Mahabharat की कुछ कही अनकही बाते – 2

भारत का महाकाव्य जो प्राचीन भारत के विश्वयुद्ध का जीवंत चित्र है, अपने आवरण में बहुत से ऐसे तथ्य छुपाये हुए है जिससे हममेें से अधिकांश लोग परिचित नहीं हैं, जानिये यहां क्या-क्या है ऐसा जिसके विषय में आज आपको जानकारी प्राप्त होने वाली है..

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जहां एक तरफ महाभारत प्राचीन भारत के वैभव की झलक प्रस्तुत करता है वहीं वह एक संदेश भी है असत्य के सत्य के हांथों पराभव का. बहुत कुछ कहा सुना और पढ़ा जाता है महाभारत के बारे में किन्तु फिर भी बहुत कुछ ऐसा है जिससे लोग पूर्णतया परिचित नहीं हैं. महाभारत की कुछ कही अनकही बातें नामक इस लेख में जानिये क्या क्या है ऐसा जिसके विषय में आज आपको जानकारी प्राप्त होने वाली है.

11) महाभारत इतिहास का एकमात्र युद्ध है जिसमे कोई हीरो नही है। विजय धर्मराज युधिष्ठिर की हुई वे राजा बने परंतु उनका सेनापति धृष्टद्युम्न भी कम नही था, श्रीकृष्ण की भी बड़ी भूमिका थी। दूसरी ओर कुरु सेनापति भीष्म पितामह 150 वर्ष की आयु में भी इतनी शक्ति से लड़े की कई दिनों तक उन्होंने पांडवों के छक्के छुड़ा दिये।

12) युद्ध के प्रथम दिन भीष्म पितामह ने पांडव सेना का इतना नाश कर दिया था कि लगने लगा था मात्र 5-6 दिन में उनकी पूरी सेना पितामह की भेंट चढ़ जाएगी। हालांकि श्रीकृष्ण और धृष्टद्युम्न की रणनीति ने पांडवों को बचाये रखा।

13) आठवें दिन भीम ने एक साथ 18 कौरवों को मार गिराया जिससे भीष्म पितामह का क्रोध सिर पर चढ़ गया। उन्होंने इतने भीषण अस्त्र पांडवों पर दागे की कुरुक्षेत्र ही नही बल्कि आसपास के सभी राज्यो की जमीन हिलने लगी, वैसे तो कुरुक्षेत्र से समुद्र की दूरी बहुत अधिक थी मगर इन महाअस्त्रों के लगातार प्रयोग से समुद्र में कंपन होने लगा।

14) भीष्म पितामह क्रोधाग्नि में जल रहे थे वही अर्जुन मोहवश उनसे युद्ध नही कर रहे थे। तब श्रीकृष्ण ने रथ का एक पहिया उठाकर अपनी शस्त्र ना उठाने की प्रतिज्ञा तोड़ दी। श्रीकृष्ण ने पितामह को एक संदेश देने का प्रयास किया था कि कोई भी प्रतिज्ञा राष्ट्र से बढ़कर नही होती परंतु पितामह यह संदेश समझ ना सके अन्यथा यह युद्ध अपनी मध्यावधि में ही समाप्त हो जाता।

15) महाभारत में जितने भी विदेशी राजा आये थे उन्होंने भारतीय सेना के स्तर का सेनाभ्यास नही किया था अतः शुरुआत के कुछ ही दिनों में सभी का समूल नाश हो गया। जो भारतभूमि विदेशियों को ज्ञान, व्यवसाय और रोजगार देने के लिये प्रसिद्ध थी वही भारत भूमि आज विदेशियों के लिये रक्तचंडी बनकर उनका रक्त चूस रही थी।

16) भीष्म पितामह शरशैय्या पर लेटे थे यह देखकर धर्मराज युधिष्ठिर इतने दुखी हुए की वे युद्ध करना ही नही चाहते थे पर श्री कृष्ण ने उन्हें क्षत्रिय धर्म समझाया जिसके बाद युधिष्ठिर फिर युद्धभूमि में लौट आये।

