Bengal Polls: BJP हारी नहीं, उपविजेता रही – सरकार तो Mamta की ही बननी थी!

भले ही ये बात देश की जनता न जानती हो, बंगाल की जनता को पता था कि सरकार तो ममता की ही बननी है, ये बात दीगर है कि बीजेपी ने ममता के पैरों के नीचे की जमीन हिला डाली..

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पश्चिम बंगाल के प्रान्तीय चुनावों का परिणाम मोदी की पराजय नहीं बल्कि उनकी पार्टी की विजय है और देश में उनके बढ़ते कद का प्रमाण है. ये चुनाव परिणाम ममता बनर्जी की जीत को उतना नहीं दर्शाते हैं जितना परिस्थितियों की जीत को दर्शाते हैं. ममता की जीत होती तो बीजेपी दो अंकों तक भी नहीं पहुंच पाती. पुरुषार्थविहीन विजेता को परिस्थितियों से मिली विजय पर इतराना नहीं चाहिये. क्योंकि यह विजय सामयिक है, सार्वकालिक नहीं. पांच साल बाद इसका बिलकुल उल्टा होना है.
बंगाल चुनावों के परिणाम के निर्माता परिस्थितिजन्य कारण तमाम हो सकते हैं किन्तु ऊपर से दिखाई दे रहे तीन कारण प्रमुख हैं जो अगली बार चुनावी युद्ध में इस बार के विजेता और उपविजेता दोनो को ही ध्यान रखने होंगे:

ओवैसी-अब्बास की पार्टियां बेअसर 

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम या अब्बास सिद्दीकी की पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट बेनतीजा रहीं. चाहे वो अकेले लड़ रही हों या गठबंधन के साथ. मुस्लिम मतदाता ने उन पर ज्यादा यकीन नहीं किया और इसके बजाये मोदी की बीजेपी को बाहर रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. करना कुछ ज्यादा नहीं था – साम्प्रदायिक एकता की बात कह कर ममता के खाते में डालने थे सारे इस्लामी वोट. काम हो गया और बीजेपी सरकार बनाने से चूक गई. वैसे चाहे वो मुसलमान पार्टियां हों या मुसलमान प्रत्याशी -मुसलमान मतदाता ने अपनी पूरी मजहबी समझदारी दिखाई और वही किया जो उनसे कहा गया था. उन्होंने काम कर दिया.

दलबदलुओं की उपस्थिति

जो गलती पिछले दिल्ली चुनावों में हुई थी वही बंगाल में भी हुई. दलबदल करके बीजेपी में आये लोगों को जब ज्यादा तवज्जो मिली तो पहले से पार्टी के लिए काम कर रहे ग्राउंड लेवल के कार्यकर्ता हतोत्साहित हुए. ऐसे में नतीजा वो नहीं आया जो आना चाहिए था. बीजेपी आलाकमान मजबूर था. पार्टी में शामिल होने की शर्त ही यही थी कि टिकट दिया जाए. शर्त मान कर दुश्मन को कमजोर करने में समझदारी दिखाई दी बजाये इसके कि उनको एक पंक्ति पीछे कर दिया जाता और पार्टी के असली लोगों को असली जिम्मेदारी दी जाती.

एंटी-इंकम्बेंसी की नाकामी

बीजेपी जानती थी राष्ट्रीय मुद्दे इन प्रांतीय चुनावों में काम आने से रहे. ऐसे में राम का नाम और विकास का काम मुद्दा बनाया गया जो बहुत बड़े पैमाने पर पार्टी के काम आया. किन्तु पार्टी के मन में एक अनकहा यकीन दिखाई दिया कि एन्टीइन्कम्बेंसी फैक्टर भी उसके काम आ जाएगा. किन्तु पार्टी ये भूल गई कि एन्टीइन्कम्बेंसी तब काम आती जब बीजेपी भी बंगाल की ही पार्टी होती तो उसे वैकल्पिक विकल्प बनने का अवसर मिल सकता था. अभी तो बाहरी होने की छाप के कारण एन्टीइन्कम्बेंसी के लिए कोई अवसर शेष नहीं था. तो ये फैक्टर भी नाकाम रहा और बड़ी विजय से नाकाम रही बीजेपी. बंगाल की रानी फिर बन गई ममता बनर्जी.
(यह लेख न्यूज़ इण्डिया ग्लोबल के चुनाव विश्लेषक चंदरपाल सिंह के साथ हुई चुनावी परिचर्चा पर आधारित है.)

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