इन शिवालयों के पीछे ‘परमशक्ति’ !

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भारत के शिवालय एक समानांंतर दिशा में कैसे? आज के विज्ञान की समझ से परे..

भारत धर्म, आस्था और चमत्कारों का देश है, यहां की सभ्यता और संस्कृति किसी भी दूसरे देश, जाति और धर्म से अलग और सनातन है. आज के वैज्ञानिक दौर में जितने भी आविष्कार हो रहे हैं या हो चुके हैं उन सबका उल्लेख हमारे पुरातन ग्रंथों में पढ़ने को मिलता है चाहे वो आविष्कार विमान का हो या टेलीविजन का हो या रेडियो का या फिर मिसाइल या ड्रोन का हो, सबका उल्लेख हमारे धर्म ग्रंथों में सदियों पहले से है. इन सबसे पता चलता है कि तकनीकी रूप से भी हमारा भारतवर्ष दूसरों से अधिक विकसित और अद्भुत रहा है.

भारत में ऐसे कई चमत्कारी धार्मिक स्थल मौजूद हैं जिनमें हो रहे चमत्कारों की पहेली आज तक विज्ञान भी नहीं सुलझा पाया है.  राम सेतु के तैरते पत्थर, ज्वालदेवी मंदिर में जलने वाले की दीपक की ज्वालाएं, उज्जैन के काल भैरव का मदिरा पान ऐसे कई चमत्कारी धर्मिक स्थल भारत में स्थित हैं जिनके रहस्य आज भी रहस्य बने हुए हैं. लेकिन देखा जाए तो इन सारे रहस्यों और चमत्कारों के पीछे कई वैज्ञानिक कारण हैं जिसकी गुत्थी अभी तक अनसुलझी है.

संसार के सबसे प्राचीनतम और उन्नत देश भारत के कई रहस्यों में से एक रहस्य ऐसा है जो किसी को भी हैरान कर देगा. ये रहस्य आज तक अबूझ और अभेद है. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की भारत में ऐसे शिव मंदिर है जो केदारनाथ से लेकर रामेश्वरम तक एक सीधी रेखा में बनाये गये है।  हैरानी की बात ये है कि प्राचीन भारत के पास ऐसा कैसा विज्ञान और तकनीक थी जिसे हम आज के युग कोई समझ ही नहीं पाया?  उत्तराखंड का केदारनाथ,  तेलंगाना का कालेश्वरम,  आंध्रप्रदेश का कालहस्ती,  तमिलनाडू का एकंबरेश्वर, चिदंबरम और रामेश्वरम मंदिरों को 79° E 41’54” Longitude के भौगोलिक सीधी रेखा में बनाया गया है.

ये सारे मंदिर प्रकृति के 5 तत्वों में लिंग की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं,  जिसे हम आम भाषा में पंच भूत कहते हैं. पंच भूत यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष. इन्ही पांच तत्वों के आधार पर इन पांच शिव लिंगों को प्रतिस्थापित किया है. इन पंचतत्वों के अमुसार जल का प्रतिनिधित्व तिरुवनैकवल मंदिर में है,  आग का प्रतिनिधित्व तिरुवन्नमलई में है,  हवा का प्रतिनिधित्व कालाहस्ती में है,  पृथ्वी का प्रतिनिधित्व कांचीपुरम में है और अतं में अंतरिक्ष या आकाश का प्रतिनिधित्व चिदंबरम मंदिर में है. इन मंदिरों का एक ही समान्तर दिशा में होना वाकई हैरत में डालने वाला रहस्य तो है साथ ही उस युग के उन्नत विज्ञान की झलक भी है. वास्तु-विज्ञान-वेद का अद्भुत समागम को दर्शाते हैं ये पांच मंदिर.

भौगॊलिक रूप से भी इन मंदिरों में विशेषता पायी जाती है, इन पांच मंदिरों को योग विज्ञान के अनुसार बनाया गया था  और एक दूसरे के साथ एक निश्चित भौगोलिक स्थिति में पंक्तिबद्ध रखा गया है. इस के पीछे निश्चित ही कॊई विज्ञान होगा जो मनुष्य के शरीर पर प्रभाव करता होगा.

