लोकसभा चुनाव के पांच चरणों में 425 सीटों पर मतदान हो चुका है. अब आखिरी दो चरणों को लेकर निर्णायक जंग छिड़ी हुई है. इस जंग में हमले, वार-पलटवार और आरोप-प्रत्यारोप चरम पर हैं. पीएम मोदी ने पूर्व पीएम राजीव गांधी को ‘मिस्टर क्लीन’ से भ्रष्टतम बताते हुए सियासी संग्राम छेड़ दिया है तो पश्चिम बंगाल में श्रीराम के नारे पर ममता बनर्जी के विरोध का जवाब देते हुए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि श्रीराम के नारे अगर हिंदुस्तान में नहीं लगेंगे तो क्या पाकिस्तान में लगेंगे. इन सबके बीच कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने इशारों इशारों में पीएम मोदी पर निशाना साधा. प्रियंका ने कहा कि इतिहास और महाभारत गवाह है कि अहंकार तो दुर्योधन का भी नहीं रहा.

दरअसल, हरियाणा के अंबाला में उन्होंने कहा कि बीजेपी के नेता कभी शहीदों के नाम पर वोट मांगते हैं तो मेरे परिवार के सदस्यों के शहीद सदस्यों का अपमान करते हैं. इस दौरान उन्होंने महाभारत का जिक्र करते हुए हिंदी के प्रख्यात कवि रामधारी सिंह दिनकर की कुछ पंक्तियां सुनाईं.

उन्होंने महाभारत का प्रसंग सुनाते कहा कि इतिहास गवाह है कि इस देश ने कभी अहंकार बर्दाश्त नहीं किया है. ऐसा अहंकर दुर्योधन में भी था. भगवान कृष्ण जब दुर्योधन को समझाने गए तो उनको बंदी बनाने की कोशिश थी. इसके बाद प्रियंका ने कहा, जब नाश मनुज पर छाता है,पहले विवेक मर जाता है, हरि ने भीषण हुंकार किया,अपना स्वरूप-विस्तार किया,डगमग-डगमग दिग्गज डोले,भगवान् कुपित होकर बोले-‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे.

ये पंक्तियां हिंदी के महान कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के महाकाव्य रश्मिरथी से ली गईं. इस महाकाव्य में 7 सर्ग हैं. महाभारत की कहानी को दिनकर ने काव्य के रूप में नए तरीके से पेश किया. प्रियंका ने तृतीय सर्ग से अंश उठाया. आइए पढ़ते हैं तृतीय सर्ग के कुछ अंश…

वर्षों तक वन में घूम-घूम,

बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,

सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,

पांडव आये कुछ और निखर।

सौभाग्य न सब दिन सोता है,

देखें, आगे क्या होता है।

मैत्री की राह बताने को,

सबको सुमार्ग पर लाने को,

दुर्योधन को समझाने को,

भीषण विध्वंस बचाने को,

भगवान् हस्तिनापुर आये,

पांडव का संदेशा लाये।

‘दो न्याय अगर तो आधा दो,

पर, इसमें भी यदि बाधा हो,

तो दे दो केवल पाँच ग्राम,

रक्खो अपनी धरती तमाम।

हम वहीं खुशी से खायेंगे,

परिजन पर असि न उठायेंगे!

दुर्योधन वह भी दे ना सका,

आशीष समाज की ले न सका,

उलटे, हरि को बाँधने चला,

जो था असाध्य, साधने चला।

जब नाश मनुज पर छाता है,

पहले विवेक मर जाता है।

हरि ने भीषण हुंकार किया,

अपना स्वरूप-विस्तार किया,

डगमग-डगमग दिग्गज डोले,

भगवान् कुपित होकर बोले-

जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,

हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है,

यह देख, पवन मुझमें लय है,

मुझमें विलीन झंकार सकल,

मुझमें लय है संसार सकल।

अमरत्व फूलता है मुझमें,

संहार झूलता है मुझमें।

‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल,

भूमंडल वक्षस्थल विशाल,

भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,

मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।

दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,

सब हैं मेरे मुख के अन्दर।

‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,

मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,

चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,

नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।

शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,

शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।

‘शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,

शत कोटि जिष्णु, जलपति, धनेश,

शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,

शत कोटि दण्डधर लोकपाल।

जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,

हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

‘भूलोक, अतल, पाताल देख,

गत और अनागत काल देख,

यह देख जगत का आदि-सृजन,

यह देख, महाभारत का रण,

मृतकों से पटी हुई भू है,

पहचान, इसमें कहाँ तू है।

‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख,

पद के नीचे पाताल देख,

मुट्ठी में तीनों काल देख,

मेरा स्वरूप विकराल देख।

सब जन्म मुझी से पाते हैं,

फिर लौट मुझी में आते हैं।

‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,

साँसों में पाता जन्म पवन,

पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,

हँसने लगती है सृष्टि उधर!

मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,

छा जाता चारों ओर मरण।

‘बाँधने मुझे तो आया है,

जंजीर बड़ी क्या लाया है?

यदि मुझे बाँधना चाहे मन,

पहले तो बाँध अनन्त गगन।

सूने को साध न सकता है,

वह मुझे बाँध कब सकता है?

‘हित-वचन नहीं तूने माना,

मैत्री का मूल्य न पहचाना,

तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,

अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।

याचना नहीं, अब रण होगा,

जीवन-जय या कि मरण होगा।

‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,

बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,

फण शेषनाग का डोलेगा,

विकराल काल मुँह खोलेगा।

दुर्योधन! रण ऐसा होगा।

फिर कभी नहीं जैसा होगा।

‘भाई पर भाई टूटेंगे,

विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,

वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,

सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।

आखिर तू भूशायी होगा,

हिंसा का पर, दायी होगा।’

थी सभा सन्न, सब लोग डरे,

चुप थे या थे बेहोश पड़े।

केवल दो नर ना अघाते थे,

धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।

कर जोड़ खड़े प्रमुदित,

निर्भय, दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!

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