वर्जिनिटी : तुम्हारी नज़र और हमारी नज़र

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    कुंवारी लड़कियां सीलबन्द बोतल या सीलबन्द बिस्कुट पैकेट की तरह होती हैं तभी तो क्रिस्पी बिस्कुट सी तुम्हारी भूख का आहार बन जाती हैं और कोल्डड्रिंक सी तुम्हारी प्यास बुझाती हैं..

     प्यार,विश्वास की डोर पर सम्मान की उड़ान लिए पतंग सी उड़ने को बेताब लड़कियां तुम्हारे लिए जिंदा स्त्री नहीं सिर्फ माल हैं जो तुम्हारी भूख और प्यास मिटाने की वस्तु मात्र हैं।तभी तो सबकी नजरों से छुपकर क्रिस्पी बिस्कुट और कोल्डड्रिंक समझकर माल उड़ाते हो और मिटाते हो भूख अपनी ।वर्जिनिटी तलाशनी है तो तलाश करो खुद के भीतर कि मानवीय मूल्यों की वर्जिनिटी का कितना प्रतिशत है तुम्हारे भीतर । हवस की भूख और तुम्हारे ये नुकीले दांत तुम्हें ले जा रहे हैं आदमखोर होने की वर्जिनिटी की तरफ और शर्मसार हो रही है एक बार फिर वही वर्जिनिटी के द्वार से होकर गुजरती गली में रहने वाली कोख ……स्त्री कोख

    पढ़ने सुनने को मिला कि जाधवपुर यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर कनक सरकार ने कुंवारी लड़कियों की तुलना ‘सीलबंद बोतल’ या ‘पैकेट’ से की है। प्रोफेसर ने ‘कुंवारी दुल्हन-क्यों नहीं?’ शीर्षक के साथ फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी, जिसमें कहा था कि कुंवारी लड़कियां सीलबंद बोतल या सीलबंद पैकेट की तरह होती हैं।

    उन्होंने कहा, “क्या कोई भी बिस्कुट के ऐसे पैकेट या फिर कोल्ड ड्रिंक खरीदना पसंद करेगा जिसकी सील टूटी हुई हो। अधिकांश लड़कों के लिए वर्जिन पत्नी ‘परी’ की तरह होती हैं।”

    प्रोफेसर साहब का वर्जिनिटी को लेकर बिस्कुट पैकेट ,कोल्डड्रिंक की बोतल का उदाहरण बेहद शानदार है  इसमें कोई शक नहीं कि कोई भी महिला या पुरुष  जी हां शब्दों पर गौर करियेगा कि कोई भी महिला या पुरुष बिस्कुट का खुला पैकेट और सील टूटी कोल्डड्रिंक नहीं खरीदेगा । लेकिन क्या बिस्कुट के खत्म होने या कोल्डड्रिंक के खत्म होने के बाद पैकेट और बोतल की उपयोगिता रह जाती है ? वो सिर्फ कचरा होता है जिसे हम फेंक देते हैं इस उदाहरण के अनुसार प्रोफेसर साहब एक वर्जिन पत्नी की वर्जिनिटी के बाद  दूसरी वर्जिन पत्नी की व्यवस्था  में लग जाते होंगे  ठीक बिस्कुट और कोल्डड्रिंक की तरह ।    वस्तु और व्यक्ति ,सजीव और निर्जीव का अंतर  पढ़ा नहीं शायद  इसलिए पढ़ाने का तो सवाल ही नहीं उठता । ऐसे घटिया और हास्यास्पद उदाहरण देकर ये  प्रोफेसर शायद ये कहना चाहते हैं कि सीलबन्द का ही उपयोग  करें  ।जागो ग्राहक जागो का बोर्ड लगाकर उपभोक्ता फोरम या किसी परचून की दुकान में ज्ञान बांटे तो शायद काफी ग्राहकों के उनके केस का निपटारा हो जाये। 

