मैनपुरी में फिर दिखेगा मुलायम का मैजिक? पहली दफे मायावती मांगेंगी नेताजी के लिए वोट

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    यूपी की सियासी दंगल में एक बार फिर ताल ठोंकने के लिए समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह ने मैनपुरी का अखाड़ा चुना है. एक बार फिर मुलायम सिंह यादव अपनी किस्मत और ताकत को इस पारंपरिक सीट पर आजमाएंगे. लेकिन इस बार यहां सबसे खास बात ये है कि मुलायम के समर्थन में बीएसपी सुप्रीमो मायावती वोट मांगेंगीं.

    साल 1995 में लखनऊ में हुए गेस्ट हाउस कांड की कड़वी यादों से बाहर निकलकर मायावती ने अदावत के 24 साल के सिलसिले को सिर्फ इस वजह से तोड़ दिया कि उन्हें केंद्र से मोदी सरकार को हटाना है. यूपी में बुआ-भतीजे की पार्टियों के ऐतिहासिक गठबंधन की वजह से तकरीबन 26 साल बाद पहली बार एक ही मंच पर मुलायम सिंह और मायावती नजर आएंगे. सूत्रों के मुताबिक एसपी,बीएसपी और आरएलडी का गठबंधन 12 रैलियां करेगा जिसमें मैनपुरी का इलाका भी शामिल है.

    साल 2019 का लोकसभा चुनाव वैसे भी आजादी के बाद का अबतक का सबसे बड़ा चुनाव माना जा रहा है. इस चुनाव में न सिर्फ राजनीतिक परिवारों बल्कि राजनीतिक दलों की भी साख और वजूद दांव पर है. ऐसे में तमाम पार्टियां आपसी मतभेद भुलाकर मोदी विरोध की गंगा बहाने में जुटे हुए हैं.

    यूपी के सियासी मिज़ाज को देखते हुए एक मंच पर मुलायम और मायावती की तस्वीर बेहद अलग होगी. लेकिन मुलायम का यूपी की राजनीति में कद इतना बड़ा है कि उन्हें किसी बाहरी या विरोधी दल के समर्थन की जरूरत नहीं है. ये विडंबना है कि मुलायम कभी बीएसपी के संस्थापक कांशीराम के साथ मंच साझा करते थे तो अब उनके गढ़ में मायावती रैली करेंगी.

    मुलायम सिंह के राजनीतिक अतीत में 52 साल का अनुभव सीना तान कर खड़ा है. इस अनुभव ने उन्हें यूपी का 3 बार सीएम तो देश का रक्षा मंत्री तक बनाया है. मुलायम सिंह यादव ने राजनीति का ककहरा राममनोहर लोहिया, जनेश्वर मिश्र जैसे समाजवादियों से सीखा है. सोशलिस्ट पार्टी से राजनीति की शुरुआत करते हुए पहली दफे 1967 में विधायक का चुनाव जीता था. 4 अक्टूबर 1992 को मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी की बुनियाद रखी थी जो अब देश की राजनीति में किसी इमारत सी खड़ी दिखाई देती है. यूपी की जमीन पर खड़ी हुई समाजवादी पार्टी केंद्र की राजनीति में सरकार बनाने और बचाने का माद्दा रखती है. यही वजह है कि मुलायम सिंह यादव अपने चरखा दांव की वजह से निर्णायक मौकों पर आखिरी पलों तक अबूझ माने जाते रहे हैं और लोग ये अंदाजा कभी नहीं लगा सके कि मुलायम के दाएं हाथ को भी ये खबर क्यों नहीं होती कि उनके मन में क्या चल रहा है.

    किसान परिवार में जन्में मुलायम सिंह यादव राजनीतिक विज्ञान में एमए रहे हैं. हालांकि उनकी रग़ों में पहलवानी का जुनून दौड़ता था लेकिन वो राजनीति में शामिल हो गए. शुरुआती दिनों में उन्हें कर्पूरी ठाकुर, राज नारायण और जनेश्वर मिश्र जैसे दिग्गज नेताओं का मार्गदर्शन मिला. युवा नेता के तौर पर मुलायम सिंह ने छात्रों, अल्पसंख्यकों, मजदूरों और किसानों के अधिकारों की आवाज उठाई.

    मुलायम सिंह आपातकाल के वक्त 19 महीने जेल में रहे. आपातकाल की ‘जेल यात्रा’ ने दूसरे तमाम नेताओं की तरह ही मुलायम सिंह की राजनीति का भी भविष्य तय किया. आपातकाल के बाद मुलायम सिंह यूपी सरकार में मंत्री भी बने. मुलायम सिंह 8 बार विधायक का चुनाव जीते. लेकिन 1989 में वो पहली बार यूपी के मुख्यमंत्री बने. 1993 में बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन कर उन्होंने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई और दोबारा मुख्यमंत्री बने. जिस वक्त पूरे यूपी में राम लहर का दौर था उस वक्त मुलायम और कांशीराम ने दलित-मुस्लिम समीकरण को साध कर बीजेपी को सत्ता में आने से रोक दिया था.

    अब इसी फॉर्मूले पर दोबारा मायावती की बीएसपी और अखिलेश की समाजवादी पार्टी नया इतिहास रचने की कोशिश में हैं क्योंकि नूरपुर, कैराना, फूलपुर और गोरखपुर के उपचुनावों में मिली जीत ने इस गठबंधन के लिए संजीवनी का काम किया है. यही वजह है कि मायावती अब यादवों के गढ़ में रैली कर समाजवादी पार्टी के लिए वोट मांगेंगीं.

    बहरहाल, विपक्ष के पीएम चेहरों की रेस में मायावती भी शामिल हैं. खासबात ये है कि मुलायम सिंह भी इस दौड़ में शामिल हैं तभी वो उम्र के इस पड़ाव में अपनी ही पार्टी में मार्गदर्शक बनाए जाने के बावजूद मैनपुरी से चुनाव लड़ने के लिए कमर कस चुके हैं. साल 1996 में मुलायम ने पहली बार मैनपुरी सीट से लोकसभा चुनाव जीता था और तब से अबतक वो 6 बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं. अब 23 साल बाद वक्त ये तय करेगा कि मैनपुरी में मुलायम का मैजिक बरकरार है या नहीं.

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