भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है कि लोकतंत्र के मंदिर में बैठे 30 फीसदी सांसद दागी हैं. ये हम नहीं कह रहे हैं ये कहती है उत्तर प्रदेश इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानि की एडीआर की रिपोर्ट. ये वो संस्था हैं जो देश के चुनावों और उससे संबंधित आंकड़े जुटाती है. इनकी इस रिपोर्ट के जरिए जाहिर होता है कि राजनीति और अपराध सिक्के के दो पहलू हैं. देखा जाए तो देश में ऐसा कोई राजनीतिक दल नहीं है जिसकी छवि अपराध मुक्त वाली पार्टी की है या जिसके नेता साफ सुथरी छवि वाले हों या उन पर किसी भी तरह का कोई भी आपराधिक मामला दर्ज न हो. हर पार्टी में इस तरह के दागी नेता खासी तादाद में हैं.

राजनीति में आपराधिक छवि वाले नेताओं की बढ़ती संख्या को देख कर 25 सितंबर साल 2018 को सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि संसद ऐसा कानून लाए जिसके जरिए इस तरह की छवि वाले लोग संसद से दूर रहें. देश को ऐसे ही कानून का इंतजार है और ऐसा कानून आने के बाद ही राष्ट्र का निर्माण सही हाथों में होगा.

एडीआर और उत्तर प्रदेश इलेक्शन वॉच के रिपोर्ट के मुताबिक संसद के दोनों सदन के राज्यसभा और लोकसभा के 30 फीसदी सांसद दागी हैं. इनमें 17 फीसदी सांसदों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज़ हैं. इस रिपोर्ट में सभी दलों के दागी नेताओं के क्रिमिनल रिकॉर्ड का पूरा ब्योरा दिया गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि लोकसभा के 542 सांसदों में 179 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं जो कुल संख्या का 33 फीसदी है वहीं 114 के सांसदों के खिलाफ संगीन आपराधिक मामले दर्ज हैं.

राज्यसभा का हाल भी कुछ ऐसा ही है. राज्यसभा के 228 सासंदों में से 51 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं. वहीं 20 सासंदों के खिलाफ संगीन आपराधिक मामले दर्ज हैं. देखा जाए तो दोनों सदन के 770 सासंदों में से 230 दागी हैं, जो पूरी संख्या का 30 फीसदी है. दागी छवि वाले नेताओं के मामले में बीजेपी सबसे ऊपर है. रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में बीजेपी कांग्रेस से बहुत आगे है. बीजेपी में आपराधिक छवि वाले नेता कांग्रेस से दोगुने हैं. जहां कांग्रेस में ऐसे नेता 15 फीसदी हैं वहीं बीजेपी में 32 फीसदी सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं. देखा जाए तो बीजेपी के 281 सांसदों में से 98 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं. इनमें से 63 सांसद ऐसे हैं जिनपर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं जिनमें उन्हें फांसी या उम्रकैद की सजा तक मिल सकती है. वहीं कांग्रेस के 44 सांसदों में से 8 सांसद ऐसे हैं जिनके ऊपर आपराधिक मामले दर्ज़ हैं. इनमें से 3 सांसदों के ऊपर जो अपराध दर्ज हैं वो गंभीर श्रेणी में आते हैं. वहीं दक्षिण भारत के तमिलनाडु की एआईडीएमके पार्टी की बात करें तो इस पार्टी के 37 सांसदों में से 7 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं जिनमें से 3 सांसद के खिलाफ संगीन मुकद्दमें अदालत में लंबित हैं. वहीं शिवसेना की बात की जाए तो शिवसेना में आपराधिक छवि वाले नेताओं के आंकड़े जानकर हैरानी होगी. शिवसेना में 83 फीसदी सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं. सिर्फ 17 प्रतिशत सांसद ही ऐसे हैं जिनपर किसी तरह के आपराधिक मामले दर्ज़ नहीं हैं. शिवसेना के 18 में से सांसदों में 15 के ऊपर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से 10 फीसदी ऐसे सांसद हैं जिन पर हत्या और बलात्कार जैसे संगीन मामले दर्ज हैं.

ममता बनर्जी की ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस में 34 सांसदों में से 7 सांसदों पर भी आपराधिक मामले दर्ज हैं. इन 7 सांसदों में से 4 सांसदों पर संगीन मुकद्दमें दर्ज हैं जिनकी सुनवाई कोर्ट में चल रही है. वहीं लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल के चारों सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं. इसमें हैरानी की एक बात और है कि इन चारों सांसदों पर गंभीर अपराध के आरोप हैं.

राजनीति अब धनबल से होती है ये एडीआर के इस रिपोर्ट से साबित होती है. रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि 542 सांसदों में 185 सांसद ऐसे हैं जो किसी न किसी अपराध में लिप्त हैं. इन 185 सांसदों में से 112 सांसद ऐसे हैं जो किसी न किसी गंभीर अपराधों से जुड़े हैं. देश के 185 संसदीय क्षेत्र का दुर्भाग्य है कि इनका नेतृत्व वो लोग कर रहे हैं जो खुद दागदार हैं. न्यायपालिका की मजबूरी ये है जब तक आरोप सिद्ध न हो जाए वो किसी को भी चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित नहीं कर सकती है.

देश की अदालतों में राजनेताओं के 4122 आपराधिक मामले लंबित है जिनमें 1991 केसों में अभी तक आरोप तय नहीं हो पाए हैं, वहीं 180 विधायकों के खिलाफ 430 मामले ऐसे हैं जिनमें उन्हें मौत की सजा या फिर आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा चुकी है. उत्तर प्रदेश इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले तीन लोकसभा और तीन विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने सबसे अधिक अपराधिक मामलों में फंसे उम्मीदवारों को टिकट दिए. साल 2004, 2009 और 2014 के संसदीय चुनाव और साल 2007, 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के 40 फीसदी प्रत्याशियों पर आपराधिक मामले दर्ज थे. उसके बाद बीएसपी दूसरे, बीजेपी तीसरे, कांग्रेस चौथे और रालोद पांचवे नंबर पर रही. ये लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ा मजाक है कि साथ सुथरे और बेदाग उम्मीदवारों की वकालत करने वाली सभी पार्टियां चुनाव के वक्त दागियों को हाथों हाथ लेती हैं. जब तक इन दागी नेताओं के केस कोर्ट में चलते रहेंगे ये जम्हूरियत की अगुवाई करते रहेंगे. लेकिन ये भी है कि आनेवाले वक्त में दागदार लोगों को राजनीति में आने से रोकने के लिए अगर कोई कानून बनता है तो तय है कि राष्ट्र का निर्माण सही तरीके से हो पाएगा. हालांकि ये अभी मुश्किल लगता है क्योंकि हो सकता है कि लोकतंत्र के मंदिर में बैठे 30 फीसदी दागदार सांसद ही इस कानून को पास नहीं होने दे. इसके लिए जरूरत है कि आवाम उन्हीं को चुने जो दागदार न हों जो सही मायने में जनता के आदर्श हों.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here