हनुमान जी पर सीएम योगी की बात सही तरह से समझें!

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कुछ तो ये लोग कहेंगे..इन लोगों को काम है कहना..

राजस्थान के अलवर में चुनाव प्रचार करते समय उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा कि हनुमान जी वनवासी हैं. उन्होंने हनुमान जी को दलित कहा और इस तरह विरोधियों को एक मुद्दा मिल गया. मीडिया भी तैयार बैठा था, बात को जम कर उछाला.

भारतीय मीडिया के बारे में सब जानते हैं कि यदि बात हिन्दू धर्म विरोधी हो या राष्ट्रविरोधी, मीडिया जम कर उसे हाइलाइट करता है. सिर्फ हाइलाइट ही नहीं करता मीडिया ऐसी बातों का बेशर्मी से समर्थन भी करता है चाहे वो समर्थन प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष. चाहे इसके पीछे मीडिया की मंशा झूठी सेक्युलर छवि बनाये रखने की हो या फिर उसे इसके लिए अन्दर वालों से और बाहर वालों से पैसा मिलता है, कोई तीसरी बात तो हो ही नहीं सकती.

अब बात करते हैं जो सीएम योगी ने कही, जिसको समझे बिना ही प्रचारित किया गया. योगी ने कहा कि हनुमान जी वनवासी हैं. तो इसमें कोई संदेह नहीं. राम जी को वन में मिले थे हनुमान जी. और वनवासी का अर्थ पिछड़ा या गंवार नहीं होता बल्कि एक जीवन शैली होती है जो वन के जीवन से सम्बन्धित होती है.

अब योगी आदित्यनाथ की बात का दूसरा हिस्सा देखिये. उन्होंने कहा कि हनुमान जी दलित हैं. अब मूर्खों को समझाया जा नहीं सकता और समझदारों को समझाने की आवश्यकता नहीं होती. पर हम इसका स्पष्टीकरण देना अपना कर्तव्य समझते हैं. योगी की कही गई बात अत्यंत गूढ़ है जिसे उन्होंने सरल शब्दों में प्रस्तुत किया. हनुमान जी राम जी के सेवक थे. वे राम जी के चरणों की पूजा करते थे. उस समय न कोई किसी का शोषण कर रहा था न दलन. शोषित और शोषक या दलित और दालक की वामपंथी अवधारणा मार्क्स ने दी है और जिस परिप्रेक्ष्य में दी है वह यहां लागू नहीं होती. दलित से योगी का अर्थ था दीन. प्रभु राम समस्त विश्व के स्वामी हैं और हम सभी उनके सेवक दीन हैं. दीन अर्थात प्रभु की कृपा पर पलने वाले. इस दीनता में श्रेष्ठता है क्योंकि इसमें अहम नहीं है अविवेक नहीं है. इसमें भक्ति का परम तत्व अन्तर्निहित है जिसे हम समर्पण कहते हैं. प्रभु को अपना सर्वस्व अर्थात अपना जीवन समर्पित करने से श्रेष्ठ दीन कोई हो नहीं सकता. और ऐसे ही दीनों को परम भक्त कहा गया है क्योंकि इन्हीं दीन भाव में प्रभु के चरणों की सेवा में रत भक्तों को सृष्टि सम्राट श्री राम की कृपा प्राप्त होती है.

इस गहन अर्थ में श्री राम के समक्ष श्री हनुमान दीन भाव में हैं और श्री राम स्वामी भाव में. तो इस अर्थ का अनर्थ कर उसका राजनीतिकरण करना विरोधियों का ओछापन और उनकी मूढ़ता का ही परिचायक है, उसे गंभीरता से लेना समझदारी नहीं.

और यदि फिर भी आप इस शब्द पर ही अड़ जाते हैं कि योगी जी ने बोला तो बोला कैसे, श्री हनुमान जी दलित थोड़े हैं..तो इस स्थिति में आपके लिये उस शाब्दिक दृष्टिकोण से भी यह तथ्य समझना कदापि दुष्कर नहीं है. वे चाहे वानर हों या भालू – प्रभु राम के ये सेवक वहां वन में बिना सुविधाओं के प्रकृति के आश्रय में जीवन जीने को विवश थे. वे वनवासी थे और व्यवस्था के द्वारा वंचित ये वनवासी उस व्यवस्था के दलित ही तो हैं. अर्थात व्यवस्था ने उनका दलन किया है. और ये प्रकृति-पुत्र दलित थे जिनमें श्री हनुमान जी भी थे. और यहाँ इस स्थिति में तारणहार साक्षात प्रभु श्री राम जी थे. अब बताइये इससे अच्छा और क्या चाहिये आपको..

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