17) रामायण और महाभारत में एक बड़ा अंतर यह भी है कि जब श्री राम का राज्याभिषेक हुआ तब दिवाली मनाई गयी थी जबकि जब धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ तब एक मनहूसियत फैली हुई थी। हस्तिनापुर में पांडवों की जयकार हो रही थी मगर सब दुखी थे, ऐसा कोई घर नही था जिसने अपना कोई सदस्य ना खोया हो।

18) पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्रविड़, उत्कल और बंग, हमारे राष्ट्रगान में वर्णित ये सभी राज्य महाभारत के पश्चात भीषण महामारी के शिकार बने। इन राज्यो की समस्त जनता हस्तिनापुर जाकर मदद की दुहाई मांगने लगी। जिसके फलस्वरूप युधिष्ठिर को फिर से भारत को एकसूत्र में बांधने का जिम्मा अपने सिर लेना पड़ा और कुछ ही वर्षो में शस्य श्यामला भूमि एक बार फिर खिल उठी।

19) महाभारत युद्ध ने श्रीकृष्ण को भी कम क्षति नही पहुँचाई, द्वारिका के कई बाँकुरे मारे गए थे। समुद्र का स्तर बढ़ घट रहा था जिससे द्वारिका कुछ ही वर्षो बाद डूब गई और 20वी सदी में भारतीय नौसेना के गोताखोरों द्वारा उसे फिर से ढूंढ लिया गया।

20) जिस इंद्रप्रस्थ के पीछे यह पूरा युद्ध हुआ, युधिष्ठिर ने वही इंद्रप्रस्थ मुस्कुराते हुए एक मात्र जीवित कौरव युयुत्सु को दे दिया और सिद्ध कर दिया कि वे ना सिर्फ धर्मराज अपितु सच्चे महात्मा है। भारतभूमि सदा ही अपने हर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति में युधिष्ठिर को ही ढूंढने का प्रयास करेगी।

21) भारत विजय के दौरान पांडवों ने कई रामायणकालीन नगरों की खोज कर ली, जैसे साकेत जो कि अयोध्या का अंग था। किष्किंधा जो कि अब कर्नाटक है इसके अतिरिक्त भाग्यनगर और अमरावती जैसे नगर चिन्हित कर लिए गए।

22) जब तक युधिष्ठिर राजा रहे मैं कहूंगा कि महाभारत का युद्ध सफल रहा परन्तु जब पांडवों की मृत्यु के बाद उनका पौता परीक्षित अयोग्य सिद्ध हुआ और उसने हस्तिनापुर का सम्मान मिट्टी में मिला दिया तो यह निर्धारित हो गया कि महाभारत करके भारतीयों ने स्वयं ही अपना विनाश चुना था।

23) कालांतर में विज्ञान का स्थान आडंबरों और अंधविश्वास ने ले लिया साथ ही कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था की जगह जन्म आधारित जाति व्यवस्था ने ले ली। हालांकि भारत इतना विकसित था कि उसे बर्बाद होने में भी कई सदियां लग गयी। अंततः 3 जून 1818 को जब अंग्रेजो की सत्ता स्थापित हुई तब जाकर भारत की बर्बादी पर अंतिम मोहर लगी।
हमारे शास्त्रों में लिखा है कि व्यक्ति समाज का और समाज राष्ट्र का निर्माण करता है, यदि दुर्योधन जैसे दुष्ट लोग जन्म लेंगे तो यही होगा जो महाभारत के बाद हुआ। हर व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी आने वाली संतान को महाभारत अवश्य पढ़ाये और उसे युधिष्ठिर बनने के लिये प्रेरित करे और समाज मे बैठे दुर्योधनों की संगति से उसे बचाये।

जिस दिन भारतीय धर्मराज युधिष्ठिर का अनुसरण करना शुरू करेंगे उसी दिन से भारत महाभारत के समृद्धि, गौरवशाली और ज्ञानरूपी रथों की सवारी करता दिखेगा और इस रथ को कोई विदेशी आक्रांता नही रोक सकेगी।

(परख सक्सेना)

 

 

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