#एकादशी का व्रत और नोबेल प्राइज

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2016 का फिजियोलॉजी ( मेडिसिन) का नोबेल प्राइज योशीनोरी युहसुमी नामक जापानी साइंटिस्ट को मिला।
उनका रिसर्च सब्जेक्ट है – Autophagy, which means eat thyself. जैसे कंप्यूटर में फ़ाइल ज्यादा इकट्ठी हो जाएं तो उनकी सफाई करना पड़ता है या रीसायकल बिन में डालना पड़ता है, अन्यथा पूरा सिस्टम स्लो हो जाता है।

उसी तरह शरीर मे कोशिकाओं के अंदर उनकी ऊर्जा उतपन्न करने, टूट फूट, या उम्र के साथ एक तरह का कूड़ा एकत्रित हो जाता है। ( जिसकी तुलना किचन में खाना बनाने के बाद उतपन्न कूड़े से कर सकते हैं।

कोशिकाओं के अंदर इस कूड़े को साफ करने का एक सिस्टम होता है जिसके कारण कोशिकाओं के यह यह टूटे फूटे अवशेष एक थैली में एकत्रित हो जाते हैं जिसमे मौजूद एंजयमेस इनको खा पचा कर ऊर्जा उतपन्न करती हैं – इसी को autophagy कहते हैं। अर्थात कोशिका के स्तर पर स्वच्छता अभियान। इससे कोशिकाएं स्वस्थ चुस्त सक्रिय और जवान बनी रहती हैं। यदि यह सिस्टम न काम करे तो कोशिकाएं कम समय मे ही सुस्त और बूढ़ी होने लगती हैं।

ऑटोफ़ेगी यदि सक्रिय न हो तो अनेक बीमारियों के होने का रिस्क बढ़ जाता है – जैसे कैंसर डायबिटीज, इन्फेक्शन हाइपरटेंशन पार्किंसोनिस्म डेमेंटिया अल्ज़रिमर्स। इसके कारण बुढापा भी शीघ्र परिलक्षित होने लगता है।
यह शरीर की इम्युनिटी बढ़ाती है।

ऑटोफेगी को सक्रिय करने के लिए कोशिकाओं को स्ट्रेस देने की आवश्यकता होती है। जिससे ऑटोफेगी निरन्तर होती रहे। कोशिकाओं को स्ट्रेस देने के सबसे शक्तिशाली साधन है – रेगुलर एक्सरसाइज और रेगुलर व्रत।

हमारे ऋषियों को ऑटोफेगी शब्द का ज्ञान नहीं था परंतु यह विज्ञान उन्हें पता था इसीलिए उन्होंने बताया कि – “शरीरम् इदं खलु धर्म साधनम्”। अर्थात शरीर ही समस्त कर्तव्यों के निर्वहन का साधन है।

और बताया कि एकादशी और नौरात्र में नियमित व्रत रखना चाहिए – इससे शरीर और मस्तिष्क दोनों स्वस्थ रहेंगे और आप चिर युवा बने रहेंगे।

(साभार : त्रिभुवन सिंह, इलाहाबाद)

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