पहले ‘कमल’ फिर ‘मामाजी’ फिर ‘महाराज’ को हराकर सीएम बने कमलनाथ

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किसी राजनीतिक पद के लिए राजनीति न करने के लिए जाने जाते हैं कमलनाथ

कमलनाथ की सियासी ज़िंदगी अहम पड़ाव में प्रवेश कर चुकी है जिसे वो मील का पत्थर मानते हैं. तकरीबन चार दशकों के सियासी अनुभव को समेटे ये चेहरा सियासत की सुर्खियों से खुद को दूर रखता आया. लेकिन जब भी जिम्मेदारी मिली तो उसे शिद्दत से निभाया. 15 साल से सत्ता का वनवास भोग रही कांग्रेस के सामने जहां गुटबाजी की वजह से चुनावी जीत की उम्मीद धूमिल थी तो साथ ही देश के दूसरे राज्यों में मिली लगातार हार से मनोबल भी गिरा हुआ था. ऐसे वक्त में कमलनाथ ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने की जिम्मेदारी को निभाने में 56 इंच का सीना दिखाया. वो चाहते तो अब तक मध्यप्रदेश की राजनीति के नेपथ्य में रहने की दलील देते हुए इस जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ सकते थे क्योंकि छह महीने पहले तक जो हालात थे उसमें इलाकों और नेताओं में बंटी कांग्रेस की जीत की उम्मीद दूर-दूर तक नहीं की जा सकती थी. ऐसे में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने को सिर्फ खुद का रिकॉर्ड खराब करने का गलत फैसला तक करार दिया जाता. लेकिन कमलनाथ ने जब कोई नहीं था तब मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के वर्चस्व को चुनौती देना स्वीकार किया.

उनकी अथक मेहनत, टीम मैनेजमेंट, चुनावी प्रबंधन और चुनाव में होने वाले खर्च तक का अपनी जेब से इंतजाम करने के तरीके ने आखिरकार कांग्रेस की डूबती कश्ती को किनारे लगा ही दिया. यही वजह है कि मध्यप्रदेश में कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने पर मुहर लगने में ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा.

हालांकि कमलनाथ के सीएम बनने का एक मौका 25 साल पहले भी 1993 में आया था. लेकिन कहा जाता है कि उस वक्त पूर्व सीएम अर्जुन सिंह ने उनकी जगह राजा दिग्विजय सिंह का नाम आगे बढ़ा दिया था. कमलनाथ ने उस वक्त किसी तरह का सियासी हठ नहीं दिखाया था और वैसे भी कमलनाथ किसी भी राजनीतिक पद के लिए राजनीति न करने के लिए जाने जाते हैं.

गांधी परिवार की तीन पीढ़ियों के प्रति विश्वसनीयता का ब्रांड हैं कमलनाथ. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का भरोसा इस कदर जीता हुआ था कि इंदिरा उन्हें अपना तीसरा बेटा मानती थीं. कहा जाता है कि जब एक बार संजय गांधी को किसी वजह से 7 दिनों के लिए तिहाड़ जेल जाना पड़ा तो उनकी सुरक्षा की वजह से कमलनाथ खुद भी जेल चले गए. जेल जाने के लिए कमलनाथ सुनवाई के वक्त जानबूझकर जज से भिड़ गए थे. ये युवा कमलनाथ की संजय के प्रति दोस्ती की अनोखी मिसाल थी. इमरजेंसी के वक्त एक नारा बेहद चर्चित हुआ था कि ‘इंदिरा के दो हाथ, संजय गांधी और कमलनाथ’.

कमलनाथ के रूप में कांग्रेस को सही मायने में संजीवनी मिली है. प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने राज्य में दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया और सुरेश पचौरी जैसे दिग्गज नेताओं को एक साथ लाने का काम किया जिससे पार्टी की एकजुटता दिखाई पड़ी. वर्ना जीतू पटवारी के वायरल वीडियो से समझा जा सकता है कि कांग्रेस की हालत क्या थी. जीतू पटवारी ने प्रचार के वक्त पार्टी की बजाए खुद के लिए वोट मांगा था और कहा था कि, ‘पार्टी गई तेल लेने’. अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने न सिर्फ पूरे चुनाव तक पार्टी को एकजुट रखा बल्कि अपने प्रभाव वाली 32 में से 18 सीटों पर जीत भी दिलाई.

कानपुर में जन्मे कमलनाथ की कर्मभूमि छिंदवाड़ा है. कमलनाथ छिंदवाड़ा से 9 बार सांसद रह चुके हैं. साल 1980, 1985, 1989, 1991, 1998, 1999, 2004, 2009, 2014 में सांसद बने. साल 1980 में वो पहली बार छिंदवाड़ा से सांसद बने. इस चुनाव प्रचार में इंदिरा गांधी ने उन्हें अपना तीसरा बेटा बताया था.

साल 2014 में मोदी लहर के बावजूद वो छिंदवाड़ा की लोकसभा सीटे से चुनाव जीते. आजतक सिर्फ एक बार ही कमलनाथ साल 1997 में चुनाव हारे हैं. 1997 में उपचुनाव में वो बीजेपी के सुंदरलाल पटवा से हारे थे.

साल 2001 से 2004 तक कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव रहे. साल 1991 में राज्य पर्यावरण मंत्री बनाए गए तो 1995-96 तक केंद्रीय मंत्री भी रहे. 2004 से 2009 तक केंद्रीय मंत्री रहे जबकि साल 2012 में उन्हें न सिर्फ शहरी विकास मंत्री बनाया गया बल्कि संसदीय कार्य मंत्री का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया.

कमलनाथ पहली बार उस मध्यप्रदेश का सीएम बनने जा रहे हैं जहां की राजनीति में पिछले चालीस साल से उनकी धमक को महसूस किया जाता रहा है. ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ के बीच में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को किसी एक को चुनना था.

कमलनाथ ने पहले ‘कमल’, फिर ‘मामा’ शिवराज और आखिरी में ‘महाराज’ को हरा कर सीएम पद हासिल किया. ये जीत उन्हें जनता का दिल जीत कर हासिल हुई. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि धैर्य और समय दो सबसे बड़े योद्धा हैं. कमलनाथ में उसी धैर्य और समय का अक्स देखा जा सकता है.

(इंद्रनील त्रिपाठी)

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