बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने भविष्यवाणी की है. उन्हें लगता है कि बनारस में बड़ा उलटफेर हो सकता है. मायावती को क्यों लगता है कि पीएम मोदी बनारस में चुनाव हार सकते हैं. क्या मोदी बनारस में कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय और महागठबंधन की प्रत्याशी शालिनी यादव से चुनाव हार सकते हैं?

मायावती ने इस भविष्यवाणी के पीछे साल 1977 का हवाला दिया है. उन्होंने कहा है कि जिस तरह रायबरेली में राजनारायण ने इंदिरा गांधी को हरा दिया था उसी तरह बनारस में भी कुछ भी हो सकता है.

यहां मायावती की अतिमहात्वाकांक्षा हिलोरे नहीं मार रही है. दरअसल, मायावती को ये लग रहा है कि यूपी में महागठबंधन के बूते केंद्र में गैर बीजेपी सरकार का बनना तय है और यही वजह है कि उन्होंने हाल ही में ये भी कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो अंबेडकर नगर से चुनाव लड़ सकती हैं. अब नया ट्वीट देखकर ये लग रहा है कि जैसे ये उनकी हार्दिक इच्छा हो कि इन सबके बीच अगर मोदी बनारस से चुनाव हार जाएं तो फिर सोने पर सुहागा हो जाएगा. लेकिन मायावती ये भूल रही हैं कि जागती आंखों से मुंगेरी लाल की तरह सपने देखने से सबकुछ सच नहीं होता. क्या वो अखिलेश यादव के बयान में अपनी महत्वाकांक्षा टटोल रही हैं जिसमें अखिलेश बार-बार ये कह रहे हैं कि देश को अगला नया प्रधानमंत्री मिलने वाला है?

मायावती ने ट्वीट किया कि रायबरेली की तरह बनारस में बात बिगड़ सकती है. साल 1977 के लोकसभा चुनाव के वक्त देश इमरजेंसी की वजह से सत्ताविरोधी लहर से गुज़र रहा था. मायावती ने मोदी  की तुलना इमरजेंसी काल से क्यों की? पीएम मोदी ने कौन सी इमरजेंसी लगाई ?  विपक्ष के किन नेताओं को जेल के भीतर भेजा है? क्या छापने और क्या दिखाने पर मीडिया में कोई पाबंदी लगी है?

क्या 1975 में इंदिरा गांधी सरकार के वक्त लगी इमरजेंसी में किसी विरोधी नेता की हैसियत थी कि वो ये नारा लगा दे – चौकीदार चोर है? क्या किसी नेता में ऐसी हिम्मत थी कि वो सुप्रीम कोर्ट में चौकीदार के नारे पर माफी मांग कर चुनावी रैलियों में दोबारा चोर है के नारे लगा दे ?

मोदी से डर या मोदी का विरोध सिर्फ चंद सियासी परिवारों और नेताओं को है जो कि समूचे देश को मोदी के नाम पर गुमराह करने पर जुटे हुए हैं. सिर्फ मुट्ठी भर परिवार ही आजादी के बाद  से अबतक देश चलाते रहे हैं और अवाम को हांकते रहे हैं. ऐसे में जब उनकी भ्रष्टाचार करने की आजादी खतरे में पड़ी तो उन्हें देश में असहिष्णुता की कमी दिखाई देने लगी और मोदी की कार्रवाई में बदला दिखाई देने लगा. मोदी ने विरोधियों को भ्रष्टाचार के नाम पर जेल में डालने की जल्दबाजी नहीं दिखाई जैसा कि इमरजेंसी के वक्त पूरे देश ने देखा था.

कांग्रेस का इतिहास यू-टर्न और सत्ता गिराने की घटनाओं से भरा हुआ है. पूर्व पीएम चंद्रशेखर, एच डी देवगौड़ा से लेकर इंद्र कुमार गुजराल तक की सरकार को केंद्र में गिराने का कारनामा कांग्रेस कर चुकी है. खुद समाजवादी पार्टी भी कांग्रेस की ‘हाथ’ की सफाई देख चुकी है. समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह ने तो ये तक कहा था कि उन्हें कांग्रेस से डर लगता है क्योंकि वो पीछे सीबीआई लगा देती है.