       इस प्रोफेसर के जैसी मानसिकता लिए हर उस शख्स को बताना चाहूंगी हमारी सभी बेटियों , बहनों ,और स्त्रियों की तरफ से कि  …” हाँ हमारी वर्जिनिटी टूट चुकी है तुम्हारी नज़र में जो झिल्ली सीलबन्द या वर्जिनिटी का प्रमाण है वो टूट चुकी है  कभी पार्क में झूले पर झूलते वक़्त , कभी साइकिल चलाते वक्त ,कभी खेलते वक़्त, कभी सीढ़ियों से गिरकर और कभी न जाने कब । चहारदीवारी में कैद हम लड़कियां ,अब उड़ने लगी हैं हर दिशा में हमारी इस उड़ान में हमारा शरीर जाने कितने धक्के, चोटें और खरोंचे खाकर सहमी हुई सिसकती दीवारों के बाहर निकला है अपना आसमान नापने को और हमने जाने अनजाने न जाने कब तोड़ लीं अपनी सीलें और नहीं रह गए तुम्हारे मानकों के अनुसार वर्जिन । लेकिन क्या तुम पुरुष अपनी वर्जिनिटी का प्रमाण ये कहकर दे सकते हो कि झूले पर ,खेल में ,साइकिल पर टूट गई वर्जिनिटी की परिभाषा। कोई जवाब नहीं होगा इस बात का क्योंकि अच्छी तरह जानते हो कि कब और कैसे खोते हो अपनी वर्जिनिटी। 

    इस तरह के बेआधार बातों को यदि स्त्री वर्ग लेकर चलने लगा और बिस्कुट के खुले पैकेट और सीलखुली कोल्डड्रिंक की बोतल जैसे उदाहरण देने लगा तो और भी बहुत उदाहरण होंगे स्त्री समाज के पास । अभी भी वक़्त है कुत्सित मानसिकता से निकलने का वरना वो दिन दूर नहीं जब कूड़े के ढेर पर एक लड़का मिलेगा , विवाह के पश्चात दुर्घटना में हाथ पैर टूट गए तो बिस्कुट के खाली पैकेट की तरह कचरे से ज्यादा महत्व नहीं रह जायेगा। और जब नौकरी छूटने या रिटारमेंट के बाद कोल्डड्रिंक की खाली बोतल की तरह कबाड़ी के सुपुर्द कर दिए जाओगे।  अभी हमारी बेटियां कचरे को भी उपजाऊ बना देती है और कबाड़ को भी जुगाड़ से घर में सजा लेती हैं बड़े प्यार से, जतन से ,लगन से क्योंकि वो अभी भी विवाह से पहले एक लड़के के लिए उसकी वर्जिनिटी के बारे में नहीं सोचती। वो सोचती हैं उसकी पसन्द नापसन्द के बारे में वो सोचती हैं उसके साथ सात जन्म तक निभाने के बारे में ,वो सोचती हैं  उसके सुख दुख में साथ निभाने के बारे में और वो सोचती हैं अपने सुखद भावी परिवार के बारे में। और पुरूष हैं कि वो अपनी घटिया मानसिकता के कारण झिल्लीनुमा द्वार के इर्द गिर्द अपनी झूठी संदेहास्पद दुविधाओं के साथ ज़िंदगी के खूबसूरत क्षणों को तलाशते हैं तो सिर्फ खून के चंद धब्बों में ।

    ऐसी मानसिकता के लोगों के लिए ज़िन्दगी प्यार का गीत नहीं  हवस का खूनी खेल है  ।  कुंवारी लड़कियां सीलबन्द बोतल की तरह होती हैं और ऐसी लड़कियां सीलबन्द लड़कियां ही परी हो सकती हैं ,इसी मानसिकता के कारण ही अपनी हवस के नुकीले दांत लिए ऐसे लोग कभी कॉलेजों की कुँवारी लड़कियों का यौन शोषण , कभी स्कूली बच्चियों के साथ तो कभी दुधमुंही बच्चियों के कोमल शरीर को नोचते हैं और आनंदित होते हैं ख्वाबों की परी को नोच नोच कर। 

    शर्म आनी चाहिए ऐसी सोच लिए पढ़े लिखे प्रोफेसर जैसे लोगों को और उनकी सोच पर मौन समर्थन देने वाले लोगों पर  सोचने पर मजबूर हूँ कि शिक्षक भक्षक हैं , रक्षक भक्षक हैं  तो समाज को कैसे मानवीय मूल्यों का आंकलन सिखाया जाए। समस्या इसलिए भी अधिक है कि एक अच्छी कोशिश की ख़बर पर लोगों की प्रतिक्रिया जल्दी नहीं होती लेकिन एक ग़लत प्रयास आग की तरह फैलता है तो जाहिर है कि उसका असर भी ज्यादा दिखता है। एक अच्छा इंसान बनाने में वर्षों लगते हैं लेकिन एक बुरा व्यक्ति बनने में एक दिन की सीख काफी है। 

    शालिनी सिंह

    एंकर -ऑल इंडिया रेडियो व स्वतंत्र लेखिका

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