काशी में मोरारी बापू की आठवीं रामकथा

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साधो यह मुर्दों का गांव…
मानस मसान-समापन

काशी के महाश्मशान, मणिकर्णिकाघाट के सामने गंगापार रेती पर मानस-कथा गंगा का प्रवाह रविवार, अक्षय नवमी को रूक गया. विगत आठ दिन कितनी जल्द बीत गये, असंख्य कथाप्रेमियों को आभास ही नहीं हुआ. समापन के क्षणों में व्यासपीठ और कथापंडाल-दोनों ही ओर आंखें भींगी हुईं थीं. काशी में बापू की यह 8वीं रामकथा थी. हमें ही नहीं, बहुत से कथाप्रेमियों को महसूस हुआ कि मोरारी बापू काशी में पहली बार इस तरह भावुक हुए. इसे स्थान का प्रभाव मानने में अतिशयोक्ति नहीं है.

मसान या महाश्मशान की रामचरित मानस के आधार पर व्याख्या करते हुए मोरारी बापू ने आठ दिनों में कई उपयोगी सूत्र दिये तो अंतिम दिन पूरी कथा का निचोड़ प्रस्तुत किया. यूं तो हर दिन युवा श्रोता पहुंचते रहे मगर रविवार को कथा पंडाल में उनका बहुमत था. बापू के लिए यह उत्साहजनक था. उन्होंने अपने संबोधन में युवाओं को केन्द्र में रखा भी. नौ दिनों के दौरान उनका बार-बार कहना था कि युवा ही भारत की उम्मीद हैं, परिवर्तन और नई चेतना के वाहक भी.

अब चलें व्यासपीठ की ओर.
काशी में जनसामान्य के बीच जीवन-दर्शन की बात चले और उसमें कबीर का उल्लेख न हो, यह असंभव है. जैसे लोकजीवन में मौसम का मिजाज जानने के लिए लोग अब भी घाघ-भड्डरी पर ज्यादा भरोसा करते हैं, उसी तरह कबीरपना काशी का मिजाज है. शैव, शाक्त या अन्य दर्शन की बात छोड़ दें. उल्लेखनीय यह कि कथा के दौरान एक श्रोता ने इस मिजाज का एहसास कराया व्यासपीठ को. उसने आठवें दिन बापू से पूछा था कि आप तो मसान को पितृगृह (जगत पितरौ वंदे पार्वती परमेश्वर..के अर्थ में शिव और पार्वती मसानवासी हैं, इसलिये मसान पितृगृह हुआ) और जीवन को जीवंत बनाने वाला पवित्र स्थान बता रहे हैं जबकि कबीर ने यह क्यों कहा-साधो यह मुर्दों का गांव? बापू ने रविवार को मानस के आधार पर कबीर-वाणी का मर्म समझाया. गोस्वामी तुलसीदास ने 13-14 लक्षणों से युक्त व्यक्ति को मृत या मुर्दा माना है.

तुलसी की दृष्टि में ये हैं मुर्दा-
कौल या वाममार्गी– दुनिया की रीतिरिवाज, व्यवस्था से उलट चलने वाले.
कामी–कामनाओं, वासनाओं या इच्छाओं का जोर वशीभूत हो
कृपण — कंजूस, संकुचित दृष्टिकोण वाला
विमूढ़–महामूर्ख, नारद भी मूढ़ता कर बैठे थे.
अति दरिद्र–विचारों और संस्कारों से जो हीन हो, वह अति दरिद्र
अजस–अपयश या बदनामी जिसके माथ परअमिट दाग बन जाय
रोगी–शारीरिक के साथ जो मानसिक रूप से भी हमेशा रुग्न रहे
क्रोधी–क्रोध ही जिसके व्यक्तित्व की पहचान बन जाय
विष्णु विमुख– जो ईश्वर भक्ति से दूर हो, पंथविरोधी
श्रुति विरोधी–वेद आदि सद्ग्रंथों पर अविश्वासी, उनका विरोधी
संत विरोधी–सज्जनों, साधु चरित्र का विरोधी
तनधर्मा–जो भौतिक शरीर को ही परम धर्म माने
निंदक– परनिंदा करने वाला, मानस में इसे महापाप और उलूक की संज्ञा दी गई है.
संवेदना शून्य–जिस मनुष्य में संवेदना नहीं वह मुर्दा ही तो है
इन लक्षणों वाले लोगों का गांव, देश मुर्दों का ही तो गांव हुआ न!

मुर्दा शुभता का प्रतीक
कबीर वाणी का दूसरा पक्ष यह है कि मुर्दा शुभता का प्रतीक है. मुर्दा वह है जिसमें लोभ, शोक, काम, मोह आदि कुछ भी नहीं है. जीते जी मुर्दा होना जहां एक दृष्टि से नकारात्मक है वहीं दूसरी दृष्टि से सकारात्मक भी है.

