बीजेपी के बागी नेता शत्रुघ्न सिन्हा ने बीजेपी छोड़ कर कांग्रेस का हाथ थाम लिया. लोकसभा चुनाव से पहले बदलती राजनीतिक करवटों के दौर में शत्रुघ्न के बीजेपी छोड़ने के फैसले को सिर्फ बगावत की नजर से नहीं देखा जा सकता है. शत्रुघन सिन्हा ने कांग्रेस में शामिल होते हुए कहा कि उन्होंने भारी मन से बीजेपी छोड़ी है. शत्रुघ्न सिन्हा ने  कहा कि बीजेपी अब ‘वन मैन शो, टू-मैन आर्मी’ बनकर रह गई है. उन्होंने कहा कि पार्टी में उनकी बात नहीं सुनी गई. यहां तक कि पार्टी में आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अरुण शौरी जैसे वरिष्ठ नेताओं को भी दरकिनार कर दिया गया. मार्गदर्शक मंडल बनाया गया, जिसकी कोई बैठक तक नहीं हुई.

कांग्रेस का हाथ थामते ही शत्रुघ्न ने मोदी सरकार के फैसलों पर सवाल उठाने की जिम्मेदारी भी उठा ली. उन्होंने नोटबंदी को सबसे बड़ा घोटाला बताया और कहा कि इतना बड़ा फैसला लेने से पहले किसी से सलाह-मशविरा नहीं लिया गया. शत्रुघ्न सिन्हा ने ये भी आरोप लगाया कि विरोधियों को दुश्मन समझा गया और मनमोहन सिंह जैसे वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों की बात को भी तवज्जो नहीं दी गई.

शत्रुघ्न सिन्हा ने एक बार फिर कहा कि अगर सच कहना बगावत है तो मैं बागी हूं. बीजेपी से बगावत कर बाहर आने के बाद अब शत्रुघ्न सिन्हा पटना साहिब सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे. उनके सामने बीजेपी के उम्मीदवार रविशंकर प्रसाद होंगे. कायस्थ बहुल सीट पर शत्रुघ्न सिन्हा आखिर किस तरह का जातीय और सियासी गणित बिठा पाएंगे ये देखने वाली बात होगी. फिलहाल, शत्रुघ्न सिन्हा के रूप में कांग्रेस को वो हथियार मिल गया है जो पहले बीजेपी में रहते हुए मोदी सरकार पर मिस फायर होता रहा तो अब कांग्रेस के किले से बीजेपी पर सटीक हमले की कोशिश करेगा.

आज शत्रुघ्न सिन्हा को कांग्रेस  अध्यक्ष राहुल गांधी में देश का भविष्य दिखाई दे रहा है. चारा घोटाले में जेल में बंद आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की तारीफ में वो कसीदे गढ़ रहे हैं. मोदी विरोध की विपक्षी रैलियों में वो स्टार वक्ता की भूमिका निभा रहे हैं. राजनीति के जानकार इसे शत्रुघ्न सिन्हा की राजनीति में ग्रहदोष मान सकते हैं लेकिन एक बात तय है कि बीजेपी में रह कर जिस तरह से उन्होंने मोदी विरोध का झंडा उठाया उससे उनका राजनीतिक कद छोटा नहीं हुआ है. उन्होंने ये बता दिया कि भले ही उनका बैकग्राउन्ड बॉलीवुड का क्यों न रहा हो लेकिन इन दो दशकों में वो भी राजनीति के माहिर खिलाड़ी बन गए जो अपनी शर्तों पर राजनीति करने की हैसियत हासिल कर सका और उसे कोई दबाव खामोश नहीं कर सका.

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