विवाद में कौन – ‘प्रधानमंत्री-मौन’! – सबको पता है..फिर विवाद कहाँ है?

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एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर तो नेहरू थे ..मनमोहन सिहं एक नाम नहीं, एक चेहरा थे, फिर उन पर विवाद क्यों ?

विवादों में में आ गई है संजय बारू की फिल्म – ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टरः द मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑफ मनमोहन सिंह’. इस फिल्म का अभी ट्रेलर ही सामने आया है, फिल्म अभी आने वाली है. अभी ये हाल  है तो फिल्म के आने पर क्या आलम होगा..

‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ बनाने वाले संजय बारू पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार थे. बड़ी बात ये है कि संजय बारू प्रवक्ता भी थे एक ऐसे प्रधानमंत्री के जिन्हें चुप रहने के लिए जाना जाता है. इस बात से साफ़ ज़ाहिर है कि संजय बारू मनमोहन सिंह को जितना जानते हैं शायद सोनिया गांधी या कोई भी अन्य उन्हें उतना नहीं जान सकता है. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उनके बाद यदि कोई भी सबसे अच्छी तरह से जानता होगा वह व्यक्ति थे संजय बारू.

इसलिए यदि संजय बारू कहते हैं कि मनमोहन सिंह एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर थे, तो इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए.

हाँ, मीडिया के प्लेटफॉर्म से हम संजय बारू की पीठ ज़रूर थपथपाना चाहेंगे कि बड़ी हिम्मत का काम किया है उन्होंने. संजय बारू एक साहसी फिल्ममेकर के तौर पर स्थापित हो गए हैं. उन्होंने सच को स्थापित करने का साहस किया है.

इस फिल्म को विवाद में घसीटने की वजह समझ नहीं आती. इतिहास ने मनमोहन सिंह के रूप मेंअपनेआप को दुहराया है. सारी दुनिया जानती है कि जिस तरह ज्ञानी जेल सिंह इंदिरा गाँधी के अत्यंत वफादार थे उसी तरह मनमोहन सिंह सोनिया गाँधी के अत्यंत वफादार हैं. वे यानी कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन कर भी सब कुछ वैसा ही करते थे जैसा मैडम चाहती थीं. उनकी मैडम थीं सोनिया गाँधी. मैडम से पूछे बिना न वे कुछ करते थे न कहते थे. इस चक्कर में वे सदा ही चुप रहते थे. कुछ सही-गलत बोल कर आगे फंस जाने से वे सदा ही बचा करते थे. ये मजबूरी मनमोहन जी को और भी मौन बना देती थी. विश्व इतिहास के सबसे मौन प्रधानमंत्री बनने का कीर्तिमान कदाचित मनमोहन सिंह के नाम ही है. 

अब बात करते हैं विवाद की. जिस विवाद में फंसाया जा रहा है फिल्म को, जैसा मैंने ऊपर कहा है, वह एक खुला हुआ राज़ है जिसे छुपाने की कोशिश बेकार है. इस फिल्म के ट्रेलर में दिखाया गया है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मैडम कह रही हैं कि आप का प्रधानमंत्री बने रहना हमारे लिए ज़रूरी है. इतने घोटाले चल रहे हैं, ऐसे माहौल में राहुल कैसे टेकओवर कर सकता है!

अब जो हम बिटवीन द लाइन्स समझ सकते हैं वो ये है कि – राहुल अभी बच्चा है. राहुल को अभी बोलना नहीं आता. उसे चुप रहना तो बिलकुल ही नहीं आता. आप बोलना जानते हैं और चुप रहना तो इस देश में आप सबसे अच्छा जानते हैं. इस घोटालों और घोटालों के खुलासों के वातावरण में आपका सामने होना कितना आवश्यक है, ये आप भी जानते हैं और मैं भी जानती हूँ !

विवाद का द्वितीय बिंदु भी सर्वथा सत्य है. प्रधानमंत्री के प्रवक्ता संजय बारू का रोल निभा रहे खन्ना कहते हैं कि – मैं देश के लिए काम करता हूँ, पार्टी के लिए नहीं! तो उनसे बात कर रहा व्यक्ति कहता है कि – लेकिन प्रधानमंत्री तो पार्टी के लिए काम करते हैं! – तो इस बात में विवाद कहाँ है? कहाँ और कैसे गलत है ये बात? और अगर कांग्रेसजनों को यह स्वीकार करने में लज्जा की अनुभूति हो रही है कि मनमोहन सिंह पार्टी के लिए काम करते थे, तो इसका अर्थ है पार्टी के काम सही नहीं होते थे?..इसका मतलब है, मनमोहन सिंह गलत कामों में पार्टी का सहयोग करते आ रहे थे?

(पारिजात त्रिपाठी)

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