पहली बार मुर्दों को सुनाई कथा
मोरारी बापू ने सन-14 में काशी में गंगाकिनारे अस्सी घाट पर पिछली बार मानसकथा (मानस-मधुमास) कही थी. तभी उन्होंने महाश्मशान के सामने रामचरित मानस के आधार पर कुछ कहने, संवाद करने की इच्छा व्यक्त की थी. उनकी आत्मसंतुष्टि की झलक रविवार के इस उद्गगार में प्रकट हुई-ऐसा आनंद पहले कभी नहीं मिला. यह एक आयोजन नहीं था बल्कि अनुष्ठान था जो बाबा विश्वनाथ की कृपा से पूरा हुआ. अब तक हम जीवितों को कथा सुनाते आये थे. पहली बार काशी में मुर्दों को कथा सुनाई.

कथा का फल मणिकर्णिका को समर्पित

बापू ने कहा-इस कथा का फल न मुझे चाहिये न यजमान को. इसका फल मणिकर्णिका को समर्पित कर रहा हूं.

प्रेम हमारी जरूरत, सुख हमारा अधिकार

नौ दिनों के दौरान उपजी आत्मीयता की चर्चा के क्रम में कहा-प्रेम तत्व हमारे जीवन की जरूरत है. प्रेम के बिना संसार की कल्पना नहीं की जा सकती. यही वह तत्व है जिसने सभी को एकसूत्र में बांध रखा है. सुख हमारा अधिकार है. ठीक वैसे ही जैसे किसी भी प्रकार की पूजा के बाद प्रसाद पाना. जब व्यक्ति को प्रसाद पाकर सुख की अनुभूति होने लगे तो समझो उसका हृदय करुणा से भर रहा है.

मैत्री का मनोरथ करो
युवाओं से मुखातिब बापू ने कहा कि मैत्री प्रेम का ही एक रूप है. शिव से बड़ा कोई मित्र ब्रह्मांड में नहीं. मेरा महादेव सबका मित्र है. एक बार महादेव को मित्र बना कर तो देखो…! वाक्य पूरा करने से पूर्व ही बापू ने पुराना फिल्मी गीत गुनगुनाना शुरू कर दिया. दर्द भी तू… चैन भी तू…दरस भी तू… मितवा…आवाज मैं न दूंगा…चाहूंगा मैं तुझे सांझ सबेरे…. गीत बीच में ही गुनगुनाना छोड़ कर बापू पुन: कथा पर लौटे- एक बार… एक बार बाप! मैत्री का मनोरथ करके देखो. यह मनोरथ महादेव पूर्ण करेंगे. उसके प्रति प्रेम और अधिकार जताओ तो. अपने हृदय में करुणा का ज्वार पलने दो. देखो महादेव स्वयं तुमको आवाज देगा. तुम्हें बार-बार उसको आवाज नहीं देनी होगी. महादेव का सबसे बड़ा संदेश मैत्री है. आज भारत दुनिया भर में मैत्री की बात कर रहा है. जो लोग भारत के मैत्री संदेश का मजाक उड़ा रहे हैं वे आज नहीं तो कल समझ ही जाएंगे.

गौरव देख मेरी बात न मानो

बापू ने कहा कि मेरे गौरव को देखकर मेरी बातें मत मानना, लेकिन मेरी बातें आपकी आत्मा को छुए तो उसको गांठ बांध लेना. उन्होंने कहा कि दूसरों को दुखी किये बिना सुखी होना हमारा अधिकार है. हमारी किस्मत से जो सुख मिलता है उसके साथ दुख भी मिलता है, लेकिन प्रसाद में मिले सुख के साथ दुख नहीं मिलता.

सबकुछ मिलता है रहमत से
दहशत से कुछ नहीं मिलता है. मेहनत से कुछ-कुछ मिलता है और रहमत से सबकुछ मिलता है. सत्य किसी भी रूप में कही भी मिले, हमें ले लेना चाहिए. भरत जैसी प्रेम मूर्ति, परम संत, पहुंचे हुए महापुरुषों को सुनने से ही प्रेम मिलता है.

कलियुग के लिए तीन सूत्र
कलियुग के लिए बापू ने सत्य, प्रेम और करुणा का सूत्र देते हुए कहा कि राम का सुमिरन करो, राम का गायन करो तथा राम के गुण गाओ. जब तक गंगा जमुना और सरस्वती की धारा इस धरा पर बहती रहेगी तब तक रामकथा की धारा भी बहती रहेगी.

काशी शोक नहीं, श्लोक की नगरी
बापू ने कहा, विचार से सुनो और सुनने के बाद चुनो, यही रामकथा है. काशी शोक नहीं श्लोक की नगरी है.

समस्त चेतनाओं को प्रणाम!
कथा के समापन पर बापू के उदगार-जगतपिता विश्वनाथ, मां भगवती तथा उत्तर वाहिनी गंगधारा के साथ ही प्रकट व अप्रकट समस्त चेतनाओं को व्यासपीठ से मैं नमन करता हूं.
बापू की अब तक की 800वीं जबकि काशी में 8वीं रामकथा थी. अगली कथा वृंदावन में 11 नवंबर से शुरू होगी. यहां नौ दिन व्रज क्षेत्र के अलग-अलग महत्वपूर्ण लीला स्थलों पर कथा होगी.

(साभार:आशुतोष पांडेय,वाराणसी)

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