न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र की समीक्षा हो

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    कांग्रेस गरीब सवर्णों के खिलाफ दाँत दिखा रही है ..

    कांग्रेस और DMK दोनों ही काफी समय से गठबंधन के दल हैं और दोनों ने मोदी सरकार के पास किये हुए गरीब सवर्णों के लिए 10% आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी है –कांग्रेस ने 
    दिखावे के लिए संसद में बिल का समर्थन किया था लेकिन DMK ने विरोध किया था .

    राहुल गाँधी के जीजा जी के जीजा जी तहसीन पूनावाला ने आर्थिक आरक्षण को चुनौती दी है –इसके अलावा DMK, NGOs जनहित अभियान और Youth For Equality ने भी इसे चुनौती दी है जिनका कहना है कि केवल आर्थिक मानदंड आरक्षण का आधार नहीं हो सकता .

    दूसरी तरफ तहसीन पूनावाला ने कहा है कि ये आरक्षण संविधान के मूल संरचना में बदलाव करता है और इसलिए इसे रद्द कर देना चाहिए .

    अगर केवल आर्थिक मानदंड आरक्षण का आधार नहीं हो सकता तो फिर केवल जाति ही आरक्षण का आधार कैसे हो सकता है जबकि आरक्षित जातियों के लोग मायावती, पासवान और खड़गे जैसे लोग तो धनाढ्य बन चुके हैं –वो किसी तरह समाज में उपेक्षित नहीं है बल्कि वो तो अन्य लोगों की उपेक्षा करने में समर्थ हैं .

    मूलस्वरूप संविधान का 46वे संशोधन में बदला गया था जब भारत को इंदिरा गाँधी ने सेक्युलर राज्य बना दिया था जबकि संविधान में सेक्युलर शब्द था ही नहीं –धारा 370 और 35 ए संविधान की मूल संरचना से छेड़छाड़ थी क्यूंकि उनका जिक्र संविधान में नहीं था .

    संविधान में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के कर्तव्य और अधिकार बताये गए हैं –विधायिका का काम कानून बनाना है और अगर विधायिका के बनाये कानून ही सुप्रीम कोर्ट रद्द कर देगा तो विधायिका के काम में दखल होगा –जजों की नियुक्ति के लिए सर्वसम्मति से संसद ने NJAC कानून बनाया था जिसे सर्वोच्च अदालत ने संविधान की मूल संरचना में बदलाव कह कर रद्द कर दिया .

    NJAC ने कॉलेजियम सिस्टम को ख़त्म करने के लिए बनाया गया था और कॉलेजियम सिस्टम संविधान की मूल संरचना में नहीं था, इसे सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही लागू किया था जिसमे जजों की नियुक्ति में भाई भतीजावाद को प्रोत्साहन मिलता है –किसी देश में न्यायपालिका जजों की नियुक्ति खुद नहीं करती, बस ये भारत में ही होता है .

    इसलिए न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र की समीक्षा होनी चाहिए –सरकार के बनाये गए कानूनों को रद्द करने का मतलब साफ़ है कि न्यायपालिका विधायिका के काम में दखल दे रहा है –ये टकराव 
    लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है –आखिर विधायिका भी कानून संविधान के दायरे में ही बना सकती है, संविधान के विरुद्ध नहीं .

    आर्थिक आधार पर आरक्षण भी सरकार ने संविधान के अनुसार ही लागू किया है लेकिन कांग्रेस और उसके साथी इसे रद्द कराने को आमादा हैं –सोशल मीडिया पर इनके इस दुस्साहस की खुल कर निंदा होनी चाहिए –उच्चतम न्यायालय इन याचिकाओं को संविधान पीठ को सौंपने पर विचार करेगा .

    (सुभाष चन्द्र) 

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