कांग्रेस का हालिया यू-टर्न देखें. एक दिन पहले कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद कहते हैं कि अगर उनकी पार्टी को प्रधानमंत्री पद नहीं दिया जाता है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी. आजाद के इस बयान से ये सियासत गरमा जाती है कि कांग्रेस किसी दूसरे दल के नेता को पीएम बनाने को तैयार है. लेकिन ठीक एक ही दिन बाद गुलाम नबी आजाद बयान से पलट गए. उन्होंने कहा कि कांग्रेस सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी है और बड़ी पार्टी को ही पीएम पद मिलना चाहिए.

राजनीतिक जानकार कभी ममता बनर्जी तो कभी मायावती के नाम पर कयास लगाने लगते हैं. वो ये जानते हैं कि बहुमत न मिलने की सूरत में बीजेपी किसी तीसरे दल या फ्रंट को बड़े मंत्रालय के बदले समर्थन लेने की बजाए विपक्ष में बैठना पसंद करेगी. ऐसे में दौड़ में ममता, मायावती और शरद पवार ही आगे नजर आते हैं . तभी मायावती यूपी की सीटों की बदौलत ये उम्मीद करने लगी हैं कि अब पीएम की कुर्सी दूर नहीं है. लेकिन वो ये भूल रही हैं कि यूपी में वैसे भी कांग्रेस की भूमिका महागठबंधन के खिलाफ वोटकटवा के रूप में ज्यादा सामने आई है.

मोदी विरोध में विपक्षी एकता की तुरही बजाने वाला महागठबंधन और कांग्रेस जब चुनाव से पहले ही पीएम पद पर बंटे हुए हैं तो चुनाव बाद इनको संगठित करने की सोनिया गांधी की अभी से कोशिश कई सवाल खड़े करती है. यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने 23 मई को गैर कांग्रेसी, क्षेत्रीय और गैर एनडीए दलों को बैठक के लिए न्योता दिया है. उधर टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडु लगातार मुलाकातों में जुटे हुए हैं. उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, एनसीपी चीफ शरद पवार, मायावती और अखिलेश यादव से मुलाकात की. आपसी मुलाकातों और सहमतियों के दौर में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि सबका पीएम कौन? लेकिन उससे बड़ा सवाल ये है कि क्या साल 2004 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से प्रेरित हो कर कांग्रेस को ये उम्मीद जग रही है कि अबकी बार – गैर बीजेपी सरकार?

एक तरफ कांग्रेस खुद राहुल को पीएम के लिए धीरे से प्रोजेक्ट कर रही है क्योंकि वो ये जानती है कि एनसीपी चीफ शरद पवार और टीएमसी सुप्रीम ममता बनर्जी कांग्रेस को राहुल के नाम पर सपोर्ट नहीं करेंगे. ऐसे में कांग्रेस डीएमके चीफ स्टालिन के जरिए राहुल गांधी का नाम प्रोजेक्ट करा चुकी है.

लेकिन ये कवायद तभी कामयाब होगी जबकि मोदी को पूर्ण बहुमत न मिले. कांग्रेस सिर्फ इस बात पर भी काफी खुश हो सकती है कि भले ही दोबारा केंद्र में एनडीए की सरकार बन जाए लेकिन मोदी दोबारा पीएम न बनें. ऐसी संभावना भी तब होगी जबकि एनडीए 272 के जरूरी आंकड़े से कुछ सीटें पीछे रह जाए और  बीजेडी, वाईआरएस कांग्रेस और टीआरएस समर्थन के बदले मोदी की जगह दूसरे पीएम की मांग करें.
ये सारे काल्पनिक कयास हैं और इन्हें लेकर मायावती खुश हैं. उसी खुशी में ट्वीट कर कह रही हैं कि मोदी के हाथ से इंदिरा गांधी की तरह काशी फिसल सकता है. अभी तो चुनाव बाद मायावती को समाजवादी पार्टी के साथ हुए महागठबंधन का इम्तिहान भी देखना है. अवसरवादिता के चलते हुए समझौते अवसर देख बदल जाते हैं. लेकिन इन सबसे परे मायावती अपनी दिव्यदृष्टि से बनारस में मोदी की हार देख रही हैं और कांग्रेस के छलावे में पीएम पद का सपना.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here