इन मंदिरों का करीब चार हज़ार वर्ष पूर्व निर्माण किया गया था, जब उन स्थानों के अक्षांश और देशांतर को मापने के लिए कोई उपग्रह तकनीक उपलब्ध ही नहीं था तो फिर कैसे इतने सटीक रूप से पांच मंदिरों को प्रतिष्ठापित किया गया था?  ये वाकई उत्कृष्ठ विज्ञान का नमूना है जहां आज के दौर के विज्ञान का पंहुचना नामुमकिन है.

केदारनाथ और रामेश्वरम के बीच 2383 किमी की दूरी है, लेकिन ये सारे मंदिर लगभग एक ही समानांतर रेखा में पड़ते है. आखिर हज़ारों वर्ष पूर्व किस तकनीक का उपयॊग कर इन मंदिरों को समानांतर रेखा में बनाया गया है, ये आज तक रहस्य ही है. श्रीकालहस्ती मंदिर में टिमटिमाते दीपक से पता चलता है कि वह वायु लिंग है. तिरूवनिक्का मंदिर के अंदरूनी पठार में जल वसंत से पता चलता है कि ये जल लिंग है. अन्नामलाई पहाड़ी पर विशाल दीपक से पता चलता है कि वो अग्नि लिंग है. कंचिपुरम के रेत के स्वयंभू लिंग से पता चलता है कि वो पृथ्वी लिंग है और चिदंबरम की निराकार अवस्था से भगवान के निराकारता यानी आकाश तत्व का पता लगता है.

अब यह आश्चर्य की बात नहीं तो और क्या है कि ब्रह्मांड के पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करनेवाले पांच लिंगो को एक समान रेखा में सदियों पूर्व ही प्रतिष्ठापित किया गया है. हमें हमारे पूर्वजों के ज्ञान और बुद्दिमत्ता पर गर्व होना चाहिए कि उनके पास ऐसा विज्ञान और तकनीक थी जिसे आधुनिक विज्ञान भी नहीं भेद पाया है. माना जाता है कि केवल ये पांच मंदिर ही नहीं अपितु इसी रेखा में अनेक मंदिर होगें जो केदारनाथ से रामेश्वरम तक सीधी रेखा में स्थित होंगे. इस रेखा को “शिव शक्ति अक्श रेखा” भी कहा जाता है. संभवता ये सारे मंदिर कैलाश पर्वत को ध्यान में रखते हुए बनाए गए होंगो जो 81.3119° E में पड़ता है.

महाकाल से शिव ज्योतिर्लिंगों के बीच का अद्भुत सम्बन्ध

प्राचीन भारत के उन्नत और उत्कृष्ठ विज्ञान का एक और नमूना उज्जैन के ज्योतिर्लिंग और देश के अन्य शेष ज्योतिर्लिंगों की दूरी को लेकर भी दिखाई पड़ती है.

उज्जैन से सोमनाथ- 777 किमी

उज्जैन से ओंकारेश्वर- 111 किमी

उज्जैन से भीमाशंकर- 666 किमी

उज्जैन से काशी विश्वनाथ- 999 किमी

उज्जैन से,मल्लिकार्जुन- 999 किमी

उज्जैन से केदारनाथ- 888 किमी

उज्जैन से  त्रयंबकेश्वर- 555 किमी

उज्जैन से बैजनाथ- 999 किमी

उज्जैन से रामेश्वरम- 1999 किमी

उज्जैन से घृष्णेश्वर – 555 किमी

हिन्दु धर्म में विज्ञान और आस्था का समागम

भारत की धार्मिक नगरी मध्य प्रदेश की उज्जैयनी यानि कि आज के उज्जैन को पृथ्वी का केंद्र माना जाता है, उज्जैन को धरती का केंद्र आज से नहीं बल्कि सनातन धर्म में हजारों सालों से केंद्र मानते आ रहे है, इसलिए उज्जैन में सूर्य की गणना और ज्योतिष गणना के लिए मानव निर्मित यंत्र भी बनाये गये हैं.

और जब करीब 100 साल पहले पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा (कर्क)अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनायी गयी तो उनका मध्य भाग उज्जैन ही निकला । आज भी वैज्ञानिक उज्जैन ही आते है सूर्य और अन्तरिक्ष की जानकारी के लिये।

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