हिन्दू-मुस्लिम एकता का परिचायक अमर क्रांतिकारी : अशफाकुल्ला खां

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    आज है अक्टूबर माह की 25 तारिख. आज से तीन दिन पहले जन्मदिवस था अशफाक उल्ला खां का. 22 अक्टूबर 1900 में शाहजहांपुर में जन्म लिया था इस अमर क्रांतिकारी ने. शाहजहांपुर, शायरी और शफीकउल्ला खान जो कि आपके पिता थे, तीनों को आदर से देखा जाने लगा अशफाकुल्ला खां ‘वारसी’ की वजह से.

    वारसी आपका उपनाम था और शायरी आपका काम था जब तक स्वतंत्रता संग्राम में आप कूद नहीं पड़े. अशफाकुल्ला खां के बड़े भाई रियासतुल्ला खां अमर क्रांतिकारी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के मित्र थे. अशफाकुल्ला खां ने अपने बड़े भाई से बिस्मिल के बारे में खूब सुन रक्खा था और वे उनके बहुत बड़े प्रशंसक थे. कहते हैं कि यदि कोई किसी से सच्चे दिल से मिलना चाहे तो ऊपरवाला ज़रूर मिलाता है उससे.

    हालांकि मणिपुर की घटना के बाद से बिस्मिल को ब्रिटिश सरकार ने भगौड़ा करार दिया था इसलिए वे अंडरग्रॉउंड ही रहते थे. किन्तु अशफाकुल्ला खां के भाई से उनका मिलनाजुलना होता रहता था. बचपन से ही भाई की देखादेखी अशफाकुल्ला खां के मन में भी देशप्रेम की लहरें उठने लगीं थीं और उन्होंने भी क्रांतिकारियों के दल में शामिल होने की हसरत पाल ली. हसरत शायरी की दुनिया का उनका उपनाम भी था और मज़े की बात पंडित रामप्रसाद बिस्मिल भी शायरी करते थे. इस वजह से भी अशफाकुल्ला खां उनके बड़े मुरीद थे.

    फिर मिलवा ही दिया ऊपरवाले ने दोनों दोस्तों को. 1920 में पंडित बिस्मिल शाहजहांपुर आये और यहीं प्रथम परिचय हुआ दोनों मित्रों का. किन्तु व्यस्ततावश पंडित जी अशफाकुल्ला खां को अधिक समय नहीं दे सके. फिर आया वर्ष 1922 और तब असहयोग आंदोलन के समय जनता के बीच राष्ट्रप्रेम का जागरण फैलाने के लिए बिस्मिल फिर शाहजहांपुर आये. और इस बार अशफाकुल्ला खां ने उनसे अपने मन की बात कह दी. पंडित बिस्मिल ने अपने दल के अन्यलोगों से विमर्श करके अशफाकुल्ला को अपने साथ शामिल कर लिया.

    जहां पंडित बिस्मिल आर्यसमाजी थे और सभी जाति-धर्मों को समान सम्मान देते थे वहीं अशफाक भी सर्वधर्म समभाव की विचारधारा के व्यक्ति थे. हिन्दू मुस्लिम या मंदिर मस्जिद के बीच उनके दिल में कोई भेदभाव नहीं था. एक बार की बात है शाहजहांपुर में हिन्दू मुसलमान किसी बात पर झगड़ पड़े. उस समय अशफाकुल्ला खां पंडित बिस्मिल के साथ आर्यसमाज मंदिर में बैठे हुए थे. मुसलामानों ने मंदिर पर हमला करने की योजना बनाई किन्तु जब वे वहां पहुंचे तो पिस्तौल निकाल कर अशफाकुल्ला खां ने उनको ललकारा. अशफाक ने कहा कि ”’मैं भी कट्टर मुस्लमान हूँ लेकिन इस मन्दिर की एक एक ईट मुझे प्राणों से प्यारी हैं. मेरे लिये मंदिर और मस्जिद की प्रतिष्ठा बराबर है. अगर किसी ने भी इस मंदिर की नजर उठाई तो मेरी गोली का निशाना बनेगा. अगर तुम्हें लड़ना है तो बाहर सड़क पर जाकर खूब लड़ो.’ और उसके बाद किसी की हिम्मत न हुई कि मंदिर पर हमला कर सके.

    शायरी की तरह आज़ादी के शेर दिल दीवाने अशफाकुल्ला खां को काकोरी काण्ड के बाद सारे देश में जाना जाने लगा. भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इस प्रमुख क्रान्तिकारी ने काकोरी काण्ड में एक अहम् भूमिका निभायी थी. डकैती के समय जब खजाने की मजबूत लोहे वाली पेटियां और उन पर लगे ताले टूट नहीं पा रहे थे. तो ये काम अशफाकुल्ला को सौंपा गया और देखते ही देखते लोहे ने ताले भी तोड़ दिए और संदूक भी. ब्रिटिश सरकार ने जब 19 दिसम्बर सन् 1927 को उन्हें गिरफ्तार किया तो राजद्रोह का मुकदमा चला कर उन्हें मृत्यु दंड दिया गया. और भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव की तरह भी भारतीय स्वंत्रता के इस अमर सेनानी ने घंटे हुए चूमा था फांसी के फंदे को और फिर वो आखिरी नारा था जिसके साथ उन्होंने फंदा अपने गले में डाला – वन्दे मातरम !!

    इसी के साथ फैज़ाबाद का वह जेल भी अमर हो गया जहां फांसी हुई अशफाकुल्ला को.

    जिनको नहीं पता उनके लिये काकोरी कांड का संक्षिप्त परिचय देना आवश्यक है. क्रांतिकार्यों को आगे बढ़ाने हेतु धन की आवश्यकता थी, अतः राम प्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार के धन को लूटने का निश्चय किया. उन्होंने सहारनपुर-लखनऊ 8 डाउन पैसेंजर ट्रेन में जाने वाले धन को लूटने की योजना बनाई. 9 अगस्त, 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफ़ाक उल्ला खां समेत आठ अन्य क्रांतिकारियों ने इस ट्रेन को लूटा. ब्रिटिश सरकार क्रांतिकारियों के इस बहादुरी भरे कदम से भौंचक्की रह गई थी. इसलिए इस बात को बहुत ही सीरियसली लेते हुए सरकार ने कुख्यात स्कॉटलैंड यार्ड को इसकी तफ्तीश में लगा दिया. एक महीने तक CID ने भी पूरी मेहनत से एक-एक सुबूत जुटाए और बहुत सारे क्रांतिकारियों को एक ही रात में गिरफ्तार करने में कामयाब रही. 26 सितंबर 1925 को पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को भी गिरफ्तार कर लिया गया. और सारे लोग भी शाहजहांपुर में ही पकड़े गए. पर अशफाक बनारस भाग निकले. जहां से वो बिहार चले गए. वहां वो एक इंजीनियरिंग कंपनी में दस महीनों तक काम करते रहे. वो गदर क्रांति के लाला हरदयाल से मिलने विदेश भी जाना चाहते थे.

    अपने क्रांतिकारी संघर्ष के लिए अशफाक उनकी मदद चाहते थे. इसके लिए वो दिल्ली गए जहां से उनका विदेश जाने का प्लान था. पर उनके एक अफगान दोस्त ने, जिस पर अशफाक को बहुत भरोसा था, उन्हें धोखा दे दिया. और अशफाक को गिरफ्तार कर लिया गया.

    (पारिजात त्रिपाठी)

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