुलाकाती कमरे में मैंने बड़े अदद से तिरंगे को सजाया और आने वाले हर मुलाकाती और मुलाजिम को ससम्मान बिठा उसे मिठाई पेश किया।

माहौल बहुत खुशगवार था, पर अचानक स्वनामधन्य पत्रकार महोदय कमरे में आ धमके। तहज़ीब वश मैंने उसे भी मिठाई पेश किया और प्रफुल्लित हो स्वतंत्रता दिवस की बातें सुनाई।

पता नही एकदम से उसे क्या हुआ, वह हत्थे से उखड़ गया और फिर मुल्क और तिरंगे को लेकर भद्दी-भद्दी गालियों का बोफ़ोर्स मुझ पर तान दिया। उसके अनापेक्षित व्यवहार से मै सन्न रह गया था।

पर अब और नही, यह बर्दाश्त की इंतेहा थी ! आगे क्या होना जाना था इसका अंदाज़ा आप स्वयं लगा सकते हैं। कुछ ही पलों में, राइफल के संघनित बट प्रहारों से पत्रकार बन्धु औंधे मुँह लम्बवत हो चुके थे और तदुपरांत पूरे ओह-आह के साथ उसके समस्त अंगों से राष्ट्र गान की स्वर लहरी फुट रही थी।

15 मिनट बाद एम्बुलेंस व कुछ लोगों की मदद से वे हस्पताल को रुखसत हुये। उस पर ज़्यादा हाथ साफ मेरे इंस्पेक्टर मित्र ने किया था। शायद बहुत पुरानी खुन्नस रही होगी उसकी, उससे !

एम्बुलेंस जाने के काफी देर बाद तक भी हंगामा बरपा रहा। शाम गहराई, तो इन्स्पेक्टर मित्र को कैरियर की चिंता सताने लगी। आशंकित हो उठा वह कि कहीं रसूख का इस्तेमाल कर वह पत्तलकार उसका कैरियर न चौपट करवा दे। बन्दा प्रोमोशन जोन में भी था।

उक्त घटना को लेकर एसपी “पीसीआर” मुझसे खासे नाराज थे। पता नही मेरे मुताल्लिक उन्होंने किस-किस से फोन पर बातें की, इसकी जानकारी महीनों बाद जाकर मुझे मिली ! पर मैने भी ठान लिया था, जो होगा देखा जायेगा।

जमीन-जायदाद के लिए तो मैंने किसी को कुछ कहा या किसी के साथ कुछ किया नही था ! मसला देश के स्वाभिमान और गौरव से जुड़ा था। मन में यह भाव और भी जोर पकड़ता गया कि आगे भी किसी ने ऐसी हिमाकत की तो उसका हश्र इससे भी बुरा करूँगा।

अगले दिन वह इंस्पेक्टर ड्यूटी पर नही आया। उन दिनों मोबाइल फोन नही हुआ करता था, इसलिये चाहकर भी उसकी कोई खोज-खबर नही मिली। तीसरे दिन वह नामुराद मुस्कुराता हुआ आ धमका।

“मैंने कहा डर गये थे क्या, कल की बातों से ?”

वह ठठाकर हंस पड़ा, बोला, “नही भाई, ऐसी बात नही है, चाय पिलाओगे तो एक मज़े की बात बताऊंग।” मैंने तुरंत हामी भर दी। उसने बोलना शुरू किया और मैं मन्त्रमुग्ध उसे देखता भर रहा।

वह पूरे विश्वास के साथ बोल रहा था, “कल सुबह मैं पत्रकार की पिटाई वाली घटना को लेकर आईजी सर (कश्मीर) के आवास पर गया था। बहुत पुरानी जान-पहिचान है मेरी उनसे। कुछ मिनट इधर-उधर की बातों के बाद आईजी सर बोले, कहो कैसे आना हुआ, इतनी सुबह-सुबह ?”

“मैंने सकुचाते हुये अपनी पूरी व्यथा-कथा उन्हें सुना डाली। वे हौले से मुस्कुराये और बोले, “मुझे तुम्हारी करतूतों का पता है, कहो अब मुझसे क्या चाहते हो?”

“मैंने कहा सर, अब जो कुछ करना है, आपको ही करना है, मैं तो शरणागत ठहरा ! वे ठठाकर हंसे पड़े और बाजू की मेज़ से एक नोट भरा लिफाफा उठा मुझे सौंपते हुये बोले, कल सुबह तक यह लिफाफा लिखे हुये पते पर पहुंचा देना, अब तुम जा सकते हो!”

