Zoya Mansoori Writes: राजा नरेन्द्र विक्रमादित्य का बंगाल

अरे गुलामों, तुम्हे वो नहीं दिखेगा जो मैं देख सकता हूँ.. देखो, महाराज का बल वापस आ गया है।अब शीघ्र ही राजा नरेंद्र दुष्टों का अंत करेंगे !..

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ये वो समय था जब सम्पूर्ण आर्यावर्त पर चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य नरेंद्र का शासन था। वो महाराजधिराज थे अतः समस्त आर्यावर्त में फैले छोटे छोटे राज्य उनके झंडे के अधीन स्वतंत्र रूप से शासन करते थे।
सम्राट विक्रमादित्य एक न्याय प्रिय राजा के रूप में ख्यातिप्राप्त थे। अतः उनके समर्थक सम्पूर्ण आर्यावर्त में फैले हुए थे। ऐसे ही एक छोटे से राज्य ‘बंगाल’ में वहां की रानी के आदेश पर उनके समर्थकों पर अत्याचार हो रहा था। उनके साथ लूटपाट, शोषण, बलात्कार औऱ हत्याएँ हो रहीं थी।
गुप्तचरों के माध्यम से ये सूचनाएँ राजा तक पहुँच रही थी मगर राजा कोई फैसला लेने में असमर्थ थे। अतः प्रजा, राजा के एक करीबी दरबारी को लेकर में राजा के सम्मुख जा पहुँची।
राजा के करीबी एक दरबारी नें हाथ जोड़कर विनम्र शब्दों में राजा नरेंद्र से कहा,” हे राजन, बंगाल की प्रजा आज दानवों के अत्याचारों से त्राहिमाम कर रही है। ये लोग आपके ही भक्त होने की सजा भुगत रहे हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार प्रजावत्सल, धार्मिक और न्यायप्रिय राजा प्रत्यक्ष श्री विष्णु का प्रतिनिधि और जीवित देवता होता है और प्रजा उसकी भक्त। अतः हम सब आपके भक्त हैं।
जिस प्रकार भगवान नरसिंह ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी, उसी प्रकार आप भी बंगाल राज्य में अपने भक्तों की रक्षा कीजिए। हे त्रिविक्रमः स्वरूप! जिस प्रकार भगवान वामन ने मात्र तीन कदमों से पूरी पृथ्वी और अन्नत ब्रह्मांड को नाप लिया था, उसी प्रकार आप भी बंगाल का शासन सेना के हाथ मे देकर अपने भक्तों को कष्टों से मुक्ति दिलाइए।। ये आपके लिए एक पग भर उठाने जितना आसान कार्य है। हे राजन! बालपन का अपना वो बल याद करिये, उठाइए पग और अंत करिये इस अन्याय का।
अपने भक्त की बातें सुन कर राजा नरेंद्र की आंखों में आत्मविश्वास के लाल डोरे के तैरने लगे। भुजाएँ बल के अतिरेक से फड़फड़ाने लगीं। उन्होंने मूँछों पर ताव दिया, सफेद दाढ़ी को बायें हाथ से सहलाया और सिंहासन से खड़े हो गए।
उन्होंने भक्त को अपने पास बुलाकर अपना दाहिना पैर हवा में उठाया। भक्त उत्साहित होकर राजा की जयजयकार करने लगा। तभी राजा नरेंद्र की भरपूर लात उसकी खुद की कमर पर आकर लगी। भक्त जमीन पर औंधे मुंह गिर पडा।
उसके बाद वो भक्त अपनी कमर मलते हुए धीरे से उठा तो उसके चेहरे पर प्रशंसा के भाव छाये हुये थे। वो दरबार मे मौजूद राजदरबारियों को सम्बोधित करते हुए बोला,” देखा, इसे कहते है समानता। हमारे महाराज अपने पराये में कोई भेद नही करते।”
तभी राजा नरेंद्र का घूंसा भक्त की आँख पर पड़ा औऱ उसे एक आँख से दिखाई देना बंद हो गया। भक्त दर्द भरी मुस्कान के साथ उसके साथ आई प्रजा से बोला,” क्यों मूर्खों? तुमको महाराज का ये मास्टरस्ट्रोक समझ आया कि नहीं? अरे कूपमंडूकों महाराज दुश्मनों को संदेश दे रहे हैं कि सबको एक नज़र से देखो, सबको समान समझो और महाराज को तलवार उठाने पर विवश न करो।”
तभी राजा का दूसरा घूंसा भक्त के चेहरे पर पड़ा औऱ उसका मुंह टेढ़ा हो गया। भक्त फिर से प्रजा की ओर देखकर खुशी से चिल्लाया, ” देखा, ये घूंसा मेरे मुँह पर नहीं पड़ा है बल्कि उनके मुँह पर पड़ा है जो ये कह कर महाराज की आलोचना कर थे कि वो एक कमज़ोर राजा है। अब दुष्टों की खैर नहीं।”
इसके बाद राजा नरेंद्र पास खड़े सिपाही से लठ्ठ लेकर भक्त के ऊपर पिल पड़े। तभी प्रजा के बीच से एक व्यक्ति चिल्लाया “अबे गधे भाग, राजा तुझे मार रहे हैं।”
भक्त कमज़ोर आवाज़ में बोला, “तू चुप कर देशद्रोही। वहाँ सीमा पर हमारे सैनिक सर्दी, गर्मी, बरसात में दुश्मन राज्य से लड़ रहे हैं तो क्या मै एक दिन मार भी नही खा सकता। अरे गुलामों! तुम्हे वो नहीं दिखेगा जो मैं देख सकता हूँ। देखो ध्यान से, महाराज का बल वापस आ गया है। अब उचित समय आते ही राजा नरेंद्र दुष्टों का अंत करेंगे।”
इतना कहकर भक्त बेहोश हो गया।
(ज़ोया मन्सूरी)

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