गुरु पर्व : नानक देव (भाग-2)

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जन -जन के बाबा नानक थे.. गुरु नानक बाबा सबके थे..

गुरु नानक देव का विवाह परिवारजनों ने सोलह साल की उम्र में कर दिया था. आपकी पत्नी का नाम सुलक्खनी था जो की गुरदासपुर जिले के अंतर्गत लाखौकी नामक स्थान की रहने वाली थीं. सोलह वर्ष बाद आपके पहले बेटे ने जन्म लिया जिसका नाम श्रीचंद रखा गया. तदनंन्तर चार सालों के उपरान्त उनके दुसरे पुत्र ने जन्म लिया जिनका नाम लखमीदास रखा गया. दो पुत्रों के जन्म के पश्चात वर्ष 1507 में गुरु नानक तीर्थयात्रा की प्रबल इच्छा हुई. तो आप तुरंत ही तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़े और आपके साथ मरदाना, लहना, बाला और रामदास नामक आपके चार मित्र भी यात्रा पर निकले. गुरु जी ने अपने परिवार का उत्तरदायित्व अपने श्वसुर पर छोड़ दिया और अपनी राह निकल पड़े.

गुरु नानक देव के जीवन का यह द्वितीय चरण था. अब वे पारिवारिक उत्तरदायित्व से मुक्त हो चुके थे और चारों ओर घूम घूम कर लोगों को उपदेश करने लगे थे. वर्ष 1521 के आने तक आपकी यात्रा के तीन चक्र पूर्ण हो चुके थे. गुरु नानक देव ने न सिर्फ भारत में ही अपनी यात्रा जारी राखी बल्कि वे भारत के बाहर भी भ्रमण कर रहे थे. वे अफगानिस्तान, फारस और अरब देशों की यात्राएं भी कीं. गुरु नानक की इन यात्राओं को पंजाबी भाषा में उदासियाँ कह कर पुकारा गया.

नानक देव से बढ़ कर बड़ा आस्तिक दुनिया में कोई नहीं था. नानक ईश्वर के हर रूप को मानते थी. वे सर्वेश्वरवादी थे. इसके साथ ही उन्होंने सनातन मत की मूर्तिपूजा की शैली के विपरीत एक परमात्मा की उपासना का नया मार्ग मानवता को दिया. गुरु जी हिंदू धर्म मे फैली कुरीतियों का हमेशा विरोध करते रहे. सदैव विरोध किया. उनका धार्मिक दृष्टिकोण सूफियों की भाँती था. साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों को भी अपनी दृष्टि में रखा. उनके सद्विचारों में एक प्रमुख यह भी था कि वे नारी का सम्मान करते थे.

नानक देव के उपदेशों के कारण लोग उनसे जुड़ने लगे और उनके पीछे पीछे चलने लगे. गुरु जी के उपदेशों का सार मूल रूप से इतना ही था कि ईश्वर एक ही है. हम लोग उसकी उपासना विभिन्न रूपों में करते हैं. उनका यह विचार हिंदू मुसलमान दोनों के लिये था. उन्होंने मूर्तिपूजा एवं बहुदेवपूजा को समर्थन नहीं दिया. गुरु जी की धर्म वाणी का प्रभाव हिन्दू और मुसलामानों दोनों सम्प्रदायों में सामान रूप से पड़ता था.

नानक संत भी थे और कवि भी. उन्हें आप संतकवि या सूफी कवि – दोनों ही श्रेणियों में रख सकते हैं. उनकी लेखनी उनके विचारों सी निराली है. उनकी कविताओं में उनकी भावुकता और कोमल हृदय का सुंदर परावर्तन दर्शनीय है. उनकी कविता जीवन और प्रकृति से एकात्म हो कर चलती है. उनकी भाषा इतनी सरल थी कि उसे बहता नीर कहा जा सकता है जिसमे हर स्थान की हर भाषा देखी जा सकती है. उनकी कविताओं में आप फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी के शब्द भी मुस्कुराते देख सकते हैं.

उन्नीस विविध रागों में कुल 974 शबद गुरु ग्रंथ साहेब में सम्मिलित हैं और गुरुबाणी में गाये जाते हैं. गुरुबाणी में इनको रूप जपजी, सिद्ध गोहस्त, सोहिला, दखनी ओंकार, आसा दी वार, पत्ती, बारह माह, आदि विभिन्न रूपों में देखे जा सकते हैं.

जीवन के अंतिम दिनों में इनकी ख्याति बहुत बढ़ गई और इनके विचारों में भी परिवर्तन हुआ. स्वयं ये अपने परिवारवर्ग के साथ रहने लगे और मानवता कि सेवा में समय व्यतीत करने लगे. उन्होंने करतारपुर नामक एक नगर बसाया, जो कि अब पाकिस्तान में है और एक बड़ी धर्मशाला उसमें बनवाई. इसी स्थान पर आश्वन कृष्ण १०, संवत् १५९७ (22 सितंबर 1539 ईस्वी) को इनका परलोकवास हुआ.

नानक देव जी की ख्याति लगातार बढ़ती रही और उनके अंतिम दिनों में वे सुविख्यात संत-कवि के रूप में जाने जाने लगे थे. अपने आखिरी दिनों में गुरु जी अपने परिवारजनों के साथ फिर से मिल कर रहने लगे थे. किन्तु अब भी उनका जीवन मानवता की ही सेवा में बीतता था. उन्होंने करतारपुर नामक एक नगर बसाया, जो कि अब पाकिस्तान की सीमा के भीतर है. गुरु जी ने एक बड़ी धर्मशाला भी वहां बनवाई. और यही वः स्थान था जहां पर गुरु नानक ने इस इहलोक से विदा ली थी. अश्विन कृष्ण १०, संवत् १५९७ (22 सितंबर 1539 ईस्वी) को गुरु नानक देव जी का देहावसान हुआ.

अपनी लौकिक देह का त्याग करने के पूर्व गुरु नानक देव जी अपने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जो आगे चल कर गुरु अंगद देव के नाम से जाने गए. धन्य हैं संत कवि गुरु नानक देव!!

(रजनी साहनी)

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