मित्र ने बोलना जारी रखा था, “उस वक़्त मेरे पल्ले कुछ भी नही पड़ा था, पर क्षण मात्र की देरी किये बिना, मैं लिफाफे के पते पर फना हो गया।”

पर अचानक ही वह खामोश हो गया था, उसके चेहरे पर कई भाव आये और तिरोहित हो गये। क्षण भर चुप रहने के बाद उसने फिर से गम्भीर स्वर में बोलना शुरू किया, “जानते हो आईजी सर ने वह लिफाफा मेरे मार्फत किसे भेजा था ? मैंने कहा, अरे भाई मैं कैसे जान सकता हूँ?”

इंस्पेक्टर की आंखें झक सफेद पड़ गई , फिर वह हौले से बोला, “वह नोट भरा लिफाफा मैने उसी पत्तलकार को सौंपा है, जिसे हम दोनों ने मिलकर कुटा था।”

मैं हतप्रभ था, तपाक से पूछा, “पर ऐसा क्यों?”

वह बोला, “मुझे ज़्यादा नही मालूम।”

पर हाँ, आईजी सर ने एक निर्देश मुझे और दिया था, लिफाफा सौंपते समय उस पत्तलकार को कहने के लिए।

मैंने पूछा, “वह क्या?”

“दीस टाइम इट्स बिट लेट”

“उस पत्तलकार को बड़े अदब से यह बोलकर आया हूँ।”

मैंने अचरज से पूछा, तुम्हे देखकर उसने कैसे रियेक्ट किया, “अरे भाई रियेक्ट-विएक्ट की छोड़ो, नोट से भरा लिफाफ़ा थामें उसकी कलाई काँप रही थी, हलक तालू में चिपक गया था। नङ्गा हो चुका है। खैरात की कलम में इंकलाब पैदा करने की हैसियत नही होती। अब वह मेरे या तुम्हारे खिलाफ अब चूं तक नही करेगा। उसे उसी की नज़रो में गिरा आया हूँ।”

वह अपनी तरह का अकेला पत्तलकार नही था उस दौर में। एक लंबी फेहरिस्त है उन जैसों की और कई तो हमारे इर्द गिर्द भी मौजूद हैं, जो मोटी रकम ऐंठ कर लगातार देश और देश की अस्मिता के खिलाफ ही विष वमन करते रहते हैं।

केजीबी एजेंट “मित्रोखीन आर्काइव” को गूगल कर लीजिये या फिर टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रोजेक्ट “अमन की आशा” के दस्तावेजों को, मामला हर जगह एक जैसा ही मिलेगा।

स्मरण कीजिये कुछ वर्ष पूर्व, सेनाध्यक्ष और राज्यमंत्री श्री वी के सिंह ने सत्ता के गलियारों में यह कहकर सनसनी फैला दी थी कि कश्मीर के अधिकांश राजनेताओं को सेनाध्यक्ष रहते हुये उन्होंने पैसा खिलाया था।

राडिया टेप कांड से बरखा दत्त, राजदीप और शेखर गुप्ता जैसे दर्ज़नो नाम चर्चा में आये थे, आज शोभा डे और दूसरों का नाम उछल रहा हैं। इस धंधे का भी अपना मापदंड है और इकोसिस्टम भी।

आगे भी श्रीनगर डाउन टाउन की संकरी गलियों से गुजरते हुए, उस नामचीन पत्तलकार से कई बार मेरा आमना-सामना हुआ, पर हर बार वह कन्नी काट जाता था।

पर यकीन मानिये ढाई दशक बाद भी मैं इस सत्व को समझने में अधीर हो उठता हूँ कि “डंडा सबका पीर होता है या लिफाफे का मज़मून ही सफलता की गारण्टी है।” पर आश्वश्त भी हूँ कि तिरंगे में लगा डंडा ही देश को आगे भी अक्षुण बनाये रखेगा।

कुछ रिश्ते हैं, इसलिये चुप है
कुछ चुप हैं, इसलिये रिश्ते हैं

यौमे आज़ादी की अग्रिम बधाई व शुभकामनाएँ ।

(अधिकारियों के नाम, घटना की तिथि और कुछ स्थानों का उल्लेख जानबूझकर नही कर रहा, क्योंकि कुछ लोग इसमें भी धर्म को ले आएँगे)

(जीपी सिंह)

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